Israel Reacts to US-Iran Deal: ट्रंप की ईरान डील से इजरायल में 'भूचाल', बेंजामिन नेतन्याहू के 3 बड़े वादों पर फिरा पानी; जानें क्यों भड़के इजरायली एक्सपर्ट्स
पश्चिम एशिया (Middle East) के युद्ध में इस वक्त का सबसे बड़ा और 'तूफानी' मोड़ सामने आ चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस 'शांति समझौते' (US-Iran Peace Deal) का ढिंढोरा पीटकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, उसने अमेरिका के सबसे करीबी और भरोसेमंद सहयोगी इजरायल के राजनीतिक और सुरक्षा महकमे में भूचाल ला दिया है।
इजरायल के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली हिब्रू अखबार 'येदियुत अहारोनोत' (Yedioth Ahronoth) ने अपने संडे एडिशन की मुख्य हेडलाइन में बिना किसी लाग-लपेट के सिर्फ दो बड़े शब्द— 'बैड डील' (Bad Deal) लिखकर पूरी इजरायली जनता और सरकार का गुस्सा बयां कर दिया है।
प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' (The New York Times) की एक चौंकाने वाली और विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप और ईरान के बीच आकार ले रहा यह नया समझौता उन सभी रणनीतिक लक्ष्यों की धज्जियां उड़ाता है, जिन्हें हासिल करने के लिए इजरायल ने तेहरान के खिलाफ सीधे युद्ध का मोर्चा खोला था। इजरायली खुफिया एक्सपर्ट्स और विपक्षी नेताओं का खुला आरोप है कि डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक स्तर पर खुद को 'शांतिदूत' और विजेता दिखाने की जल्दबाजी में इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा को दांव पर लगा दिया है। आइए इस कूटनीतिक विश्लेषण में विस्तार से समझते हैं कि इस डील से इजरायल में इतना गुस्सा क्यों है और यह तथाकथित शांति समझौता कैसे एक नए और भयानक महायुद्ध का सबब बन सकता है।
1. क्या है ट्रंप की वो सीक्रेट डील, जिससे इजरायल के उड़े होश?
अमेरिकी और ईरानी राजनयिकों के हवाले से लीक हुए समझौते के मुख्य बिंदु इजरायल के सैन्य जनरलों के लिए किसी बड़े कूटनीतिक झटके से कम नहीं हैं:
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60 दिनों का नया सस्पेंस: शुरुआती ड्राफ्ट के अनुसार, यह समझौता इस साल अप्रैल में हुए युद्धविराम (Ceasefire) को अगले 60 दिनों के लिए और बढ़ा देगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस 60 दिनों के बफर टाइम के दौरान अमेरिका और ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) और अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को स्थायी रूप से हटाने को लेकर पर्दे के पीछे बेहद गोपनीय और विस्तृत बातचीत करेंगे।
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लेन-देन का खेल शुरू: शुरुआती मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) के तहत, ईरान दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) से अपनी नौसेना हटाकर उसे पूरी दुनिया के लिए खोल देगा। इसके बदले में, अमेरिका ने भी बड़ा दिल दिखाते हुए ईरान के सभी प्रमुख बंदरगाहों पर लगी अपनी सख्त आर्थिक, व्यापारिक और नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) को तत्काल प्रभाव से हटाने का वादा किया है।
2. नेतन्याहू के तीन बड़े राष्ट्रीय वादे, जिन्हें ट्रंप ने किया पूरी तरह 'इग्नोर'
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) ने इस युद्ध की शुरुआत में देश की जनता को संबोधित करते हुए कसम खाई थी कि वे इस बार ईरान से जुड़े 'अस्तित्व के खतरे' (Existential Threat) को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देंगे। लेकिन ट्रंप की इस 'डील' ने नेतन्याहू के इन तीनों मुख्य मोर्चों पर पानी फेर दिया है:
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परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम पर रहस्यमयी चुप्पी: इजरायल का मुख्य सैन्य लक्ष्य ईरान के भूमिगत परमाणु ठिकानों और उसकी लंबी दूरी की घातक बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को हवाई हमलों के जरिए पूरी तरह जमींदोज करना था। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय डील के जो विवरण सार्वजनिक हुए हैं, उनमें ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को रोकने या नष्ट करने का कोई जिक्र ही नहीं है।
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तेहरान के 'प्रॉक्सी नेटवर्क्स' को खुली छूट: इजरायल की सबसे बड़ी मांग थी कि तेहरान अपने पाले हुए हथियारबंद गुटों—जैसे लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हुथी विद्रोही और गाजा में हमास को वित्तीय फंडिंग और आधुनिक हथियारों (ड्रोन-मिसाइल) की सप्लाई पूरी तरह बंद करे। ट्रंप की इस डील में ईरान के इस खतरनाक 'प्रॉक्सी नेटवर्क' की नकेल कसने के लिए कोई स्पष्ट या कड़ा मैकेनिज्म ही नहीं रखा गया है।
