होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ा तनाव: अमेरिका में गैसोलीन 29% महंगी, आम जनता पर पड़ा सीधा असर
मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण सैन्य और कूटनीतिक टकराव का सीधा असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार और आम उपभोक्ताओं की जेब पर दिखने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में तेल टैंकरों की आवाजाही ठप होने के चलते अमेरिकी ईंधन बाजार में बड़ा भूचाल आ गया है।
अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) की औसत खुदरा कीमत बढ़कर 4.08 डॉलर प्रति गैलन पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा पिछले साल की समान अवधि (3.16 डॉलर प्रति गैलन) की तुलना में सीधे तौर पर 29 प्रतिशत अधिक है। कई अमेरिकी राज्यों में कीमतें 5 डॉलर प्रति गैलन के आंकड़े को छू रही हैं, जिससे आम नागरिकों के घरेलू बजट पर भारी दबाव बन गया है और मुद्रास्फीति (महंगाई) के नए सिरे से भड़कने का खतरा पैदा हो गया है।
डोनाल्ड ट्रंप की जनता से अपील: 'एक दुष्ट देश को रोकने के लिए थोड़ा महंगा तेल सहना होगा'
बढ़ती तेल कीमतों और मतदाताओं की नाराजगी के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने फैसले का पुरजोर बचाव किया है। न्यूयॉर्क के गार्डन सिटी में आयोजित एक विशाल राजनीतिक रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकों से अपील की कि वे देशहित और वैश्विक सुरक्षा के लिए पेट्रोल के बढ़े हुए दामों को सहन करें।
ट्रंप ने रैली में कहा कि पेट्रोल के लिए थोड़ा अतिरिक्त भुगतान करना उस व्यापक रणनीति का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एक बेहद खतरनाक देश को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में दोहराया कि होर्मुज जलमार्ग पर अमेरिकी नौसेना का पूरा दबदबा है और संघर्ष समाप्त होने के बाद अमेरिका इस पूरे क्षेत्र को 'अमेरिकी क्षेत्र' घोषित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। हालांकि, चुनावी वादों में ऊर्जा की कीमतें कम करने का दावा करने वाले ट्रंप प्रशासन के लिए 29 फीसदी की यह मूल्य वृद्धि घरेलू राजनीति में एक बड़ी चुनौती बन गई है।
ईरान का करारा पलटवार: 'ट्वीट या युद्धपोत से नहीं खुलेगा होर्मुज', बातचीत से साफ इनकार
ट्रंप के बयानों और सैन्य नाकेबंदी के दावों पर तेहरान ने बेहद आक्रामक रुख अख्तियार किया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पलटवार करते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना या बंद करना केवल ईरान के अधिकार क्षेत्र में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रणनीतिक मार्ग किसी चुनावी भाषण, सोशल मीडिया पोस्ट या विमानवाहक पोत (एयरक्राफ्ट कैरियर) की तैनाती से नहीं खुलने वाला है।
वहीं, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि ईरान ने अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातचीत फिर से शुरू करने का कोई फैसला नहीं किया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि जब तक अमेरिका युद्ध, सैन्य नाकेबंदी और आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं करता और जब्त की गई संपत्तियों को बहाल नहीं करता, तब तक इस जलमार्ग से जहाजों का सुरक्षित आवागमन संभव नहीं होगा। कतर और पाकिस्तान जैसे देशों द्वारा की जा रही मध्यस्थता की कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रणनीतिक ताकत: क्यों थमी है दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन?
