अंतरिक्ष विज्ञान में ऐतिहासिक खोज: सामने आया दैत्याकार 'ब्लैक होल स्टार'

अंतरिक्ष विज्ञान में ऐतिहासिक खोज: सामने आया दैत्याकार 'ब्लैक होल स्टार'

खगोल भौतिकी (Astrophysics) और अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा क्रांतिकारी अध्याय जुड़ गया है जिसने वैज्ञानिकों की पुरानी धारणाओं को झकझोर कर रख दिया है। सुदूर और प्राचीन ब्रह्मांड के रहस्यों की पड़ताल में जुटे वैज्ञानिकों ने एक ऐसे असाधारण और प्रलयंकारी खगोलीय पिंड (Celestial Object) के मजबूत संकेत दर्ज किए हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'ब्लैक होल स्टार' या 'क्वासी-स्टार' (Quasi-Star) कहा जाता है।

प्राप्त वैज्ञानिक डेटा और सिमुलेशन मॉडल्स के अनुसार, यह विशालकाय तारा हमारे सौरमंडल के सूर्य से लगभग 1,00,000 (एक लाख) गुना अधिक भारी है और इसकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता सामान्य तारों की तुलना में लगभग 100 अरब गुना अधिक शक्तिशाली आंकी गई है। ब्रह्मांड के जन्म यानी बिग बैंग के कुछ ही सौ मिलियन वर्ष बाद (कॉस्मिक डॉन के युग में) मौजूद रहे इस खगोलीय दैत्य की खोज ने समूचे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय को चकित कर दिया है। यह खोज इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण बन सकती है कि प्रारंभिक ब्रह्मांड में तारों और ब्लैक होल्स के बनने का नियम आज के आधुनिक ब्रह्मांड से बिल्कुल भिन्न था।

क्वासी-स्टार क्या है? जहां परमाणु संलयन नहीं, ब्लैक होल चलाता है तारे का इंजन

हमारी आकाशगंगा में मौजूद सूर्य और अन्य सभी सामान्य तारे अपने केंद्र में होने वाले परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) की बदौलत चमकते हैं, जहां अत्यधिक दबाव और तापमान में हाइड्रोजन गैस हीलियम में बदलती है और भारी मात्रा में प्रकाश व ऊष्मा उत्सर्जित होती है। लेकिन एक 'ब्लैक होल स्टार' का आंतरिक तंत्र इस सामान्य भौतिकी के बिल्कुल विपरीत काम करता है।

क्वासी-स्टार की अवधारणा के अनुसार, इस तारे के केंद्र में कोई सामान्य स्टेलर कोर नहीं होता, बल्कि इसके गर्भ में एक नवजात 'इंटरमीडिएट ब्लैक होल' समाया होता है। तारे की बाहरी परतें अत्यधिक सघन, गर्म और विशाल हाइड्रोजन व हीलियम गैस के विशालकाय खोल (हाइड्रोजन एनवेलप) से बनी होती हैं। जब केंद्र में मौजूद ब्लैक होल अपने ही चारों ओर मौजूद तारे की भीतरी गैस को निगलना (Accretion) शुरू करता है, तो इस प्रक्रिया में अत्यधिक शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण घर्षण पैदा होता है। इस प्रचंड घर्षण से निकलने वाली विकिरण ऊर्जा (रेडिएशन प्रेशर) तारे के बाहरी गैस के खोल को बाहर की तरफ धकेलती है, जिससे तारा अपने ही विशाल गुरुत्वाकर्षण के कारण तुरंत ढहने से बच जाता है और लाखों वर्षों तक एक स्थिर लेकिन अत्यंत चमकदार 'ब्लैक होल पावर्ड स्टार' के रूप में अस्तित्व में रहता है।

1 लाख सूर्यों जितना द्रव्यमान और 100 अरब गुना चमक: आंकड़ों की जुबानी समझिए इसका आकार

इस ब्लैक होल स्टार के भौतिक आयाम इतने विशाल हैं कि सामान्य मानव मस्तिष्क के लिए उनकी कल्पना करना भी लगभग असंभव है:

  • अकल्पनीय द्रव्यमान (Mass): सामान्य तारों का अधिकतम द्रव्यमान आमतौर पर 100 से 150 सौर द्रव्यमान (Solar Masses) तक सीमित होता है, क्योंकि उससे अधिक भारी होने पर विकिरण का दबाव तारे को फाड़ देता है। लेकिन यह क्वासी-स्टार करीब 1,00,000 सौर द्रव्यमान का है, यानी इसमें एक लाख सूर्य समा सकते हैं।

  • करोड़ों किलोमीटर में फैला आकार: यदि इस ब्लैक होल स्टार को हमारे सौरमंडल के केंद्र में सूर्य की जगह रख दिया जाए, तो इसका बाहरी गैसीय वायुमंडल बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल और संभवतः बृहस्पति ग्रह की कक्षा से भी आगे तक फैल जाएगा।

  • 100 अरब गुना प्रकाश उत्सर्जन: इस पिंड से निकलने वाली रोशनी और ऊर्जा पूरे ब्रह्मांड की एक छोटी-मोटी आकाशगंगा (जिसमें अरबों तारे होते हैं) के कुल प्रकाश से भी कई गुना अधिक है। यह अपनी चमक के मामले में भौतिकी के 'एडिंगटन लिमिट' (Eddington Limit) के उच्चतम स्तर पर काम करता है।

ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य का समाधान: कैसे बने शुरुआती सुपरमैसिव ब्लैक होल?

