मोहन भागवत के कार्यक्रम के विरोध पर ब्रिटिश गुरुद्वारे की दो टूक: कहा, 'गुरुद्वारे में आने की अनुमति को गंदी राजनीति से बिल्कुल न जोड़ें

मोहन भागवत के कार्यक्रम के विरोध पर ब्रिटिश गुरुद्वारे की दो टूक: कहा, 'गुरुद्वारे में आने की अनुमति को गंदी राजनीति से बिल्कुल न जोड़ें

ब्रिटेन के एक प्रमुख गुरुद्वारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के संभावित या पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को लेकर उपजे विवाद ने इन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ब्रिटेन के स्थानीय सिख समुदाय और कुछ राजनीतिक हलकों से इस आयोजन को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं, जिसके बाद गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने अब इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बेहद सख्त और स्पष्ट सफाई पेश की है। गुरुद्वारा प्रबंधन का साफ तौर पर कहना है कि सिख धर्म के पवित्र और खुले दरवाजे हर उस व्यक्ति के लिए हमेशा स्वागत के भाव से खुले हैं जो शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश लेकर आता है, इसलिए इस धार्मिक स्थल पर आने की अनुमति को किसी भी सूरत में अपनी क्षुद्र राजनीतिक रोटियां सेकने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। यूके के इस प्रतिष्ठित गुरुद्वारे के इस बेबाक बयान ने उन तमाम राजनीतिक तत्वों को करारा जवाब दिया है जो धार्मिक स्थलों को अपने वैचारिक एजेंडे का अखाड़ा बनाने की कोशिश कर रहे थे।

ब्रिटेन के गुरुद्वारे में मोहन भागवत के कार्यक्रम पर क्यों मचा है सियासी घमासान

विदेशी धरती पर भारतीय संगठनों और उनके शीर्ष नेतृत्व के कार्यक्रमों को लेकर अक्सर एक अलग किस्म की राजनीतिक सरगर्मी देखने को मिलती है, और मोहन भागवत के इस कार्यक्रम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। ब्रिटेन के कुछ स्थानीय समूहों और कट्टरपंथी तत्वों द्वारा इस बात का विरोध किया जा रहा था कि आरएसएस प्रमुख जैसे वैचारिक रूप से विवादास्पद माने जाने वाले व्यक्तित्व को किसी गुरुद्वारे के मंच पर जगह क्यों दी जानी चाहिए। इस विरोध के चलते वहां का माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया था और सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय प्रशासनिक स्तर तक इस पर तीखी बहस छिड़ गई थी। हालांकि, इन विरोध प्रदर्शनों के बीच एक बड़ा तबका ऐसा भी था जो यह मान रहा था कि गुरुद्वारे जैसे सर्वसमावेशी और सार्वभौमिक स्थानों पर किसी भी भारतीय नेता या विचारक के आने पर पाबंदी लगाना धार्मिक स्वतंत्रता और खुलेपन की भावना के बिल्कुल खिलाफ है।

गुरुद्वारा प्रबंधन समिति की दो टूक: गुरु घर के दरवाजे सभी के लिए हमेशा खुले हैं

विवाद के तूल पकड़ने के बाद ब्रिटिश गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने पूरी दृढ़ता के साथ यह स्पष्ट किया है कि उनके दरवाजे किसी खास राजनीतिक विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए बिना किसी भेदभाव के खुले रहते हैं। प्रबंधन की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि गुरुद्वारा साहिब एक ऐसा पवित्र स्थान है जहाँ कोई भी इंसान, चाहे उसकी पृष्ठभूमि या विचार कुछ भी हों, मत्था टेकने और संवाद स्थापित करने आ सकता है। इसे किसी राजनीतिक पार्टी के चश्मे से देखना या इस पर आपत्ति जताना गुरु घर की मूल परंपराओं और सिद्धांतों के सरासर खिलाफ है। प्रबंधन ने दो टूक शब्दों में यह संदेश दिया है कि वे किसी भी बाहरी दबाव या राजनीतिक ध्रुवीकरण के आगे झुकने वाले नहीं हैं और गुरुद्वारे की गरिमा एवं उसकी सार्वभौमिक परंपरा को हर हाल में बरकरार रखा जाएगा।

धार्मिक स्थलों पर राजनीति हावी होने से सिख समुदाय और प्रवासियों में चिंता

इस पूरे घटनाक्रम के बाद ब्रिटेन में रहने वाले प्रवासी भारतीयों और मुख्यधारा के सिख समुदाय के बीच इस बात को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है कि कैसे कुछ राजनीतिक ताकतें अपने निहित स्वार्थों के लिए धार्मिक संस्थानों का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के बीच सौहार्द बिगाड़ने के लिए अक्सर ऐसे मुद्दों को बेवजह तूल दिया जाता है, जिनका ज़मीनी हकीकत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता है। गुरुद्वारे जैसी संस्थाओं का मूल उद्देश्य हमेशा से भूखों को भोजन कराना, जरूरतमंदों की सेवा करना और शांति का संदेश फैलाना रहा है, लेकिन जब इन्हें संकीर्ण राजनीतिक बहसों में घसीटा जाता है, तो इससे पूरी कम्युनिटी की छवि पर असर पड़ने का खतरा पैदा हो जाता है। समझदार और प्रबुद्ध वर्ग का यही मानना है कि धर्म और राजनीति को अलग-अलग रखना ही समाज के हित में सबसे बेहतर कदम है।

वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर आपसी भाईचारे और संवाद की है आज सबसे बड़ी जरूरत

आज के इस वैश्वीकृत दौर में जहां दुनिया भर में दूरियां और वैचारिक टकराव बढ़ रहे हैं, वहां इस तरह की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि हमें नफरत की राजनीति को छोड़कर आपसी संवाद के रास्ते अपनाने चाहिए। मोहन भागवत के कार्यक्रम पर ब्रिटिश गुरुद्वारे द्वारा दी गई यह सफाई केवल एक संस्था का पक्ष नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि धार्मिक स्थल स्वतंत्र और खुले संवाद के केंद्र बने रहने चाहिए, न कि राजनीतिक अखाड़े। यदि हम वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर खुले मन से एक-दूसरे की बात सुनने की संस्कृति को बढ़ावा दें, तो विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी एकजुटता और मजबूत भाईचारा कायम रह सकता है। अंततः सच की जीत इसी बात में है कि धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को खारिज किया जाए और गुरुघरों जैसे पवित्र स्थानों की मूल गरिमा को हमेशा अक्षुण्ण बनाए रखा जाए।