नेपाल बाढ़ के 10वें दिन चमत्कार: त्रिशूली 3A हाइड्रो प्रोजेक्ट की टनल से आई जिंदा इंसानों की आवाज, बचाव दल बोला- 'घबराओ मत, हम आ रहे', अंदर से मिला ये जवाब

नेपाल बाढ़ के 10वें दिन चमत्कार: त्रिशूली 3A हाइड्रो प्रोजेक्ट की टनल से आई जिंदा इंसानों की आवाज, बचाव दल बोला- 'घबराओ मत, हम आ रहे', अंदर से मिला ये जवाब

प्रकृति के विनाशकारी तांडव और आंसुओं के समंदर के बीच नेपाल के रसुवा जिले से एक ऐसी चमत्कारिक खबर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया के राहत एवं बचाव दलों में नई ऊर्जा भर दी है। उत्तरी नेपाल में तिब्बत सीमा के पास आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के दसवें दिन, जब मलबे में दबी सुरंगों से उम्मीदें लगभग दम तोड़ रही थीं, तभी त्रिशूली 3A जलविद्युत परियोजना (Trishuli 3A Hydropower Project) की मुख्य सुरंग के भीतर से दबी हुई इंसानी आवाजें सुनाई दी हैं। नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल (APF) के जांबाजों ने जब मलबे के करीब पहुंचकर पुकारा, तो टनल के गहरे अंधेरे से एक से अधिक लोगों ने जवाब दिया। इस दोतरफा संवाद (Two-way communication) ने यह साबित कर दिया है कि भारी जलभराव, लोहे की मुड़ी हुई सरियों और पत्थरों के पहरे के बावजूद टनल के भीतर सांसें अब भी सुरक्षित हैं।

'घबराओ मत, हम आ रहे हैं': जब रेस्क्यू टीम ने लगाई आवाज तो अंदर से क्या मिला जवाब?

घटनास्थल पर मौजूद इंजीनियर श्रीराम न्यौपाने और सेना के अधिकारियों के अनुसार, राहत दल अत्याधुनिक सेंसरों और ध्वनिक उपकरणों (Acoustic Listening Devices) के साथ टनल के संकरे मुहाने से भीतर जाने की कोशिश कर रहे थे। मलबे के एक हिस्से को हटाते ही सैनिकों को अस्पष्ट फुसफुसाहट और खटखटाने की ध्वनि महसूस हुई। सेना के जवानों ने बिना देरी किए मेगाफोन और तेज आवाज में टनल के अंदर चिल्लाकर कहा— "घबराओ मत, धैर्य रखो, हम तुम्हें बचाने के लिए अंदर आ रहे हैं!" इसके चंद सेकंड बाद ही सुरंग के भीतर से कांपती लेकिन साफ आवाजों में जवाब गूंजा— "हम यहां जिंदा हैं, हमें जल्दी बाहर निकालो, यहां पानी और घुटन है!" भीतर से एक से अधिक व्यक्तियों की आवाजें सुनकर बाहर खड़े बचाव कर्मियों और लापता मजदूरों के परिजनों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

26 अगस्त की वो काली रात: कैसे जल समाधि बनी थी भोटेकोशी और त्रिशूली घाटी

इस मानवीय त्रासदी की शुरुआत 26 अगस्त को हुई थी, जब तिब्बत-नेपाल सीमा पर भोटेकोशी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में भारी बादल फटने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट जैसी स्थिति बनने से भयानक फ्लैश फ्लड आया। उफनती भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणाली ने विकराल रूप धारण कर लिया और सैकड़ों टन भारी बोल्डर, पेड़ों के तने और कीचड़ का सैलाब रसुवा की ओर बढ़ गया। इस सैलाब की सीधी चपेट में त्रिशूली हाइड्रोपावर के प्रोजेक्ट्स आ गए। जिस समय यह जलप्रलय आया, उस वक्त टनल और पावरहाउस क्षेत्र में दर्जनों मजदूर और तकनीकी विशेषज्ञ रात की पाली में काम कर रहे थे। नदी का गंदा पानी और विशालकाय पत्थर टनल के प्रवेश द्वार पर जमा हो गए, जिससे बाहर निकलने के सभी रास्ते पूरी तरह अवरुद्ध हो गए और लोग अंदर ही कैद होकर रह गए।

पानी, लोहे की रिब्स और 3-लेयर बैरिकेडिंग: रेस्क्यू टीम के सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां

टनल के भीतर फंसे लोगों तक पहुंचना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। सुरंग के भीतर लगभग तीन परतों वाली लोहे की भारी सपोर्ट रिब्स (Steel Ribs) और जालियां मुड़कर एक-दूसरे में उलझ गई हैं। इसके अलावा, बाहर से रिसकर आ रहा पानी टनल के निचले हिस्से में लगातार भर रहा है। राहत दल ने पहले रास्ते को खोलने के लिए नियंत्रित ब्लास्टिंग (Controlled Blasting) की कोशिश की थी, लेकिन कंपन से टनल की छत गिरने के खतरे को देखते हुए उस योजना को तत्काल रोक दिया गया। अब नेपाली सेना के विशेषज्ञ कटर मशीनों से लोहे की मोटी सरियों को काटकर मैनहोल जैसा रास्ता तैयार कर रहे हैं। वहीं, टनल में जमा जहरीली गैसों को बाहर निकालने के लिए बड़े एग्जॉस्ट ब्लोअर और फ्रेश ऑक्सीजन सिलेंडर्स के जरिए भीतर लगातार ताजी हवा पंप की जा रही है।

जिंदा रहने की असाधारण जंग: टनल के 'एयर पॉकेट्स' ने बचाई जान

भूवैज्ञानिकों और आपातकालीन विशेषज्ञों का मानना है कि 10 दिनों तक बिना ताजे भोजन और रोशनी के सुरक्षित बचना किसी अजूबे से कम नहीं है। यह तभी संभव हो सका जब टनल के ऊपरी एलिवेशन वाले हिस्से में प्राकृतिक 'एयर पॉकेट्स' (Air Pockets) बन गए, जहां बाढ़ का गंदा पानी पूरी तरह नहीं पहुंच सका और ऑक्सीजन का एक सीमित घेरा सुरक्षित रह गया। सुरंगों में आपातकालीन कार्यों के लिए छोड़े गए कुछ डक्ट्स या सुरक्षा चैंबरों ने इन श्रमिकों को कीचड़ और मलबे से बचाए रखा। हालांकि, इतने दिनों से फंसे रहने के कारण डिहाइड्रेशन और हाइपोथर्मिया का गंभीर खतरा बना हुआ है, जिसे देखते हुए मेडिकल टीमों को टनल के मुहाने पर आईसीयू एम्बुलेंस के साथ अलर्ट मोड पर तैनात रखा गया है।

सेना ने झोंकी पूरी ताकत: आधुनिक तकनीक और स्निफर डॉग्स की ली जा रही मदद

आवाजों की आधिकारिक पुष्टि होने के बाद नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल ने ऑपरेशन को 'कोड रेड' पर डाल दिया है। काठमांडू से अतिरिक्त विशेषज्ञ इंजीनियरों, पर्वतारोही कमांडो और मलबे में दबे जीवित व्यक्तियों की गंध पहचानने वाले प्रशिक्षित स्निफर डॉग्स को हेलिकॉप्टर के जरिए रसुवा पहुंचाया गया है। भारी जनरेटर और सबमर्सिबल पंपों के जरिए टनल से पानी खींचने का काम युद्धस्तर पर जारी है। नेपाल सरकार ने भी स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि रास्ता खुलते ही श्रमिकों को तुरंत एयरलिफ्ट कर काठमांडू के सैन्य अस्पताल पहुंचाया जाए।

परिजनों में जगी नई उम्मीद: नम आंखों से टनल के बाहर प्रार्थना का दौर

पिछले दस दिनों से टनल के बाहर अपनों की सलामती की आस लगाए बैठे सैकड़ों परिवारों के लिए यह खबर किसी पुनर्जन्म जैसी है। कई मजदूरों के रिश्तेदार रो-रोकर बेहाल थे और अनहोनी की आशंका से टूट चुके थे, लेकिन 'हम जिंदा हैं' के इन चंद लफ्जों ने पूरे इलाके में उम्मीद का संचार कर दिया है। स्थानीय ग्रामीण और परिजन टनल के बाहर हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं कि बचाव दल लोहे की इस दीवार को जल्द से जल्द भेदकर उनके अपनों को सुरक्षित बाहर निकाल लाए। राहत दल का कहना है कि यदि मौसम ने साथ दिया और कोई नया भूस्खलन नहीं हुआ, तो आगामी कुछ घंटों के भीतर फंसे हुए लोगों तक भौतिक पहुंच बनाई जा सकती है।