पिछले कई वर्षों से खगोलविदों के सामने सबसे बड़ी पहेली यह रही है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के केवल 500 से 700 मिलियन वर्ष बाद ही अरबों सूर्यों के बराबर विशालकाय 'सुपरमैसिव ब्लैक होल' (Supermassive Black Holes) कैसे बन गए? पारंपरिक सिद्धांत कहते हैं कि जब कोई सामान्य तारा मरता है, तो उससे एक छोटा स्टेलर ब्लैक होल बनता है (लगभग 10 से 50 सौर द्रव्यमान)। यदि यह छोटा ब्लैक होल धीरे-धीरे गैस खाकर बढ़ता, तो उसे अरबों गुना बड़ा होने के लिए अरबों वर्षों का समय चाहिए था, जबकि वे ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में ही विशाल रूप में मौजूद थे।

इस 'ब्लैक होल स्टार' की खोज ने इस रहस्य पर से पर्दा हटा दिया है। वैज्ञानिक 'डायरेक्ट कोलैप्स ब्लैक होल' (DCBH) मॉडल का समर्थन करते हैं। इसके अनुसार, प्राचीन ब्रह्मांड में जब बिना किसी धातु (Heavy Elements) वाले विशाल गैस के बादल सीधे ढहे, तो उन्होंने छोटे तारों के बजाय सीधे 1 लाख सौर द्रव्यमान वाले क्वासी-स्टार्स को जन्म दिया। इन क्वासी-स्टार्स के मरने के बाद जो ब्लैक होल बचे, वे 'बीज' (Seed Black Holes) के रूप में पहले से ही इतने विशाल थे कि उन्होंने बहुत कम समय में विकसित होकर आकाशगंगाओं के केंद्र में स्थित आज के दैत्य सुपरमैसिव ब्लैक होल्स का रूप ले लिया।

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) और अत्याधुनिक सिमुलेशन का कमाल

नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) के संयुक्त जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने अंतरिक्ष के सुदूर छोर से आने वाले इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी डेटा के माध्यम से ब्रह्मांड के शुरुआती दौर की अभूतपूर्व तस्वीरें जुटाई हैं।

गहन कॉस्मिक रेडशिफ्ट (z>10) के विश्लेषण और सुपरकंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से वैज्ञानिकों ने पाया कि शुरुआती ब्रह्मांड में बनने वाले 'पॉपुलेशन III' तारों के गैस के बादलों में जब मॉलिक्यूलर हाइड्रोजन को खत्म करने वाले अल्ट्रावायलेट रेडिएशन का असर हुआ, तो गैस ठंडी होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंटी, बल्कि एक ही विशालकाय महा-पिंड के रूप में सिमट गई। इसी दुर्लभ प्रक्रिया ने इस 1 लाख सौर द्रव्यमान वाले ब्लैक होल स्टार को जन्म दिया, जिसके स्पेक्ट्रल सिग्नेचर अब उन्नत वेधशालाओं द्वारा डीकोड किए जा रहे हैं।

एक क्वासी-स्टार का जीवन चक्र और इसका प्रलयंकारी अंत

भले ही यह ब्लैक होल स्टार देखने में ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली तारा लगता हो, लेकिन एक तारे के पैमाने पर इसका जीवनकाल बहुत छोटा होता है। जहां हमारा सूर्य करीब 10 अरब वर्षों तक जीवित रहेगा, वहीं एक क्वासी-स्टार का जीवन केवल 10 लाख से 20 लाख (1 to 2 Million) वर्षों का ही होता है।

जैसे-जैसे केंद्र में मौजूद ब्लैक होल तारे के अंदरूनी हिस्से को लगातार निगलता जाता है, ब्लैक होल का आकार बढ़ता जाता है और बाहरी गैसीय आवरण धीरे-धीरे ठंडा और पतला होता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब बाहरी खोल ब्लैक होल के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण और रेडिएशन के संतुलन को संभाल नहीं पाता। इसके बाद पूरा बाहरी गैस का आवरण या तो अंतरिक्ष में उड़ जाता है या फिर कुछ ही समय में सीधे ब्लैक होल में समा जाता है। अंत में, तारा पूरी तरह गायब हो जाता है और उस स्थान पर केवल एक विशालकाय इंटरमीडिएट-मास ब्लैक होल शेष बचता है, जो आसपास की आकाशगंगाओं को निगलने के लिए तैयार रहता है।

ब्रह्मांड की समझ में एक नया युग: आगे की संभावनाएं

इस खोज ने सैद्धांतिक भौतिकी और प्रेक्षणीय खगोल विज्ञान (Observational Astronomy) के बीच की खाई को पाट दिया है। दुनिया भर की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां अब जेम्स वेब टेलीस्कोप, आने वाले 'नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप' और चिली में बन रहे 'एक्सट्रीमली लार्ज टेलीस्कोप' (ELT) के जरिए ऐसे और अधिक प्रारंभिक खगोलीय पिंडों की मैपिंग करने में जुट गई हैं।

यह खोज न केवल हमें यह बताती है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दिनों में प्रकृति ने कैसे-कैसे चरम और अविश्वसनीय खगोलीय पिंडों का निर्माण किया था, बल्कि यह हमारी अपनी आकाशगंगा 'मिल्की वे' के केंद्र में स्थित सुपरमैसिव ब्लैक होल 'सैजिटेरियस ए*' (Sagittarius A*) के जन्म और विकास की कहानी को समझने में भी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रही है। मानव इतिहास में पहली बार हम उस कॉस्मिक भोर को समझने के इतने करीब पहुंचे हैं, जिसने आधुनिक ब्रह्मांड की रचना की थी।

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