अहमदाबाद एअर इंडिया प्लेन क्रैश की पहली बरसी: क्या कॉर्पोरेट दबाव में दबाई जा रही है 260 मौतों की असली ब्लैक बॉक्स रिपोर्ट?
आज से ठीक एक साल पहले, 12 जून 2025 की तपती दोपहर को अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक ऐसी त्रासदी हुई जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। एअर इंडिया की फ्लाइट एआई-171 (बोइंग 787 ड्रीमलाइनर) ने कुल 242 लोगों के साथ लंदन के गैटविक एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी थी। लेकिन टेकऑफ के महज 32 सेकंड बाद हवा में कुछ ऐसा रहस्यमयी हुआ कि विमान सीधे नीचे आ गिरा।
एविएशन इंडस्ट्री का एक बेहद कड़ा अंतरराष्ट्रीय नियम है, जिसे ICAO Annex-13 कहा जाता है। इस नियम के मुताबिक, किसी भी बड़े विमान हादसे के ठीक 12 महीने के भीतर उसकी अंतिम (Final) ब्लैक बॉक्स जांच रिपोर्ट दुनिया के सामने आनी अनिवार्य है। आज इस हादसे को पूरा एक साल बीत चुका है, लेकिन फाइनल रिपोर्ट का अब तक अता-पता नहीं है। आखिर इस देरी के पीछे कौन सा कॉर्पोरेट प्रेशर काम कर रहा है? आइए, इस पूरे घटनाक्रम को बिना किसी घुमाव के सीधे फैक्ट्स के साथ समझते हैं।
फ्लाइट 171 का वो आखिरी सफर: टाइमलाइन और आंकड़े
उस दोपहर विमान में 230 पैसेंजर्स सवार थे, जिनमें 161 भारतीय और 53 ब्रिटिश नागरिक शामिल थे। कॉकपिट में बेहद अनुभवी कैप्टन सुमीत सभरवाल और फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंडर मौजूद थे। सब कुछ सामान्य था, लेकिन लिफ्ट-ऑफ के सिर्फ 32 सेकंड के भीतर ड्रीमलाइनर अहमदाबाद के बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल ब्लॉक से जा टकराया।
सीसीटीवी फुटेज से साफ था कि विमान में बाहर से कोई ब्लास्ट नहीं हुआ था। विमान उड़ा, लेकिन अचानक उसकी ऊंचाई बढ़ने के बजाय वह हवा में लटक गया और ग्लाइड करता हुआ सीधा नीचे आ गिरा।
कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का सबसे बड़ा सस्पेंस
हादसे के एक महीने बाद, जुलाई 2025 में विमानन दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट ने एक नई और भयानक थ्योरी को जन्म दे दिया। डेटा से पता चला कि टेकऑफ के तुरंत बाद विमान के दोनों इंजनों के फ्यूल कंट्रोल स्विचेस (जो आमतौर पर जमीन पर इंजन शुरू या बंद करने के लिए होते हैं) अचानक 'रन' पोजीशन से 'कटऑफ' पोजीशन पर चले गए थे। यानी हवा में ही इंजनों को मिलने वाली ईंधन की सप्लाई काट दी गई थी।
इससे भी ज्यादा सनसनीखेज खुलासा कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) से हुआ, जिसमें पायलटों के बीच की बातचीत रिकॉर्ड थी:
कॉकपिट के भीतर के आखिरी शब्द
पहला पायलट: "तुमने फ्यूल सप्लाई क्यों काटी?"
दूसरा पायलट: "मैंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया!"
(इसके ठीक अगले ही पल विमान क्रैश हो जाता है)
इस बातचीत को आधार बनाकर 'न्यूजवीक' और 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों ने तुरंत यह नैरेटिव चलाना शुरू कर दिया कि शायद पायलट ने जानबूझकर यह आत्मघाती कदम उठाया था। अमेरिकी विशेषज्ञों ने भी तुरंत बयान दे दिया कि यह विमान की खराबी नहीं, बल्कि कॉकपिट के अंदर किसी इंसान की करतूत है।
पायलटों का बचाव और सिस्टम फेलियर की थ्योरी
क्या यह सच वाकई उतना सीधा है जितना दिखाया जा रहा है? भारत के लगभग 6 हजार पायलटों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने इस शुरुआती रिपोर्ट को पूरी तरह से पक्षपाती बताया है। फेडरेशन के अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा ने साफ कहा कि जब एक पायलट मर जाता है, तो विमान बनाने वाली मैन्युफैक्चरर कंपनी को बचाने के लिए अक्सर सारा दोष मरे हुए पायलट पर मढ़ दिया जाता है।
कैप्टन सुमीत के 91 वर्षीय पिता पुष्कर राज सभरवाल ने इस एकतरफा थ्योरी के खिलाफ भारत के सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए निर्देश दिया कि जांच पूरी होने से पहले फ्लाइट क्रू को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता।
अमेरिकी व्हिसलब्लोअर संगठन 'फाउंडेशन फॉर एविशन सेफ्टी' के प्रमुख एड पीयर्सन ने बोइंग की थ्योरी को खारिज करते हुए दस्तावेजी सबूत पेश किए। उन्होंने दावा किया कि हादसे का शिकार हुए इस विशिष्ट ड्रीमलाइनर (VT-ANB) का पुराना इलेक्ट्रिकल ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब था।
तो क्या तकनीकी खराबी ने खुद बंद किए थे दोनों इंजन?
