IBSA देशों का बड़ा अल्टीमेटम, इजरायल और पाकिस्तान को दो टूक फटकार
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। इसी कड़ी में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के प्रभावशाली त्रिपक्षीय संगठन आईबीएसए (IBSA) ने एक बार फिर दुनिया के सबसे शक्तिशाली कूटनीतिक मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता की जोरदार वकालत की है। न्यूयॉर्क में आयोजित उच्च स्तरीय बैठकों और वैश्विक कूटनीतिक हलचलों के बीच आईबीएसए देशों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि आधुनिक दुनिया की वास्तविक सच्चाइयों को नजरअंदाज कर पुरानी व्यवस्था को अब और नहीं खींचा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को तत्काल स्थायी सीट देने का यह कड़ा अल्टीमेटम वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ लेकर आया है। इसके साथ ही इस ऐतिहासिक बैठक में मध्य पूर्व के सुलगते हालात पर इजरायल की आक्रामक रणनीतियों और दक्षिण एशिया में आतंकवाद को संरक्षण देने वाले पाकिस्तान को भी आईना दिखाया गया है।
UNSC में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता: आईबीएसए का साझा और सख्त रुख
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सुरक्षा परिषद की संरचना को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन अब बदलाव की मांग दबाए नहीं दब रही है। आईबीएसए समूह ने स्पष्ट किया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का वर्तमान स्वरूप बीसवीं सदी की हकीकत को दर्शाता है, जबकि इक्कीसवीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए इसमें व्यापक सुधार की सख्त जरूरत है। भारत जैसी दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, तेजी से उभरती आर्थिक ताकत और वैश्विक शांति स्थापना में सबसे आगे रहने वाले देश को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट से वंचित रखना अब पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अतार्किक हो चुका है। आईबीएसए देशों ने वैश्विक मंच से साफ कर दिया है कि यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता और साख बचाए रखनी है, तो विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले इस निकाय में उचित प्रतिनिधित्व देना ही होगा। यह मांग अब केवल भारत की अकेले की आवाज नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के सामूहिक संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है।
आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता: पाकिस्तान पर सीधा कूटनीतिक प्रहार
दक्षिण एशिया में लंबे समय से शांति और स्थिरता के सबसे बड़े दुश्मन बने आतंकवाद के मुद्दे पर आईबीएसए मंच से पाकिस्तान को तीखी फटकार लगाई गई है। बैठक के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि आतंकवाद किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है और इसे नीति के रूप में इस्तेमाल करने वाले देशों को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग किया जाना चाहिए। भारत के खिलाफ सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने की साजिशों का जिक्र करते हुए वैश्विक ताकतों को चेताया गया कि दोहरे मापदंड अब नहीं चलेंगे। आतंकवाद को पालने-पोसने वाले देशों को अब अपने हर कृत्य का हिसाब देना होगा। वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन चुके इस नासूर को खत्म करने के लिए दुनिया के सभी जिम्मेदार देशों को एक मंच पर आकर कड़े कदम उठाने होंगे, जिससे यह साफ हो गया है कि आतंकवाद के मुद्दे पर अब किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी।
मध्य पूर्व का सुलगता संकट और इजरायल की नीतियों पर दो टूक आलोचना
गाजा और लेबनान समेत पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में मची तबाही और लगातार बिगड़ते हालातों को लेकर भी आईबीएसए देशों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों और अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए वैश्विक मंच से सख्त संदेश दिया गया है। युद्ध और हिंसक टकराव के कारण आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की हो रही मौतों को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से संघर्ष विराम लागू करने की मांग की गई है। जानकारों का मानना है कि जिस प्रकार से मध्य पूर्व में संघर्ष का दायरा बढ़ रहा है, उससे वैश्विक शांति और ऊर्जा सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ गए हैं। आईबीएसए ने स्पष्ट किया है कि बल प्रयोग से किसी भी स्थायी समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता, बल्कि इसके लिए कूटनीति, आपसी बातचीत और शांतिपूर्ण समझौतों के रास्ते पर लौटना ही एकमात्र विकल्प है।
वैश्विक कूटनीति का नया अध्याय और बहुपक्षीय व्यवस्था की मजबूती
आज की बदलती दुनिया में जब भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक युद्ध और संसाधनों की जंग अपने चरम पर है, तब आईबीएसए जैसी ताकतों का एकजुट होना वैश्विक संतुलन के लिए बेहद जरूरी हो गया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की यह मांग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायसंगत और समावेशी विश्व व्यवस्था की स्थापना की अनिवार्य शर्त है। भारत को यूएनएसएससी (UNSC) में स्थायी सदस्यता दिलाने का यह अल्टीमेटम दुनिया के उन सभी देशों के लिए एक बड़ा संदेश है जो तानाशाही और एकाधिकारवादी नीतियों के खिलाफ खड़े हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पश्चिमी देश और मौजूदा स्थायी सदस्य इस सामूहिक दबाव पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन इतना तय है कि भारत की बढ़ती वैश्विक धमक और आईबीएसए का यह समर्थन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगा।