Falkland Islands Dispute: ब्रिटेन का नियंत्रण, अर्जेंटीना का दावा और 74 दिनों का खूनी संग्राम; जानिए इस बंजर द्वीप समूह पर संप्रभुता को लेकर क्यों छिड़ा है 'फितूर'

Falkland Islands Dispute: ब्रिटेन का नियंत्रण, अर्जेंटीना का दावा और 74 दिनों का खूनी संग्राम; जानिए इस बंजर द्वीप समूह पर संप्रभुता को लेकर क्यों छिड़ा है 'फितूर'

अर्जेंटीना के तट से करीब 480 किलोमीटर और लंदन से लगभग 13,000 किलोमीटर दूर बर्फीले दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित द्वीपों का एक छोटा सा समूह—'फॉकलैंड आइलैंड्स' (Falkland Islands)। करीब 12,000 वर्ग किलोमीटर में फैले इस पथरीले और बंजर भूभाग पर महज 3,500 के आसपास स्थायी नागरिक रहते हैं, जबकि भेड़ों की संख्या 5 लाख से अधिक है। लेकिन सवाल उठता है कि दुनिया के एक सुदूर कोने में स्थित इन सर्द द्वीपों को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच पिछले दो सदियों से इतना गहरा 'फितूर' और कूटनीतिक तनाव क्यों बना हुआ है? अर्जेंटीना इसे अपना 'माल्विनास' (Islas Malvinas) कहकर अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक मानता है, तो वहीं ब्रिटेन इसे अपने विदेशी क्षेत्र (British Overseas Territory) के रूप में किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं है।

ऐतिहासिक दावों की जंग: किसने पहले रखा था कदम?

फॉकलैंड द्वीप समूह के स्वामित्व का विवाद 18वीं सदी से चला आ रहा है:

  • अर्जेंटीना का पक्ष: अर्जेंटीना का दावा है कि जब 1816 में उसने स्पेनिश साम्राज्य से आजादी हासिल की, तो स्पेन के अधिकार क्षेत्र में आने वाले ये द्वीप उसे विरासत में मिले थे। अर्जेंटीना का कहना है कि भौगोलिक दृष्टि से ये द्वीप उसके समुद्री महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf) का स्वाभाविक हिस्सा हैं।

  • ब्रिटेन का नियंत्रण: ब्रिटेन का तर्क है कि 1690 में एक ब्रिटिश नाविक जॉन स्ट्रॉन्ग ने पहली बार यहां आधिकारिक लैंडिंग की थी और इस जलडमरूमध्य का नाम विस्काउंट फॉकलैंड के नाम पर रखा था। 1833 में ब्रिटिश नौसेना ने इन द्वीपों पर अपने सैन्य नियंत्रण को औपचारिक रूप दिया और वहां ब्रिटिश नागरिकों को बसाना शुरू किया।

तब से लेकर आज तक अर्जेंटीना इसे औपनिवेशिक जबरन कब्जा (Colonial Occupation) बताता रहा है, जबकि ब्रिटेन का कहना है कि वह पिछले 190 से अधिक वर्षों से यहां शांतिपूर्ण और कानूनी प्रशासन चला रहा है।

1982 का युद्ध: 74 दिनों की जंग और 900 से अधिक मौतें

यह राजनयिक विवाद 2 अप्रैल 1982 को एक भीषण सैन्य टकराव में बदल गया। उस समय अर्जेंटीना में जनरल लियोपोल्डो गाल्टिएरी की अगुवाई वाली सैन्य तानाशाही (Military Junta) सत्ता में थी। घरेलू आर्थिक संकट और मानवाधिकार उल्लंघन के विरोध से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अर्जेंटीना की सेना ने फॉकलैंड पर अचानक हमला कर उस पर कब्जा कर लिया।

अर्जेंटीना को लगा था कि हजारों मील दूर बैठा ब्रिटेन एक छोटे से द्वीप के लिए जंग में नहीं उतरेगा। लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने इसे ब्रिटेन की संप्रभुता पर सीधा हमला माना और 8,000 मील दूर अपनी रॉयल नेवी का विशाल टास्क फोर्स रवाना कर दिया।

  • 74 दिनों का भीषण संग्राम: इस युद्ध में उन्नत नौसैनिक जहाजों, सबमरीन्स, हैरियर लड़ाकू विमानों और एटीआर मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ।

