सऊदी अरब का पाकिस्तान पर दांव लगाना साबित हो सकता है बहुत बड़ा भू-राजनीतिक जोखिम
इस्लामिक दुनिया के सबसे पवित्र और प्रभावशाली केंद्र मक्का की जमीन से हाल ही में जिस बहुचर्चित 'मक्का पैक्ट' की सुगबुगाहट शुरू हुई है, उसे लेकर वैश्विक कूटनीति के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो चुका है। सऊदी अरब के नेतृत्व में क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक विकास और आपसी सहयोग के नाम पर गढ़े जा रहे इस नए कूटनीतिक समीकरण को लेकर रक्षा और विदेश मामलों के बड़े विश्लेषक अब खुलकर सवाल खड़े करने लगे हैं। खाड़ी देशों के इस बहुउद्देशीय और महत्वाकांक्षी समझौते में जिस तरह से गहरे आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान को एक अहम हिस्सेदार के रूप में शामिल किया जा रहा है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों को गहरी चिंता में डाल दिया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के इशारे पर इस तरह के बड़े समझौते थोपे गए हैं, उनका हश्र उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत निकला है। जिस प्रकार ऐतिहासिक 'अब्राहम अकॉर्ड' (Abraham Accords) को मध्य पूर्व में शांति का नया सूरज कहकर प्रचारित किया गया था लेकिन वह क्षेत्रीय जटिलताओं और जमीनी वास्तविकताओं के चलते कई मोर्चों पर अपनी चमक खोता नजर आया, ठीक उसी तरह अब यह अंदेशा जताया जा रहा है कि मक्का पैक्ट का भविष्य भी कुछ ऐसा ही दर्दनाक और विफल हो सकता है। सऊदी अरब जैसे आर्थिक महाशक्ति देश द्वारा अपनी कूटनीतिक रणनीतियों में पाकिस्तान जैसे अनियोजित और आतंकवाद के दलदल में फंसे राष्ट्र पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना रियाद के लिए आने वाले समय में एक बहुत बड़ी और रणनीतिक भूल साबित हो सकता है।
मक्का पैक्ट की पृष्ठभूमि और सऊदी अरब की नई कूटनीतिक चाल: क्या क्षेत्रीय स्थिरता ला पाएगी यह रणनीति?
सऊदी अरब के दूरदर्शी और युवा नेतृत्व ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर विजन 2030 के तहत आधुनिकता और वैश्विक निवेश की ओर मोड़ने का ऐतिहासिक फैसला किया है। इसी महत्वाकांक्षी विजन के तहत सऊदी अरब अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक पकड़ को और अधिक मजबूत करने के लिए नए-नए कूटनीतिक पैंतरे चल रहा है, जिसका एक प्रमुख हिस्सा मक्का पैक्ट के रूप में सामने आ रहा है। इस पैक्ट के जरिए सऊदी हुक्मरान इस्लामिक देशों के बीच आपसी मतभेदों को भुलाकर एक मजबूत आर्थिक और राजनीतिक धुरी तैयार करना चाहते हैं, ताकि वैश्विक स्तर पर मुस्लिम जगत का नेतृत्व पूरी मजबूती के साथ रियाद के हाथों में सुरक्षित रह सके। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का यह मानना है कि जब किसी बहुपक्षीय समझौते की नींव ही अस्थिर और अविश्वसनीय स्तंभों पर रखी जाती है, तो उसका महल लंबे समय तक टिक नहीं पाता है। सऊदी अरब द्वारा इस पैक्ट के दायरे में उन देशों को भी प्रमुखता देना जो खुद अपनी आंतरिक कलह, कुशासन और गृहयुद्ध जैसे हालातों से जूझ रहे हैं, इस पूरी योजना की विश्वसनीयता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। रियाद के रणनीतिकारों को यह समझना होगा कि केवल बड़े-बड़े सम्मेलनों और कागजी समझौतों से क्षेत्रीय स्थिरता हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए जमीन पर ठोस और साफ नीयत वाले साझेदारों की जरूरत होती है, जिसकी भारी कमी इस समय सऊदी खेमे में साफ तौर पर महसूस की जा रही है।
पाकिस्तान पर रियाद का दांव क्यों है सबसे खतरनाक? आतंकवाद, आर्थिक बदहाली और अस्थिर नेतृत्व का सच
सऊदी अरब द्वारा मक्का पैक्ट या अन्य क्षेत्रीय समझौतों में पाकिस्तान को एक केंद्रीय भूमिका देने का निर्णय सबसे अधिक विवादित और खतरनाक माना जा रहा है। दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ और भू-राजनीतिक रणनीतिकार इस बात पर हैरान हैं कि जिस देश की अपनी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की बैसाखियों और विदेशी कर्जों पर टिकी हो, जिसकी आंतरिक सुरक्षा आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पूरी तरह चरमराई हुई हो, उस पर रियाद इतना बड़ा दांव कैसे खेल सकता है। पाकिस्तान का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि उसने अपने सामरिक हितों को साधने के लिए हमेशा दोहरी नीतियों का सहारा लिया है और सऊदी अरब ने अतीत में भी पाकिस्तान की आर्थिक मदद के नाम पर अरबों डॉलर झोंके हैं, जिसके बदले में रियाद को अक्सर निराशा और रणनीतिक असहयोग ही हाथ लगा है। आज पाकिस्तान की सेना और वहां की सरकार अपने ही नागरिकों के विरोध, भीषण महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रही है, ऐसे में वह किसी भी क्षेत्रीय शांति समझौते में एक मजबूत और मददगार साथी की भूमिका निभाने के बजाय खुद एक बोझ और सुरक्षा जोखिम बनकर उभर सकता है। सऊदी अरब का यह सोचना कि पाकिस्तान इस पैक्ट के जरिए मुस्लिम जगत में कोई सकारात्मक बदलाव लाएगा, केवल एक कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि जो देश खुद अपने आंतरिक संकटों को नहीं संभाल पा रहा, वह क्षेत्रीय स्थिरता की गारंटी कभी नहीं बन सकता।
अब्राहम अकॉर्ड से तुलना: क्यों फेल हो रहे हैं पश्चिम एशिया के कृत्रिम और थोपे गए कूटनीतिक समझौते?
