चंद्रमा पर परमाणु बम धमाका करने का खतरनाक सीक्रेट प्लान! एयर फोर्स का वह खौफनाक प्रोजेक्ट क्यों करना पड़ा था बंद

चंद्रमा पर परमाणु बम धमाका करने का खतरनाक सीक्रेट प्लान! एयर फोर्स का वह खौफनाक प्रोजेक्ट क्यों करना पड़ा था बंद

जब भी हम रात के आसमान में चमकते हुए चांद को देखते हैं, तो हमारे मन में इसकी खूबसूरती और शांति का भाव आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शीत युद्ध के दौरान दुनिया की महाशक्तियों ने इस शांत उपग्रह को एक खौफनाक परमाणु युद्ध के अड़े के रूप में बदलने की खतरनाक साजिश रची थी? अमेरिका की वायुसेना (US Air Force) ने एक ऐसा गुप्त प्रोजेक्ट तैयार किया था जिसके तहत चंद्रमा की सतह पर एक शक्तिशाली परमाणु बम धमाका किया जाना था। इस खूफिया और सनसनीखेज योजना का नाम 'प्रोजेक्ट A119' (Project A119) रखा गया था, जिसके बारे में दशकों तक दुनिया को कुछ भी पता नहीं था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष की दौड़ (Space Race) में सोवियत संघ (USSR) को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से यह संदेश देना था कि अमेरिका सैन्य और तकनीकी रूप से कितना ताकतवर और आक्रामक है।

शीत युद्ध का वह दौर जब अंतरिक्ष बन गया था महाशक्तियों का अखाड़ा और अंतरिक्ष की दौड़

यह कहानी 1950 के दशक के आखिर की है जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध (Cold War) अपने चरम पर था। सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर 1957 को दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह 'स्पुतनिक 1' (Sputnik 1) अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक लॉन्च करके इतिहास रच दिया था। इस एक घटना ने अमेरिकी वैज्ञानिकों और पेंटागन के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी थी, क्योंकि अमेरिका को यह डर सताने लगा था कि तकनीकी मामलों में वह अपने सबसे बड़े दुश्मन से पिछड़ गया है। अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस पाने और सोवियत संघ के मनोवैज्ञानिक दबदबे को तोड़ने के लिए अमेरिकी वायुसेना ने कुछ ऐसा करने की सोची जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। पेंटागन ने सोचा कि अगर चंद्रमा पर एक परमाणु बम फोड़ दिया जाए, तो उसकी रोशनी और धमाका पृथ्वी से साफ दिखाई देगा, जिससे पूरी दुनिया में अमेरिका का खौफ और वर्चस्व कायम हो जाएगा।

क्या था प्रोजेक्ट A119 और इसके पीछे वैज्ञानिकों की खतरनाक योजना

'प्रोजेक्ट A119' का आधिकारिक नाम "स्टडी ऑफ़ लूनर रिसर्च फ्लाइट्स" (Study of Lunar Research Flights) था, लेकिन असल में यह चंद्रमा पर एक परमाणु हथियार विस्फोट करने का ब्लूप्रिंट था। इस गुप्त प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए शिकागो विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी लियोनार्ड रीफेल (Leonard Reiffel) के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम बनाई गई थी। इस टीम में खगोल भौतिकी के दिग्गज और उस समय युवा वैज्ञानिक रहे कार्ल सेगन (Carl Sagan) भी शामिल थे, जिन्हें चंद्रमा की सतह पर होने वाले परमाणु विस्फोट से उठने वाली धूल और गैस के बादलों के फैलाव की गणना करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वैज्ञानिकों ने योजना बनाई थी कि चंद्रमा के उस हिस्से पर बम गिराया जाए जो सूर्य की रोशनी में चमक रहा हो, ताकि पृथ्वी पर मौजूद लोग और सोवियत वैज्ञानिक उस भयंकर धमाके को अपनी खुली आँखों से देख सकें।

क्यों रद्द कर दिया गया यह परमाणु विस्फोट और क्या थे इसके बड़े खतरे

इस बेहद खतरनाक और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर काफी समय तक काम करने के बाद आखिरकार अमेरिकी अधिकारियों ने इसे रद्द करने का फैसला कर लिया। इस प्रोजेक्ट को बंद करने के पीछे कई बड़े वैज्ञानिक, तकनीकी और नैतिक कारण थे, जिनमें सबसे बड़ा खतरा पृथ्वी पर पड़ने वाले दुष्परिणामों का था। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि अगर किसी तकनीकी खराबी के कारण यह परमाणु मिसाइल चंद्रमा तक पहुँचने से पहले रास्ते में ही भटक गई या पृथ्वी पर वापस लौट आई, तो यह मानवता के लिए एक महाविनाशक साबित हो सकता है। इसके अलावा, चंद्रमा की सतह पर रेडियोधर्मी कचरा (Radioactive Fallout) फैलने का बहुत बड़ा जोखिम था, जिससे भविष्य में चंद्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन और अंतरिक्ष अनुसंधान हमेशा के लिए प्रभावित हो जाते। अमेरिका को यह भी डर सता रहा था कि अगर यह प्रयोग असफल हो गया, तो पूरी दुनिया में उसकी थू-थू होगी और उसे भारी नैतिक निंदा का सामना करना पड़ेगा।

इतिहास के पन्नों में दफन यह राज और अंतरिक्ष संधियां जिनका आज रखा जाता है ध्यान

दशकों तक 'प्रोजेक्ट A119' की फाइलें अमेरिकी सेना और सरकार के सबसे गोपनीय दस्तावेजों में दफन रहीं और आम जनता को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। सन 2000 के दशक की शुरुआत में जब कार्ल सेगन की जीवनी लिखने के लिए शोध किया जा रहा था, तब इस गुप्त प्रोजेक्ट के दस्तावेज सार्वजनिक हुए और दुनिया को पता चला कि मानव जाति एक बहुत बड़े खतरे से बाल-बाल बची थी। इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतरिक्ष को शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए कड़े नियम बनाए गए। साल 1967 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'आउटर स्पेस ट्रीट्री' (Outer Space Treaty) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों पर किसी भी प्रकार के परमाणु हथियार के परीक्षण या तैनाती को पूरी तरह से गैर-कानूनी और प्रतिबंधित कर दिया गया ताकि ब्रह्मांड की पवित्रता और सुरक्षा बनी रहे।