ट्रंप के दो टूक इनकार और पाकिस्तान की बेरुखी से कैसे बढ़ गई प्रिंस सलमान की मुश्किलें

ट्रंप के दो टूक इनकार और पाकिस्तान की बेरुखी से कैसे बढ़ गई प्रिंस सलमान की मुश्किलें

मध्य पूर्व (Middle East) के भू-राजनीतिक गलियारों से एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आ रही है जो दुनिया के सबसे ताकतवर देशों और तेल समृद्ध खाड़ी देशों के बीच चल रहे कूटनीतिक समीकरणों की कलई खोलकर रख देती है। यमन के हूती (Houthi) विद्रोहियों लगातार बढ़ते हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के खौफ से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका और अन्य सहयोगियों से गुहार लगाई थी। लेकिन अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पारंपरिक सहयोगी पाकिस्तान की तरफ से उम्मीद के मुताबिक मदद न मिलने के कारण सऊदी अरब की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। ट्रंप के सीधे इनकार के बाद रियाद के रणनीतिकारों को यह अहसास होने लगा है कि मध्य पूर्व के इस खतरनाक संघर्ष में उन्हें अपने देश की रक्षा और सुरक्षा के लिए अब पूरी तरह से अपने दम पर ही रणनीति तैयार करनी होगी।

हूती विद्रोहियों के हमलों से दहल उठा सऊदी अरब और तेल ढांचे का संकट

यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोही पिछले कुछ समय से लगातार सऊदी अरब और उसके पड़ोसी देशों के संवेदनशील ठिकानों, तेल रिफाइनरी और हवाई अड्डों को अपनी ड्रोन और मिसाइल उड़ानों का निशाना बनाते रहे हैं। लाल सागर (Red Sea) और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हूतियों के हमलों ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) को भारी खतरे में डाल दिया है। सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है, क्योंकि एक भी बड़ा हमला देश के आर्थिक ताने-बाने को हिलाकर रख सकता है। हूतियों के इन लगातार और खतरनाक हमलों से त्रस्त होकर ही सऊदी प्रिंस ने पश्चिमी महाशक्तियों और अपने अन्य मुस्लिम सहयोगियों से मिलकर एक मजबूत सैन्य हस्तक्षेप और सुरक्षा गारंटी की मांग की थी।

डोनाल्ड ट्रंप का दो टूक इनकार और अमेरिका की नई मध्य पूर्व नीति

सऊदी अरब की उम्मीदें उस समय धरी की धरी रह गईं जब अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर वापसी करने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने खाड़ी देशों की सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी सेना को सीधे तौर पर किसी नए और बड़े युद्ध में झोंकने से साफ इनकार कर दिया। ट्रंप प्रशासन की 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) नीति के तहत वाशिंगटन अब मध्य पूर्व के अंतहीन युद्धों में अरबों डॉलर खर्च करने और अपने सैनिकों की जान जोखिम में डालने के मूड में बिल्कुल नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को अपनी रक्षा खुद मजबूत करनी चाहिए और अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए वाशिंगटन पर पूरी तरह निर्भर रहने की आदत छोड़ देनी चाहिए। अमेरिका के इस दो टूक रुख ने रियाद के महलों में खलबली मचा दी है क्योंकि वे दशकों से अपनी सैन्य सुरक्षा के लिए अमेरिकी छाता (US Security Umbrella) पर भरोसा करते आए हैं।

पाकिस्तान की बेरुखी और पारंपरिक सैन्य गठबंधनों की असफलता

अमेरिका के अलावा सऊदी अरब को इस संकट की घड़ी में अपने एक अन्य करीबी और पारंपरिक सहयोगी पाकिस्तान से भी वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी। अतीत में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच मजबूत रक्षा समझौते रहे हैं और रियाद ने कई बार आर्थिक तंगी के दौर में पाकिस्तान को अरबों डॉलर का कर्ज और तेल देकर मदद की है। लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों, अपनी आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के चलते पाकिस्तानी हुक्मरान और सेना यमन के संघर्ष या हूतियों के खिलाफ सीधे तौर पर अपनी सेना भेजने का जोखिम उठाने से कतरा रहे हैं। पाकिस्तान की इस बेरुखी और टालमटोल रवैये ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक कूटनीति में केवल पुराने वादों और वित्तीय सहायता के दम पर सैन्य सहयोग की गारंटी नहीं ली जा सकती है, जिससे सऊदी नेतृत्व काफी आहत और असहज महसूस कर रहा है।

खाड़ी देशों की नई कूटनीति और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भविष्य की अनिश्चितताएं

इन तमाम झटकों और चुनौतियों के बाद अब सऊदी अरब ने अपनी विदेश और सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव करना शुरू कर दिया है, ताकि वह भविष्य में किसी भी बाहरी देश की मोहताज न रहे। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए अपने कट्टर क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान के साथ भी कूटनीतिक संवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि बातचीत के जरिए हूती हमलों के खतरे को थामा जा सके। इसके अलावा, सऊदी अरब अपनी खुद की आधुनिक रक्षा तकनीक, एयर डिफेंस सिस्टम और स्वदेशी हथियार उत्पादन क्षमता को मजबूत करने पर भारी निवेश कर रहा है। हूतियों के डर और अमेरिकी धोखे से उपजी इस स्थिति ने खाड़ी क्षेत्र के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है, जहां हर देश को अपनी सुरक्षा की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।