  • नतीजा: 14 जून 1982 को अर्जेंटीना की सेना को बिना शर्त आत्मसमर्पण करना पड़ा।

  • हताहत: इस छोटे से युद्ध में अर्जेंटीना के 649 सैनिक और ब्रिटेन के 255 सैन्यकर्मी व 3 स्थानीय नागरिक मारे गए। इस हार ने अर्जेंटीना में सैन्य तानाशाही को उखाड़ फेंका और लोकतंत्र की बहाली की, जबकि ब्रिटेन में थैचर की राजनीतिक स्थिति को अजेय बना दिया।

सिर्फ ज़मीन नहीं, अरबों बैरल तेल और गैस का खजाना है असली वजह

फॉकलैंड को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव केवल पुराने इतिहास या राष्ट्रीय गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके नीचे छिपे अपार प्राकृतिक संसाधन भी आधुनिक भू-राजनीति का बड़ा केंद्र हैं:

  1. सी लायन ऑयलफील्ड (Sea Lion Basin): फॉकलैंड के उत्तरी समुद्री बेसिन में भारी मात्रा में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की पुष्टि हो चुकी है। अनुमान है कि यहां करीब 1.7 अरब बैरल तेल मौजूद है, जिसका वाणिज्यिक दोहन शुरू होने पर यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है। अर्जेंटीना इन संसाधनों के ब्रिटिश दोहन को गैर-कानूनी बताता है।

  2. मत्स्य पालन का समृद्ध क्षेत्र: इन द्वीपों के आसपास का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) स्क्विड (Squid) और टूना मछलियों का दुनिया का सबसे बड़ा और महंगा क्षेत्र है। मछली पकड़ने के लाइसेंस बेचकर फॉकलैंड सरकार को सालाना करोड़ों डॉलर का राजस्व मिलता है, जिससे यह द्वीप अपनी अर्थव्यवस्था में पूरी तरह आत्मनिर्भर है।

  3. अंटार्कटिका का प्रवेश द्वार: भू-रणनीतिक रूप से फॉकलैंड द्वीप समूह अंटार्कटिक महाद्वीप और दक्षिणी समुद्री व्यापार मार्गों पर नजर रखने के लिए एक रणनीतिक नौसैनिक बेस का काम करता है।

2013 का जनमत संग्रह: 99.8% जनता ने कहा- 'हम ब्रिटिश हैं'

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विवाद का सबसे निर्णायक मोड़ मार्च 2013 में आया, जब फॉकलैंड आइलैंड्स की स्थानीय सरकार ने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह (Referendum) कराया।

जनता से सीधा सवाल पूछा गया कि क्या वे ब्रिटेन के विदेशी क्षेत्र के रूप में अपना राजनीतिक दर्जा बनाए रखना चाहते हैं?

  • कुल मतदान प्रतिशत 92% रहा।

  • चौंकाने वाले नतीजों में 99.8% मतदाताओं ने ब्रिटेन के पक्ष में वोट दिया। 1,517 वैध मतों में से केवल 3 वोट ब्रिटेन के खिलाफ पड़े थे।

संयुक्त राष्ट्र (UN) के चार्टर में दर्ज 'आत्मनिर्णय के अधिकार' (Right to Self-Determination) का हवाला देते हुए ब्रिटेन कहता है कि जब तक द्वीप की स्थानीय आबादी ब्रिटिश नागरिकता और झंडे के साथ रहना चाहती है, अर्जेंटीना के साथ संप्रभुता पर किसी तरह की बातचीत का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसके विपरीत, अर्जेंटीना का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र के डीकोलोनाइजेशन प्रस्तावों के तहत 'क्षेत्रीय अखंडता' (Territorial Integrity) का सिद्धांत पहले आता है और बाहर से बसाए गए नागरिकों की राय मूल देश के अधिकार को खारिज नहीं कर सकती।

जेवियर माइली और वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति

हाल के वर्षों में अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक तरीकों से माल्विनास को वापस पाने की मांग को बार-बार दोहराया है। उन्होंने हांगकांग के तर्ज पर बातचीत का मॉडल सुझाया है, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने हर बार किसी भी प्रकार की वार्ता से साफ इनकार कर दिया है। ब्रिटेन ने द्वीप की सुरक्षा के लिए वहां आधुनिक टाइफून लड़ाकू विमान, रडार सिस्टम और स्थायी गैरीसन तैनात कर रखे हैं। इतिहास, राष्ट्रीय गौरव, अरबों डॉलर के तेल भंडार और अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्विरोधों के बीच फॉकलैंड्स आज भी दक्षिण अटलांटिक की लहरों में एक अनसुलझा भू-राजनीतिक अखाड़ा बना हुआ है।