मुगलकाल की ऐतिहासिक धरोहर, जहां हुई थी औरंगजेब की ताजपोशी, जानिए इसकी खूबसूरत नक्काशी का राज
भारत की राजधानी दिल्ली अपने आंचल में इतिहास के अनगिनत पन्नों और कई प्राचीन इमारतों को समेटे हुए है। जब भी दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारकों की बात होती है, तो लाल किला, कुतुब मीनार और हुमायूं के मकबरे का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के शालीमार बाग (Shalimar Bagh) इलाके में मुगल काल की एक ऐसी अद्भुत और ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, जिसकी भव्यता और नक्काशी देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। हम बात कर रहे हैं दिल्ली के मशहूर 'शीश महल' (Sheesh Mahal) की, जो मुगल साम्राज्य के वैभव, कला प्रेम और राजनीतिक उथल-पुथल का एक बड़ा गवाह रहा है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और विकास प्राधिकरण द्वारा इसके जीर्णोद्धार के बाद इसे एक बार फिर से पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए खोल दिया गया है, जिसके बाद से यह जगह देश भर के पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गई है।
किसने और कब करवाया था दिल्ली के इस भव्य शीश महल का निर्माण?
दिल्ली के शालीमार बाग में स्थित इस ऐतिहासिक शीश महल के इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि इसका निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल के दौरान हुआ था। इतिहास के अनुसार, वर्ष 1653 में मुगल बादशाह शाहजहां की तीसरी पत्नी और बेगम इज्ज-उन-निसा (जिसे अकबरबादी महल के नाम से भी जाना जाता है) ने इस शानदार बाघ और महल परिसर की नींव रखी थी। इस खूबसूरत परिसर को कश्मीर के प्रसिद्ध शालीमार बाग की तर्ज पर ही एक शाही विश्राम स्थल के रूप में डिजाइन करवाया गया था, ताकि व्यस्त शाहजहांनाबाद की भागदौड़ और शोरगुल से दूर मुगल परिवार यहां सुकून के कुछ पल बिता सके। इस शाही परिसर के निर्माण में उस दौर की उत्कृष्ट वास्तुकला, लाल बलुआ पत्थर और पारंपरिक ईंटों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया था, जो आज भी मुगलई संस्कृति और निर्माण शैली की अनूठी मिसाल पेश करता है।
दीवारों पर शीशे की महीन कारीगरी और मनमोहक नक्काशी उड़ा देगी आपके होश
इस महल का नाम 'शीश महल' क्यों पड़ा, इसके पीछे इसकी दीवारों और छतों पर की गई वह नायाब कलाकारी है जो देखने वाले की आंखें चुंधिया देती है। इस इमारत के मुख्य हॉल और कमरों की दीवारों पर छोटे-छोटे और बेहद महीन शीशों को इस खूबी के साथ जड़ा गया था कि जब कभी दीये की रोशनी या सूर्य की किरणें उन पर पड़ती थीं, तो पूरा कमरा अनगिनत चमकती हुईीयों से जगमगा उठता था। इसके अलावा महल के अंदरूनी हिस्सों में बनी दीवारों पर राजस्थानी और कांगड़ा शैली की सुंदर चित्रकारी (Wall Paintings) आज भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, जिनमें रीतिकाल के महान कवियों जैसे केशव, सूरदास और बिहारी की कविताओं के दृश्यों को बेहद सजीव रूप से उकेरा गया है। इस महल के ठीक सामने बने फव्वारे और पानी की नहरें चार-बाग शैली (Char-Bagh Style) के पारंपरिक मुगल बागान की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं, जो उस दौर के इंजीनियरों और डिजाइनरों की दूरदर्शिता को दर्शाती हैं।
वह ऐतिहासिक पल जब इसी शीश महल में हुई थी क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की ताजपोशी
दिल्ली का यह शीश महल केवल अपनी वास्तुकला और सुंदरता के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि भारतीय इतिहास की एक बहुत बड़ी और निर्णायक घटना का गवाह भी यह परिसर रहा है। वर्ष 1658 में जब मुगल सत्ता के उत्तराधिकार को लेकर भीषण संघर्ष चल रहा था, तब इसी ऐतिहासिक शीश महल के प्रांगण में औरंगजेब की गुप्त और आधिकारिक ताजपोशी (Coronation Ceremony) की रस्म पूरी की गई थी। इस बड़ी राजनीतिक घटना के बाद से इस जगह का ऐतिहासिक महत्व और अधिक बढ़ गया था। समय के पहिए ने करवट ली और मुगल साम्राज्य के पतन के बाद सन् 1738 में जब फारसी आक्रमणकारी नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया था, तब उसकी सेना ने भी अपने दिल्ली अभियान के दौरान इसी परिसर में डेरा डाला था। इतना ही नहीं, ब्रिटिश काल के दौरान सर डेविड ऑक्टेरलोनी ने इसे अपने ग्रीष्मकालीन आवास के रूप में चुना था, जिससे यह साबित होता है कि विभिन्न कालखंडों में इस स्थान का सामरिक और राजनीतिक उपयोग होता रहा है।
सालों की बेरुखी के बाद अब नए रूप में लौटा शीश महल, पर्यटकों के लिए खुला है द्वार
लंबे समय तक प्रशासनिक उदासीनता, रख-रखाव की कमी और उपेक्षा के कारण मुगल काल की यह अनमोल धरोहर खंडहर में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गई थी। लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा उठाए गए सख्त कदमों के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर का कायाकल्प कर दिया गया है। चूने के पारंपरिक प्लास्टर, लखोरी ईंटों की रिपेयरिंग और चार-बाग की खोई हुई सुंदरता को दोबारा जीवंत करने के लिए करोड़ों रुपये की इस बहाव परियोजना ने शीश महल को एक नया जीवनदान दिया है। अब यह धरोहर आम जनता और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के दीदार के लिए पूरी तरह से तैयार और सुरक्षित है। यदि आप भी दिल्ली के इतिहास, मुगल वास्तुकला और पुरानी संस्कृति को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो शालीमार बाग स्थित इस प्राचीन शीश महल की सैर करना आपके लिए एक बेहद रोमांचक और ज्ञानवर्धक अनुभव साबित होगा।