चीन की लगी लॉटरी! यूएस नेवी ने पैसिफिक क्षेत्र से अपना सबसे घातक युद्धपोत अचानक पीछे हटाया
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में इन दिनों भू-राजनीतिक हलचल इस कदर तेज हो गई है कि दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की सांसे अटकी हुई हैं। वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ड्रैगन यानी चीन के बीच समंदर में वर्चस्व की जो जंग पिछले कई सालों से चली आ रही है, उसमें एक ऐसा सनसनीखेज मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिकी नौसेना यानी यूएस नेवी ने अपने सबसे घातक, अत्याधुनिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण युद्धपोत को पैसिफिक क्षेत्र से अचानक पीछे हटा लिया है। अमेरिका के इस अप्रत्याशित फैसले के बाद बीजिंग स्थित कम्युनिस्ट सरकार और चीनी नौसेना की मानों लाटरी सी लग गई है, क्योंकि उनके लिए दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास अमेरिकी सैन्य दबाव अचानक कम हो गया है। इस रणनीतिक फेरबदल के पीछे अमेरिका की क्या मजबूरी है और ड्रैगन इस मौके का फायदा उठाकर पैसिफिक महासागर में क्या नई चाल चल रहा है, आइए इसकी पूरी और अंदरूनी कहानी विस्तार से जानते हैं।
पैसिफिक में अमेरिकी नौसेना की अचानक वापसी और चीन की खुशी
जब से यूएस नेवी ने अपने इस ताकतवर युद्धपोत को पैसिफिक थिएटर से हटाने का आधिकारिक या रणनीतिक निर्णय लिया है, तब से चीनी सरकारी मीडिया और रणनीतिकार फूले नहीं समा रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से अमेरिका लगातार यह दावा करता आया है कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को मुक्त, खुला और सुरक्षित रखने के लिए अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाता रहेगा, ताकि चीन इस पूरे समुद्री मार्ग पर अपनी दादागिरी न चला सके। लेकिन अचानक से इस प्रकार के अग्रिम पंक्ति के युद्धपोत को हटाए जाने से अंतरराष्ट्रीय रक्षा गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ ली है कि क्या अमेरिका अब एशियाई मोर्चे पर थोड़ा पीछे हट रहा है या फिर उसकी प्राथमिकताएं वैश्विक स्तर पर बदल रही हैं। चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर के विवादित द्वीपों के आसपास अपनी नौसैनिक गतिविधियों को और अधिक आक्रामक तरीके से बढ़ाने की फिराक में है, जिससे इस क्षेत्र में तनाव एक नए चरम पर पहुंच सकता है।
सामरिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है पैसिफिक और यह घातक युद्धपोत?
पैसिफिक महासागर दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक व्यापारिक गतिविधियों वाला समंदर है, जिसके रास्ते से दुनिया भर का खरबों डॉलर का माल गुजरता है। इस क्षेत्र में अमेरिका का यह घातक युद्धपोत एक तैरते हुए किले की तरह काम कर रहा था, जिसमें अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम, रडार तकनीक और दुश्मन के जहाजों को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद कर देने वाली मारक क्षमता मौजूद थी। जब ऐसा शक्तिशाली युद्धपोत अपनी तय गश्त से हटता है, तो उस नौसैनिक बेड़े की ताकत में एक बड़ा खालीपन आ जाता है। चीन लगातार अपनी नेवी को मॉडर्न बना रहा है और उसके पास एयरक्राफ्ट कैरियर तथा विध्वंसक जहाजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में अमेरिकी युद्धपोत का हटना चीनी नौसेना को इस विशाल जलीय क्षेत्र में अपनी पैठ और रणनीतिक बढ़त मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान कर रहा है, जिसे ड्रैगन किसी भी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देना चाहता।
अमेरिकी नेवी के इस फैसले के पीछे छिपी बड़ी वजहें और मजबूरियां
सवाल यह उठता है कि आखिर जिस अमेरिका ने पूरी दुनिया को साधने के लिए पैसिफिक में अपनी सबसे मजबूत सैन्य दीवार खड़ी की थी, उसने अचानक अपने इस घातक युद्धपोत को वहां से क्यों हटाया? रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई आंतरिक और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं। सबसे पहला कारण अमेरिकी नौसेना के सामने आ रही मेंटेनेंस और ओवरहॉलिंग की भारी कमी है, क्योंकि पिछले कई महीनों से लगातार गश्त करने के कारण अमेरिकी जहाजों और उनके क्रू को भारी थकान और तकनीकी मुरम्मत की जरूरत पड़ रही है। दूसरा और सबसे अहम कारण मध्य पूर्व यानी मिडिल ईस्ट और यूरोप में चल रहे तनाव हैं, जहां लाल सागर और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए युद्धपोतों की भारी मांग बनी हुई है। सीमित संसाधनों और बजट के चलते पेंटागन को अपने रणनीतिक परिसंपत्तियों को एक जगह से हटाकर दूसरी संवेदनशील जगहों पर री-डप्लॉय करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिसका सीधा रणनीतिक लाभ चीन को मिलता दिख रहा है।
ताइवान और दक्षिण चीन सागर पर मंडराता नया और बड़ा खतरा
अमेरिका के इस कदम से सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट ताइवान और आस-पास के छोटे एशियाई देशों के सामने खड़ा हो गया है। ताइवान हमेशा से चीन की विस्तारवादी नीतियों के निशाने पर रहा है, और अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी ही वह मुख्य ढाल थी जो बीजिंग को किसी भी बड़े सैन्य दुस्साहस से रोक कर रखती थी। अब जब पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति थोड़ी हल्की पड़ी है, तो ताइवान जलडमरूमध्य में चीनी सेना के युद्धाभ्यास और घुसपैठ की घटनाएं और अधिक तेजी से बढ़ सकती हैं। हालांकि अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन का यह भी तर्क है कि वे अपने सहयोगियों और मित्र देशों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और वे पनडुब्बियों तथा अन्य अत्याधुनिक हथियारों के जरिए इस क्षेत्र में अपनी बैलेंस पावर बनाए रखेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि इस युद्धपोत के हटने से चीनी नौसेना का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
इंडो-पैसिफिक का भविष्य और भारत समेत अन्य देशों की चिंताएं
इस पूरी भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे इंडो-पैसिफिक देशों की सुरक्षा रणनीतियों पर भी पड़ रहा है। क्वाड (Quad) देशों का मुख्य उद्देश्य इसी क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व को संतुलित करना है, ताकि समंदर के रास्ते होने वाला वैश्विक व्यापार बाधित न हो। यदि अमेरिका अपनी सैन्य व्यस्तता या आंतरिक प्राथमिकताओं के कारण पैसिफिक से अपनी पकड़ थोड़ी भी ढीली करता है, तो एशियाई देशों को अपनी समुद्री सुरक्षा के लिए और अधिक आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करके इस घातक युद्धपोत को वापस पैसिफिक क्षेत्र में तैनात करता है, या फिर चीन इस खाली जगह का फायदा उठाकर इस पूरे महासागर में अपने एकछत्र राज का नया अध्याय लिखने में सफल हो जाता है, जिस पर पूरी दुनिया की पैनी नजर बनी हुई है।