हिजबुल्लाह को मिला सुरक्षा कवच, ट्रंप की नई रणनीति से बदलेगा पश्चिम एशिया का समीकरण
पश्चिम एशिया की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई परदे के पीछे की बातचीत और हालिया 'सहमति पत्र' (MoU) ने इजरायल के सुरक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिन्हें दुनिया 'बीबी' के नाम से जानती है, इस नए अमेरिकी-ईरानी समीकरण को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं।
नेतन्याहू की चिंता: क्यों 'सीक्रेट डील' पर मचा है बवाल?
इजरायल को डर है कि अमेरिका और ईरान की यह नई दोस्ती लेबनान में हिजबुल्लाह के लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करेगी। इजरायली सूत्रों के अनुसार, यह समझौता हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आजादी पर लगाम लगा सकता है। पहले इजरायल लेबनान में जब चाहे हमले करने को स्वतंत्र था, लेकिन अब वाशिंगटन की निगरानी और कड़े सवालों के चलते नेतन्याहू सरकार के हाथ बंध सकते हैं।
पुराना vs नया मैकेनिज्म: रणनीतिक फोकस में बड़ा बदलाव
नवंबर 2024 के पुराने सुरक्षा ढांचे में इजरायल, लेबनान, अमेरिका और फ्रांस जैसे देश बातचीत में सक्रिय थे और इसका मुख्य लक्ष्य हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को खत्म करना था। इसके विपरीत, नए अमेरिकी-ईरानी मैकेनिज्म में इजरायल को दरकिनार कर दिया गया है। नया फोकस हिजबुल्लाह को खत्म करने के बजाय केवल इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच सीधी सैन्य झड़पों को रोकने पर है, जो इजरायल के लिए एक बड़ी रणनीतिक हार जैसा है।
क्या 'प्रॉब्लम सॉल्वर' ट्रंप संभाल पाएंगे दोस्ती?
डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि वे एक 'प्रॉब्लम सॉल्वर' हैं और नेतन्याहू के साथ भी हर समस्या सुलझा लेंगे। हालांकि, अमेरिका के भीतर ही इस समझौते का विरोध शुरू हो गया है। सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे कट्टर समर्थक भी इसे "ऐतिहासिक गलती" मान रहे हैं। एक तरफ ईरान अमेरिका से अपनी शर्तें मनवाने में कामयाब दिख रहा है, तो दूसरी तरफ इजरायल के अक्टूबर चुनावों से पहले नेतन्याहू के लिए यह ढिलाई उनकी राजनीतिक छवि के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।
इजरायल का नया संकट: 'ऑपरेशनल फ्रीडम' पर लगाम
नए समझौते के तहत गठित 'डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल' में पाकिस्तान और कतर जैसे मध्यस्थों को शामिल किया गया है। इजरायल का मानना है कि अब वह तभी हमला कर पाएगा जब खतरा 'सिर पर' होगा, जिससे उभरते हुए खतरों को समय रहते खत्म करने की उसकी क्षमता सीमित हो जाएगी। अमेरिका का तर्क है कि ईरान के साथ सीधा चैनल होने से अंततः इजरायल को ही फायदा होगा, लेकिन तेल अवीव के गलियारों में इस पर भारी अविश्वास का माहौल है।
अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप अपने सबसे पुराने दोस्त नेतन्याहू को संतुष्ट कर पाएंगे या पश्चिम एशिया में सुरक्षा का यह नया संतुलन इजरायल-लेबनान सीमा पर एक नई जंग का आधार बनेगा।