खोजी पत्रकारों और एविएशन इंजीनियर्स की मानें तो इस विमान के 'कोर नेटवर्क' (विमान का सेंट्रल नर्वस सिस्टम) में उड़ान से पहले ही एक तकनीकी खराबी मौजूद थी।
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सॉफ्टवेयर का भ्रम: एक मजबूत थ्योरी यह कहती है कि टेकऑफ के ठीक बाद विमान के मुख्य कंप्यूटर में एक बड़ा इलेक्ट्रिकल फेलियर हुआ, जिससे सिस्टम्स रीबूट हो गए। इस रीबूट की वजह से विमान के सॉफ्टवेयर को कुछ सेकंड के लिए ऐसा भ्रम हुआ कि विमान अभी जमीन पर ही है, जबकि वह हवा में था। सिस्टम ने हाई थ्रस्ट को एक खराबी समझा और ऑटोमैटिक कमांड जनरेट करके दोनों इंजनों की ईंधन सप्लाई खुद काट दी। यानी पायलटों ने उन बटनों को छुआ तक नहीं था।
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रैम एयर टरबाइन (RAT) का खुलना: इसका सबसे बड़ा सबूत है विमान का 'रैट' प्रोपेलर खुलना, जो मेन पावर फेल होने पर विमान को आपातकालीन पावर देने के लिए हवा के दबाव से अपने आप खुलता है। सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि यह रैट टेकऑफ के फौरन बाद ही खुल गया था। एअर इंडिया के सिमुलेटर टेस्ट बताते हैं कि इस रैट को पूरी तरह एक्टिव होने में 14 से 18 सेकंड का समय लगता है। इसका साफ मतलब है कि विमान में गड़बड़ी फ्यूल स्विच बंद होने से काफी पहले, शायद रनवे पर दौड़ते समय ही शुरू हो चुकी थी।
वॉकवे टू लाइफ: इकलौते सर्वाइवर की चमत्कारिक कहानी
इस भीषण प्लेन क्रैश में एक शख्स ऐसा भी था जो साक्षात मौत के मुंह से जिंदा बाहर निकल आया। 40 वर्षीय ब्रिटिश नागरिक विश्वास कुमार रमेश उस दिन खिड़की वाली सीट नंबर 11A पर बैठे थे। जैसे ही विमान बीजे मेडिकल कॉलेज की इमारत से टकराया, इसके विंग्स में मौजूद सेंट्रल फ्यूल टैंक में जबरदस्त धमाका हुआ।
लेकिन किस्मत देखिए, इंपैक्ट के ठीक उसी सेकंड विमान का मुख्य ढांचा कॉकपिट और रो 11 के ठीक सामने से पूरी तरह अलग (Split) हो गया। इस स्ट्रक्चरल स्प्लिट ने सीट नंबर 11A को उस भयानक टक्कर के सीधे दबाव से बचा लिया जिसने आगे की सीटों को कुचल दिया था। केबिन की टूटी हुई दीवार ने कुछ पलों के लिए आग के गोलों को उन तक आने से रोक दिया। विश्वास ने बिना वक्त गंवाए उस फटे हुए मलबे के रास्ते से बाहर छलांग लगा दी।
लेकिन इस चमत्कार की कीमत बहुत भारी थी। उनके ठीक बगल में सीट 11J पर बैठा उनका छोटा भाई अजय कुमार रमेश इस हादसे में मारा गया। आज विश्वास कुमार रमेश इंग्लैंड के लीसेस्टर में इस गंभीर मानसिक आघात और सर्वाइवर गिल्ट (खुद के बच जाने का अफसोस) से जूझ रहे हैं। उनके यूके बेस्ड वकील रैड सीगर अब एअर इंडिया और बोइंग के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में एक बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
मुआवजा विवाद और आंतरिक मतभेद
यह जांच कितनी उलझ चुकी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि AAIB की फ्लाइट ऑपरेशंस ग्रुप के सबसे सीनियर एक्सपर्ट और दिग्गज बोइंग 787 पायलट कैप्टन आरएस संधू ने इस साल जनवरी से जांच की मीटिंग्स में जाना ही बंद कर दिया है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, जांच की पारदर्शिता और फैक्ट्स को तोड़ मरोड़कर पेश करने को लेकर उनका बाकी अधिकारियों से गंभीर मतभेद हो गया था।
दूसरी तरफ, एअर इंडिया पीड़ितों के परिवारों को 10 से 20 लाख रुपये का अतिरिक्त नकद मुआवजा देकर एक ‘इंडेमनिटी क्लॉज’ (Indemnity Clause) साइन करवा रही है। इस क्लॉज की शर्त यह है कि अगर परिवार यह पैसा लेता है, तो वह भविष्य में एअर इंडिया या बोइंग के खिलाफ अमेरिका या ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय अदालतों में मुकदमा नहीं कर सकता।
पीड़ित परिवारों के वकीलों ने इसे एअर इंडिया की डराने वाली रणनीति बताया है, क्योंकि मॉन्ट्रियल कन्वेंशन 1999 के तहत अगर विमान की तकनीकी खराबी साबित हो जाती है, तो एयरलाइन की वित्तीय देनदारी असीमित हो जाती है और उसे पीड़ितों को करोड़ों का हर्जाना देना पड़ेगा। कॉर्पोरेट घराने अपनी साख बचाने के लिए लॉबिंग कर सकते हैं, लेकिन जो 260 जिंदगियां उस दोपहर खाक हो गईं, उनके पीछे छूटे परिवारों की चीखें आज भी निष्पक्ष इंसाफ की राह देख रही हैं।