डेमोक्रेट्स की बढ़त से फिसला क्रूड ऑयल, $100 के करीब पहुंचे भाव; जानिए ट्रंप के फैसलों का पूरा गणित
वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। लंबे समय से 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से काफी ऊपर बना हुआ अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड टूटकर अब 100 डॉलर प्रति बैरल के इर्द-गिर्द पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फिसलकर 95 डॉलर के स्तर पर कारोबार कर रहा है। बाजार के जानकारों का मानना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स के मजबूत प्रदर्शन और सत्ता संतुलन में आए बदलाव के कारण बाजार की धारणा में यह बदलाव देखा जा रहा है। ऊर्जा निवेशकों को अब आशंका है कि वॉशिंगटन में विधायी गतिरोध बढ़ने से सख्त टैरिफ और आक्रामक विदेश नीति के एजेंडे पर ब्रेक लग सकता है, जिसका सीधा असर कमोडिटी की कीमतों पर दिख रहा है।
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पहले से ही तनाव में थी, लेकिन अमेरिकी राजनीतिक समीकरणों के बदलते ही तेल सटोरियों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी है। व्हाइट हाउस की नीतियों में संभावित बदलाव, आर्थिक सुस्ती के संकेत और मध्य पूर्व को लेकर आ रहे मिश्रित बयानों ने मिलकर क्रूड ऑयल पर चौतरफा दबाव बनाया है।
मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स का उभार और वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी के बढ़ते नियंत्रण ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कई इकनॉमिक नीतियों पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। वॉल स्ट्रीट से लेकर लंदन और सिंगापुर तक के बाजारों में इस बात की चर्चा है कि क्या ट्रंप प्रशासन अपने विवादास्पद फैसलों—खासकर टैरिफ वॉर और ऊर्जा प्रतिबंधों—को पहले जैसी आक्रामकता से आगे बढ़ा पाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि विधायी शक्ति में कटौती होने से ऊर्जा से जुड़े बड़े बिलों पर ब्रेक लगना तय है, जिससे बाजार में सप्लाई शॉर्टेज का डर अचानक कम हो गया है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में भी सुस्ती दर्ज की गई है। आमतौर पर जब अमेरिकी कांग्रेस में शक्ति का संतुलन बंट जाता है, तो किसी बड़े अचानक आर्थिक फैसले की संभावना सीमित हो जाती है। निवेशकों ने इसे एक संकेत के तौर पर लिया कि व्हाइट हाउस अब एकतरफा फैसले लेकर ग्लोबल सप्लाई चेन को झटके नहीं दे सकेगा, जिसके चलते तेल की खरीदारी में आक्रामकता थमी और भाव नीचे आ गए।
ट्रंप के कड़े फैसलों और बयानों से कैसे हिचकोले खाता रहा तेल बाजार
डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के लिए हमेशा से एक रोलरकोस्टर की तरह रहा है। उनके आक्रामक रुख ने कई मौकों पर तेल की कीमतों में जबर्दस्त उछाल पैदा किया, तो वहीं उनके अचानक बदले सुर ने बाजार को पलक झपकते ही धड़ाम कर दिया। जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की रूपरेखा खींची और मध्य पूर्व में सैन्य कार्रवाइयों के संकेत दिए, तो होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति बाधित होने की आशंका में कच्चा तेल रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था। बाजार को डर था कि दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का 20 प्रतिशत हिस्सा रुक जाएगा, जिससे कीमतें आसमान छू लेंगी।
इसके बाद रूस-यूक्रेन संकट के संदर्भ में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनियों ने भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खलबली मचा दी थी। यदि यह कानून पूरी तरह लागू होता, तो चीन और भारत जैसे बड़े आयातक देशों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती थी, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बुरी तरह बिगड़ जाता। हालांकि, चुनाव से ठीक पहले ट्रंप ने अचानक कूटनीतिक समझौते और शांति वार्ता के संकेत देकर यह दावा किया कि तेल की कीमतें गिरनी चाहिए और युद्ध की कोई जल्दबाजी नहीं है। उनके इन यू-टर्न भरे बयानों ने हेज फंड्स को अपनी पोजीशन बदलने पर मजबूर किया, जिसके चलते तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज हुआ।
भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर क्या होगा इसका सीधा प्रभाव?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे नीचे आना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। यदि तेल के दाम लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बने रहते, तो देश का चालू खाता घाटा (CAD) तेजी से बढ़ता, भारतीय रुपये पर भारी दबाव आता और घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण महंगाई दर अनियंत्रित हो सकती थी।
इसके अलावा, भारत के लिए रूसी कच्चे तेल की रियायती खरीद ऊर्जा सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बनी हुई है। ट्रंप प्रशासन द्वारा 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव को रोके जाने और अब अमेरिकी संसद में संतुलन बदलने से नई दिल्ली को अपनी स्वतंत्र ऊर्जा नीति जारी रखने की गुंजाइश मिली है। भारतीय रिफाइनरियों के लिए कम लागत पर क्रूड मिलना न केवल देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाता है, बल्कि ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट नियंत्रित रखकर औद्योगिक विकास को भी गति देता है।
आगामी तिमाहियों में क्रूड का आउटलुक और आगे की राह
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि क्रूड ऑयल का 100 डॉलर का स्तर एक बेहद संवेदनशील तकनीकी स्तर है। यदि यह स्तर टूटता है, तो बाजार में और अधिक मंदी आ सकती है। हालांकि, ओपेक प्लस (OPEC+) देशों की उत्पादन नीतियां और मध्य पूर्व में कतर द्वारा की जा रही मध्यस्थता वार्ताओं के नतीजे आने वाले दिनों में कीमतों की अंतिम दिशा तय करेंगे।
यदि व्हाइट हाउस और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत किसी औपचारिक समझौते की ओर बढ़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में अतिरिक्त बैरल तेल की आपूर्ति बहाल हो सकती है, जो कीमतों को और नीचे खींच सकती है। दूसरी ओर, यदि ट्रंप प्रशासन अपने वीटो पावर और कार्यकारी आदेशों के जरिए व्यापारिक पाबंदियों को कड़ा रखता है, तो तेल की कीमतों में दोबारा उछाल से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल, डेमोक्रेट्स की वापसी से बनी स्थिति ने ऊर्जा सट्टेबाजों को बैकफुट पर ला दिया है और दुनिया भर के उपभोक्ता देशों को एक जरूरी राहत पहुंचाई है।