होर्मुज जलडमरूमध्य ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री चैनल है, जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की 'गले की नस' (जुगुलर वेन) माना जाता है। सामान्य दिनों में दुनिया के कुल पेट्रोलियम उपभोग और समुद्री कच्चे तेल के व्यापार का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल व एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) निर्यातक देश अपने ऊर्जा निर्यात के लिए पूरी तरह इसी चैनल पर निर्भर हैं।
यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) और जहाजरानी ट्रैकिंग फर्मों के ताजा आंकड़ों के अनुसार, होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों का ट्रैफिक अपने सामान्य स्तर के मुकाबले गिरकर 15 से 17 प्रतिशत पर सिमट गया है। अधिकांश अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और तेल टैंकर ऑपरेटरों ने मिसाइल, ड्रोन हमलों और समुद्री बारूदी सुरंगों के डर से अपने जहाजों को खाड़ी देशों में भेजने से रोक दिया है। जहाजों के बीमा प्रीमियम (वॉर रिस्क इंश्योरेंस) में अभूतपूर्व उछाल आया है, जिससे समुद्री माल ढुलाई की लागत आसमान छू रही है।
कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में आग: ब्रेंट और WTI में भारी साप्ताहिक उछाल
होर्मुज के अवरुद्ध होने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी अनिश्चितता और घबराहट का माहौल है। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमतों में लगातार तेजी दर्ज की जा रही है। ताजा कारोबारी सत्र में ब्रेंट क्रूड में साप्ताहिक आधार पर लगभग 6 प्रतिशत और डब्ल्यूटीआई में 5.4 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई।
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि होर्मुज जलमार्ग पर यह गतिरोध अगले कुछ हफ्तों तक और जारी रहा, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकती हैं। आपूर्ति शृंखला टूटने का सीधा असर रिफाइनरियों पर पड़ रहा है, जिससे न केवल पेट्रोल और डीजल बल्कि विमान ईंधन (एटीएफ) और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
अमेरिका में आर्थिक व राजनीतिक उथल-पुथल: महंगाई और मध्यावधि चुनाव का दबाव
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों का 29 फीसदी तक बढ़ जाना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा भी है। अमेरिकी संस्कृति में ईंधन की कीमतें सीधे उपभोक्ता भावना (कंज्यूमर सेंटीमेंट) और दैनिक जीवन यापन की लागत को प्रभावित करती हैं। ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ने से ग्रोसरी, पैकेज्ड फूड, लॉजिस्टिक्स और आवश्यक सेवाओं की कीमतें बढ़ रही हैं।
विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी इस मुद्दे को लेकर ट्रंप प्रशासन पर हमलावर हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि विदेशी युद्धों में उलझने और आक्रामक सैन्य नीतियों के कारण आम अमेरिकी परिवारों पर महंगाई का असहनीय बोझ लादा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, ईरान भी इस संघर्ष की भारी आर्थिक कीमत चुका रहा है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्वीकार किया है कि बंदरगाहों की नाकेबंदी और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण देश में रिकॉर्ड मुद्रास्फीति दर्ज की जा रही है।
भारत और एशियाई देशों पर क्या होगा असर? आयात बिल और मुद्रास्फीति की चिंता
होर्मुज संकट का प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे भारी तेल आयातक एशियाई देश इसके सबसे बड़े शिकार हो सकते हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से होर्मुज मार्ग के रास्ते ही आता है।
यदि तेल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर यह उछाल बना रहता है, तो भारत के चालू खाता घाटे (CAD) पर सीधा दबाव पड़ेगा, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है और आयातित मुद्रास्फीति (इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन) का खतरा बढ़ जाएगा। यद्यपि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस और अन्य गैर-खाड़ी देशों से तेल खरीद बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता लाई है, लेकिन वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कुल कमी सभी देशों के लिए ईंधन और लॉजिस्टिक्स को महंगा कर देगी।
आगे क्या होगा? कूटनीतिक गतिरोध और अनिश्चितता का लंबा दौर
वर्तमान में वाशिंगटन और तेहरान के बीच कोई प्रत्यक्ष शांति वार्ता नहीं हो रही है, जिससे इस संकट के जल्द समाप्त होने के आसार बेहद कम दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी वित्त मंत्रालय जहां ईरान पर नए और सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है, वहीं ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है।
भूराजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सैन्य शक्ति के बल पर होर्मुज जैसे संकरे और संवेदनशील जलमार्ग को लंबे समय तक सुरक्षित रखना व्यावहारिक रूप से असंभव है। जब तक दोनों पक्ष कूटनीतिक बातचीत की मेज पर लौटकर युद्धविराम और सुरक्षा गारंटी पर सहमति नहीं बनाते, तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, महंगे पेट्रोल का संकट और आर्थिक मंदी का साया इसी तरह मंडराता रहेगा।