उम्र की रेस में पिछड़ा पाकिस्तान, मगर बांग्लादेशी जी रहे भारत से ज्यादा; WHO की रिपोर्ट में जीवन प्रत्याशा का चौंकाने वाला खुलासा!
दक्षिण एशिया में इंसानी सेहत और जीवन की अवधि को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा रिपोर्ट ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) के ताजा आंकड़ों के विश्लेषण से साफ हुआ है कि इस क्षेत्र में उम्र की रेस काफी दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। जहां एक तरफ भारत ने कोरोना महामारी के गहरे संकट से उबरते हुए अपनी औसत आयु को 71 वर्ष तक पहुंचा दिया है, वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान आर्थिक बदहाली और चरमराती स्वास्थ्य सेवाओं के कारण 68.2 वर्ष पर ही अटक कर काफी पिछड़ गया है। हालांकि, सबसे ज्यादा हैरान करने वाली तस्वीर बांग्लादेश से सामने आई है, जहां के नागरिक औसत रूप से 72.7 वर्ष का जीवन जी रहे हैं और लंबी उम्र के मामले में भारत व पाकिस्तान दोनों को पीछे छोड़ते हुए बढ़त बनाए हुए हैं।
दक्षिण एशिया में उम्र का खेल: भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का तुलनात्मक लेखा-जोखा
डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण एशियाई देशों में स्वास्थ्य संकेतकों और प्राथमिक चिकित्सा तक पहुंच ने जीवन के वर्षों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। भारत में जहां 2019 में औसत जीवन प्रत्याशा 70.5 वर्ष थी, महामारी के दौरान गिरकर 68.1 वर्ष तक पहुंच गई थी, लेकिन 2021 से 2023 के बीच तेजी से रिकवरी करते हुए यह आंकड़ा 71 वर्ष पर पहुंच गया। पाकिस्तान की बात करें तो वहां की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है, जहां औसत उम्र केवल 68.2 वर्ष दर्ज की गई है। दूसरी ओर, बांग्लादेश ने सामाजिक विकास, महिला सशक्तिकरण और जमीनी स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (Primary Healthcare) के दम पर 72.7 वर्ष की औसत उम्र हासिल की है। वैश्विक स्तर पर देखें तो विकसित देशों जैसे अमेरिका में औसत जीवन प्रत्याशा 78.5 वर्ष और कनाडा में 81.4 वर्ष दर्ज की गई है, जबकि पूरी दुनिया की औसत उम्र 73.3 वर्ष के आसपास है।
उम्र तो बढ़ी लेकिन क्या सेहतमंद है जिंदगी? 'हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी' का सच
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का एक सबसे अहम और विचारणीय पहलू केवल सांसें गिनना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन प्रत्याशा यानी 'हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी' (HALE) है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुल जीवन प्रत्याशा 71 साल जरूर छू चुकी है, लेकिन स्वस्थ अवस्था में बिताए जाने वाले वर्षों का आंकड़ा केवल 60.6 वर्ष ही है। वर्ष 2019 में यह 60.5 वर्ष था, जो महामारी में घटकर 58.4 वर्ष हुआ और अब मामूली बढ़त के साथ 60.6 वर्ष पर लौटा है। इसका सीधा और कड़वा मतलब यह है कि भारत में एक आम इंसान जिंदगी के आखिरी करीब 10.4 साल किसी न किसी पुरानी बीमारी, शारीरिक कमजोरी या दवाओं के सहारे बिताने को मजबूर है।
60 की उम्र पार करने वाले बुजुर्गों की स्थिति: कितने साल का सहारा?
रिपोर्ट में बुजुर्ग आबादी को लेकर भी बेहद सटीक आकलन प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार, भारत में जो व्यक्ति 60 वर्ष की आयु सफलतापूर्वक पूरी कर लेता है, वह आगे औसतन 18.8 वर्ष और जीवित रहने की उम्मीद कर सकता है। वर्ष 2019 में यह उम्मीद 18.4 वर्ष थी। लेकिन चिंता की बात यह है कि इन मिले हुए अतिरिक्त 18.8 वर्षों में से केवल 13.7 वर्ष ही व्यक्ति पूरी तरह निरोगी और सक्रिय जीवन के रूप में बिता पाता है। बाकी के करीब पांच साल गठिया, डिमेंशिया, हृदय विकार और गतिशीलता में कमी जैसी गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की भेंट चढ़ जाते हैं।
बीमारियों का बदलता मिजाज: संक्रामक रोगों से लाइफस्टाइल बीमारियों की ओर बढ़ता दबाव
पिछले दो दशकों के दौरान भारत में मौत के कारणों में जमीन-आसमान का बदलाव देखा गया है। साल 2000 में देश के शीर्ष 10 मृत्यु कारणों में टीबी, डायरिया और निमोनिया जैसी संक्रामक (Infectious) बीमारियों की हिस्सेदारी 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी रोग (NCDs) 34 प्रतिशत थे। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। अब देश में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत मौतों का मुख्य कारण गैर-संचारी रोग बन चुके हैं, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी सिमटकर केवल 16 प्रतिशत रह गई है। डायबिटीज (मधुमेह), हाइपरटेंशन, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, कैंसर और सांस से जुड़ी पुरानी बीमारियां (COPD) अब समय से पहले जान ले रही हैं, जो सीधे तौर पर बिगड़ती जीवनशैली, खानपान और शारीरिक निष्क्रियता का परिणाम हैं।
बांग्लादेश कैसे निकल गया आगे और पाकिस्तान क्यों पिछड़ गया?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश ने पिछले तीन दशकों में बाल मृत्यु दर घटाने, स्वच्छ पेयजल, खुले में शौच से मुक्ति और बुनियादी टीकाकरण के साथ-साथ ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स) के नेटवर्क को बहुत मजबूत किया है। इसका सीधा असर वहां की महिलाओं और बच्चों की औसत आयु पर पड़ा, जिससे उनका राष्ट्रीय औसत भारत से भी ऊपर निकल गया। इसके विपरीत पाकिस्तान में स्वास्थ्य बजट की भारी कमी, राजनीतिक अस्थिरता, कुपोषण, मातृत्व मृत्यु दर की ऊंची दर और टीबी व पोलियो जैसी बीमारियों से लगातार जूझने की वजह से औसत उम्र 68.2 वर्ष पर सिमटी रह गई। भारत के लिए यह रिपोर्ट एक चेतावनी भी है कि केवल अस्पताल और दवाएं बढ़ाना काफी नहीं होगा, बल्कि प्राथमिक स्तर पर लाइफस्टाइल रोगों की रोकथाम ही लोगों को लंबी और स्वस्थ जिंदगी दे सकती है।