मिडिल ईस्ट तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर: अमेरिका संग तनाव के बीच ईरानी सांसद की इस चेतावनी से सहमी दुनिया
मध्य पूर्व यानी मिडिल ईस्ट की भू-राजनीतिक स्थिति इस समय एक ऐसे बेहद खतरनाक मोड़ पर आ पहुंची है, जहां से हालात किसी भी पल अनियंत्रित होकर पूरी दुनिया को एक भयानक तबाही की आग में झोंक सकते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी और कूटनीतिक खटास के बीच अब तेहरान की ओर से एक ऐसी डरावनी चेतावनी सामने आई है जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। ईरान के एक वरिष्ठ और प्रभावशाली सांसद ने खुलकर यह बयान दिया है कि मौजूदा हालात को देखते हुए यह पूरा क्षेत्र अब तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, जिससे पूरी मानवता पर भारी संकट मंडरा रहा है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों द्वारा क्षेत्र में लगातार सैन्य तैनाती बढ़ाने, आर्थिक प्रतिबंधों का शिकंजा कसने और आक्रामक तेवर अपनाने के बाद से ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। खाड़ी देशों से लेकर लाल सागर और स्ट्रेट ऑफ होरमुज तक फैले इस सामरिक क्षेत्र में जिस तरह से युद्धपोत, मिसाइल सिस्टम और फाइटर जेट्स का जमावड़ा लगा हुआ है, उससे किसी भी एक छोटी सी चिंगारी से महायुद्ध भड़कने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैश्विक शांति के पैरोकार देश इस समय गहरी चिंता में डूबे हुए हैं और कूटनीतिक चैनलों के जरिए तनाव को कम करने के तमाम प्रयास विफल होते नजर आ रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति के और अधिक विस्फोटक होने की पूरी संभावना बनी हुई है।
अमेरिका और ईरान के बीच गहराता भू-राजनीतिक संकट और बढ़ते तनाव की असली वजह
अमेरिका और ईरान के आपसी रिश्तों में तनाव का यह दौर कोई नया नहीं है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में जिस तरह की घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने इस पुराने बैर को एक बिल्कुल नए और खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। तेहरान और वाशिंगटन के बीच परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने, ईरानी जनरलों की लक्षित हत्याओं और खाड़ी क्षेत्र में होने वाली सैन्य गतिविधियों के कारण दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती चली गई है। ईरानी संसद के भीतर और बाहर जिस आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब ईरान किसी भी प्रकार के अमेरिकी दबाव या धमकियों के आगे झुकने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिका अपने रणनीतिक हितों की रक्षा और इजराइल जैसे करीबी सहयोगियों की सुरक्षा का हवाला देते हुए मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य उपस्थिति को लगातार मजबूत कर रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच टकराव की गुंजाइश हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। इस कूटनीतिक गतिरोध के बीच सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बातचीत के तमाम दरवाजे लगभग बंद होते जा रहे हैं और दोनों पक्ष अपनी-अपनी सैन्य तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं, जिससे क्षेत्र के आम नागरिकों के मन में एक अनिश्चितता और खौफ का माहौल पैदा हो गया है।
क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराता खतरा और खाड़ी देशों की बढ़ती हुई गहरी चिंताएं
मिडिल ईस्ट में पनप रहे इस युद्ध जैसे हालात का सबसे बुरा असर न केवल सीधे तौर पर शामिल देशों पर पड़ेगा, बल्कि इसका सीधा और घातक प्रभाव पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ना तय है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन जैसे खाड़ी के अन्य देश इस बात से सबसे ज्यादा डरे हुए हैं कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष शुरू होता है, तो उनकी अपनी आर्थिक प्रगति, तेल उत्पादन और बुनियादी ढांचे को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। स्ट्रेट ऑफ होरमुज दुनिया के कच्चे तेल के परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, और यदि इस क्षेत्र में कोई युद्ध भड़कता है, तो तेल के वैश्विक दाम आसमान छूने लगेंगे जिससे पूरी दुनिया में महंगाई का एक भयंकर बवंडर खड़ा हो जाएगा। क्षेत्रीय देश लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि जमीन पर चल रही सैन्य तैयारियां इन शांति वार्ताओं पर भारी पड़ती नजर आ रही हैं। छोटे खाड़ी देश इस कशमकश में फंसे हुए हैं कि वे अमेरिका के सुरक्षा छत्रछाया को छोड़ भी नहीं सकते और ईरान के पड़ोस में होने के कारण उसके गुस्से का शिकार भी नहीं बनना चाहते, जिससे उनकी कूटनीतिक स्थिति बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण हो गई है।
ग्लोबल इकोनॉमी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ने वाले युद्ध के भयानक दुष्परिणाम
इतिहास इस बात गवाह है कि जब-जब मिडिल ईस्ट की धरती पर युद्ध के बादल मंडराए हैं, तब-तब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को उसके भयानक परिणाम भुगतने पड़े हैं और आज की वैश्विक स्थिति भी इससे अलग नहीं है। ईरानी सांसद द्वारा दी गई विश्व युद्ध की चेतावनी के बाद अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में सुस्ती और निवेशकों के बीच डर का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि कोई भी निवेशक युद्ध के अनिश्चित माहौल में अपना पैसा लगाने से कतराता है। कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में किसी भी प्रकार का भारी उछाल सीधे तौर पर भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। इसके अलावा, वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों, उर्वरकों और आवश्यक वस्तुओं के दाम दुनिया भर में बढ़ सकते हैं। दुनिया के तमाम बड़े देश और आर्थिक संगठन इस संभावित तबाही को टालने के लिए पर्दे के पीछे से लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि वैश्विक व्यापार को इस आसन्न संकट से बचाया जा सके और दुनिया को एक और महाविनाश की विभीषिका का सामना न करना पड़े।
कूटनीति की विफलता और तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच भविष्य का अनिश्चित परिदृश्य
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को यदि बहुत बारीकी से परखा जाए, तो यह साफ नजर आता है कि पारंपरिक कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच इस समय अमेरिका और ईरान के बीच के इस कड़े टकराव को रोकने में पूरी तरह से बेबस नजर आ रहे हैं। जब देशों के बीच संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं और केवल हथियारों की भाषा बोली जाने लगती है, तब इतिहास खुद को दोहराने के लिए मजबूर हो जाता है और यही वह बात है जो आज दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और शांति प्रेमियों को सबसे ज्यादा डरा रही है। ईरान के संसद की यह चेतावनी केवल एक जुबानी जंग का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह उस जमीनी गुस्से और सैन्य तैयारी का प्रतिबिंब है जिसे तेहरान पिछले कई वर्षों से झेल रहा है। आने वाले कुछ सप्ताह और महीने पूरी दुनिया के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं, क्योंकि यह तय करेंगे कि कूटनीति की जीत होती है या फिर अहंकार और हथियारों की होड़ दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के काले कुएं में धकेल देती है। मानवता के हित में यही उम्मीद की जा रही है कि तमाम महाशक्तियां अपनी जिद को छोड़कर बातचीत की मेज पर लौटेंगी और इस सुलगते हुए मिडिल ईस्ट को एक और बड़ी तबाही से बचाने के लिए कोई ठोस और व्यावहारिक समाधान निकालेंगे।