मक्का पैक्ट की तुलना वर्तमान समय में बहुचर्चित 'अब्राहम अकॉर्ड' से की जा रही है, और यह तुलना पूरी तरह से तर्कसंगत भी है क्योंकि दोनों ही समझौतों के पीछे कूटनीतिक दिखावे और सतही रणनीतियों का बोलबाला अधिक दिखाई देता है। जब अमेरिका की मध्यस्थता में अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब यह दावा किया गया था कि यह समझौता मध्य पूर्व में दशकों पुराने तनाव को हमेशा के लिए खत्म कर देगा और इजरायल तथा अरब देशों के बीच स्थायी शांति की एक नई सुबह लेकर आएगा। हालांकि, जमीनी हकीकत यह रही कि फिलिस्तीन के वास्तविक और मानवीय मुद्दों को पूरी तरह से नजरअंदाज करके बनाए गए उस कृत्रिम समझौते ने क्षेत्र के ध्रुवीकरण को कम करने के बजाय और अधिक गहरा कर दिया, जिसका परिणाम हालिया संघर्षों और भयानक हिंसा के रूप में पूरी दुनिया ने देखा है। इसी प्रकार, मक्का पैक्ट भी यदि क्षेत्रीय वास्तविकताओं, जमीनी संघर्षों और जनता की भावनाओं की उपेक्षा करके केवल कागजों पर शासकों के गठजोड़ के रूप में आगे बढ़ता है, तो इसका हश्र भी अब्राहम अकॉर्ड जैसा ही होना तय माना जा रहा है। कूटनीति के इतिहास में यह अकाट्य सत्य रहा है कि जनता के समर्थन और स्थायी समाधान के बिना बनाए गए पैक्ट रेत की उस दीवार की तरह होते हैं जो पहली ही वैचारिक या सामरिक आंधी में ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं, और सऊदी अरब के रणनीतिकारों को इस ऐतिहासिक सबक को नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
सऊदी अरब के भू-राजनीतिक हितों पर मंडराता खतरा: समय रहते रणनीति नहीं बदली तो चुकानी होगी भारी कीमत
यदि सऊदी अरब अपनी वर्तमान विदेश नीति और रणनीतिक समझौतों की समीक्षा नहीं करता है, तो उसे आने वाले समय में इसके बहुत गंभीर और दूरगामी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक जिम्मेदार और महाशक्ति के रूप में उभर रहे रियाद के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह अपने सहयोगियों का चुनाव बहुत ही सावधानी और दूरदर्शिता के साथ करे, न कि केवल भावनात्मक या पारंपरिक समीकरणों के आधार पर। पाकिस्तान जैसे अस्थिर और अंदर से खोखले हो चुके देश को अपने सबसे बड़े रणनीतिक प्रोजेक्ट्स में शामिल करना सऊदी अरब के उस सुनहरे भविष्य को भी खतरे में डाल सकता है जिसे वह अपने विजन 2030 के तहत बड़ी मेहनत से तराश रहा है। खाड़ी देशों में शांति, सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य है कि सऊदी नेतृत्व चापलूसी और दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर कठोर जमीनी सच को स्वीकार करे। यदि समय रहते मक्का पैक्ट की इस कमजोर कड़ी को बाहर नहीं किया गया, तो यह समझौता सऊदी अरब की विदेश नीति की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक दर्ज किया जाएगा, जिससे रियाद का क्षेत्रीय प्रभाव मजबूत होने के बजाय कमजोर हो जाएगा और उसके विरोधी इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाने में कामयाब हो जाएंगे।