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ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' का सपना टूटा: नेतन्याहू और इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का मानना था कि इस सीधी जंग के आर्थिक और सैन्य दबाव के जरिए ईरान के अंदर आयतुल्लाह खामेनेई की तानाशाही सरकार के खिलाफ जनता सड़क पर उतरेगी और राजनीतिक तख्तापलट (Regime Change) होगा। लेकिन ट्रंप की इस आर्थिक डील ने बदहाल हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था और वहां की सरकार को एक नया जीवनदान (संजीवनी) दे दिया है।
3. इजरायली नेताओं की खुली चेतावनी: 'यह इजरायल के लिए ऐतिहासिक तबाही है'
जहां एक तरफ वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप इसे 21वीं सदी की अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक और ऐतिहासिक जीत की तरह पेश कर रहे हैं, वहीं तेल अवीव में इजरायल के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार याकोव नागेल ने लाल झंडी दिखाते हुए चेतावनी दी है कि इजरायल के अस्तित्व और सुरक्षा से जुड़े मुख्य कोर मुद्दों को बातचीत के एजेंडे से ही गायब कर दिया गया है।
इजरायल के विपक्षी नेता इस मुद्दे पर और भी ज्यादा आक्रामक और तीखे तेवर अपनाए हुए हैं:
एविग्डोर लिबरमैन (पूर्व रक्षा मंत्री, इजरायल): "अमेरिकी राष्ट्रपति का यह तथाकथित शांति प्रस्ताव इजरायल के राष्ट्रीय हितों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है और यह हमारे देश के लिए एक बहुत बड़ी 'ऐतिहासिक तबाही' (Catastrophe) साबित होने वाला है।"
याइर लैपिड (विपक्षी नेता, इजरायल): "अगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही ये खबरें 100% सच हैं, तो यह इजरायल के इतिहास की विदेश और सुरक्षा नीति की अब तक की सबसे बड़ी, शर्मनाक और अक्षम्य नाकामी है।"
4. लेबनान और हिज़्बुल्लाह फ्रंट पर फंसा असली रणनीतिक पेंच
सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, इस डील का सबसे घातक और तात्कालिक असर लेबनान (Lebanon) में जारी इजरायली रक्षा बलों (IDF) के जमीनी सैन्य अभियान पर पड़ने वाला है। इस साल फरवरी के आखिर में शुरू हुई लेबनान जंग में ईरान की कूटनीतिक चाल यह है कि अमेरिका के साथ होने वाले किसी भी वैश्विक शांति समझौते में लेबनान और हिज़्बुल्लाह को भी सुरक्षा कवच के तौर पर शामिल किया जाए।
इसके उलट, इजरायल की सैन्य रणनीति यह थी कि हिज़्बुल्लाह के खिलाफ उसका युद्ध तब तक जारी रहे जब तक कि वह लिटानी नदी के पार न चला जाए, और यह मोर्चा तेहरान के साथ होने वाली वार्ताओं से पूरी तरह अलग (Isolated) रहे। लेकिन ट्रंप की यह नई डील इन दोनों मोर्चों को आपस में जोड़ती दिख रही है, जिससे लेबनान में इजरायल के हाथ पूरी तरह बंध जाएंगे और वह हिज़्बुल्लाह पर बड़े हमले नहीं कर पाएगा।
5. प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लाचारी: अक्टूबर चुनाव और ट्रंप का डर
इजरायल के आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो वहां आगामी अक्टूबर 2026 के अंत में देश के आम चुनाव होने की प्रबल संभावना है। ऐसे में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर अपनी ही दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के कट्टरपंथी सहयोगियों (जैसे बेन-गवीर और स्मोट्रिच) और विपक्ष का भारी दबाव है कि वे वाशिंगटन के दबाव के आगे घुटने न टेकें।
यही वजह है कि नेतन्याहू चाहकर भी खुलकर डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की आलोचना नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वे इजरायली जनता के सामने हमेशा ट्रंप को अपना और इजरायल का सबसे बड़ा राजनीतिक मददगार और दोस्त बताते आए हैं। अपनी इस राजनीतिक लाचारी को छिपाते हुए नेतन्याहू ने केवल एक संक्षिप्त बयान जारी कर कहा कि, "जब तक मैं इजरायल का प्रधानमंत्री हूं, ईरान को कभी भी परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) नहीं बनाने दूंगा और राष्ट्रपति ट्रंप भी इस मुद्दे पर मेरे साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।" लेकिन उन्होंने मिसाइल प्रोग्राम, होर्मुज जलडमरूमध्य और हिज़्बुल्लाह की री-फंडिंग के मुद्दों पर एक रहस्यमयी चुप्पी साध ली, जो इजरायल के डर को साफ दर्शाती है।
क्या वाकई यह समझौता नए महायुद्ध की शुरुआत है?
डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि अमेरिका ने इजरायल को भरोसे में लिए बिना ईरान पर से प्रतिबंध हटा लिए, तो इजरायल अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए वाशिंगटन के आदेशों की अनदेखी करते हुए ईरान के न्यूक्लियर सेंटर्स (जैसे नतांज और फोर्डो) पर एकतरफा और आत्मघाती हवाई हमला (Unilateral Military Strike) कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह समझौता शांति लाने के बजाय मध्य पूर्व में एक ऐसे विनाशकारी महायुद्ध को जन्म दे देगा, जिसमें अमेरिका और खाड़ी देशों का कूदना अनिवार्य हो जाएगा।