अमेरिका ने परमाणु हमला किया तो देंगे करारा जवाब, ईरान की कड़ी धमकी के बीच यूरोप पर टिकी तेहरान की नजर
मध्य पूर्व और दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में इस समय तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है, और इसका सबसे बड़ा कारण ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ता हुआ वाकयुद्ध है। एक तरफ जहां वैश्विक महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों और सुरक्षा को लेकर खींचतान जारी है, वहीं दूसरी तरफ तेहरान के तेवर और भी अधिक आक्रामक हो गए हैं। ईरानी सरकार के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य अधिकारियों की तरफ से एक बार फिर अमेरिका को खुली चेतावनी जारी की गई है। ईरान ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि अमेरिका या उसके किसी भी सहयोगी देश ने उसकी धरती पर कोई भी परमाणु या सैन्य हमला करने की हिमाकत की, तो उसका बेहद करारा और तबाही मचाने वाला जवाब दिया जाएगा। इस तीखी बयानबाजी के बीच ईरानी रणनीतिकारों की नजरें अब यूरोपीय देशों की चाल और उनकी प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है।
तेहरान और वॉशिंगटन के बीच क्यों बढ़ रहा है तनाव?
पिछले कुछ महीनों के दौरान अमेरिका और ईरान के आपसी संबंध किसी भी समय एक बड़े सैन्य टकराव में बदलने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रमों, उसके यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के बढ़ते स्तर और मध्य पूर्व में उसके प्रॉक्सी समूहों की गतिविधियों को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देश लगातार तेहरान पर दबाव बना रहे हैं। अमेरिका और इजराइल जैसे देश यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि ईरान परमाणु हथियारों की दहलीज तक पहुंचे, जबकि ईरान का हमेशा से यह तर्क रहा है कि उसका पूरा परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों और ऊर्जा जरूरतों के लिए है। इसी बुनियादी वैचारिक और सामरिक मतभेद के कारण दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद लगभग ठप हो चुका है और सैन्य मोर्चे पर दोनों तरफ से लगातार धमकियों का दौर जारी है।
ईरान की सैन्य चेतावनी और देश की रक्षा तैयारियां
ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडरों और सरकारी प्रवक्ताओं ने हाल ही में अपने एक आधिकारिक बयान में स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सेना किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि ईरानी सशस्त्र बल अपनी संप्रभुता और देश की भौगोलिक अखंडता की रक्षा करने के लिए पूरी क्षमता रखते हैं। तेहरान ने चेतावनी दी है कि यदि वॉशिंगटन सरकार ने कोई भी दुस्साहसपूर्ण कदम उठाया, तो मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों और उनके हितों को नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। ईरान की इस आक्रामक रणनीति का उद्देश्य अमेरिका और उसके सहयोगियों को किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई करने से रोकना है, ताकि वे कूटनीतिक दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर बात करने के लिए मजबूर हों।
यूरोपीय देशों की संदिग्ध भूमिका और तेहरान की पैनी नजर
इस पूरे भू-राजनीतिक संघर्ष के बीच ईरान की कूटनीति का एक बहुत बड़ा फोकस यूरोप और यूरोपीय संघ (EU) के रुख पर है। तेहरान अच्छी तरह जानता है कि अमेरिका के साथ सीधे टकराव को टालने या नियंत्रित करने में यूरोपीय देश एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख यूरोपीय देश अभी तक अमेरिकी नीतियों के ही समर्थन में खड़े नजर आए हैं और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों को बनाए रखने की वकालत करते रहे हैं। इसके बावजूद, ईरान लगातार यूरोपीय राजधानियों के साथ अपने राजनयिक चैनलों को खुला रखने की कोशिश कर रहा है ताकि यदि वॉशिंगटन के साथ कोई गंभीर संकट पैदा हो, तो यूरोपीय देशों के जरिए कुछ कूटनीतिक गुंजाइश बनाई जा सके। तेहरान की यह पैनी नजर इस बात का संकेत है कि वह केवल सैन्य ताकत के भरोसे नहीं, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी पूरी चालें चल रहा है।
वैश्विक शांति के लिए मंडराते खतरे और आगे की राह
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा यह शीत युद्ध और इस तरह की परमाणु धमकियां पूरी दुनिया के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुकी हैं। यदि इन दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष छिड़ जाता है, तो इसके परिणाम न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं। कच्चे तेल की आपूर्ति से लेकर अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार तक सब कुछ भारी संकट में पड़ सकता है। दुनिया भर के शांतिप्रिय देश और संयुक्त राष्ट्र (UN) लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर जिस प्रकार की आक्रामक बयानबाजी और सैन्य तैयारियां चल रही हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिन वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद उथल-पुथल भरे और संवेदनशील रहने वाले हैं।