पाकिस्तान के हाथ से निकल रहा बलूचिस्तान, सैनिकों की भारी कमी
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक ऐसा बड़ा भूचाल आया है जिसने पाकिस्तानी हुक्मरों और सेना के होश उड़ा दिए हैं। पाकिस्तान के सबसे बड़े और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान पर से धीरे-धीरे देश की केंद्रीय सत्ता की पकड़ कमजोर होती जा रही है, जिससे वहां की सरकार और सैन्य नेतृत्व गहरे संकट में आ गया है। स्थिति इतनी भयावह और नियंत्रण से बाहर हो चुकी है कि पाकिस्तानी सेना को अपने नियमित सैनिकों की भारी कमी से जूझना पड़ रहा है। इस गंभीर संकट से पार पाने के लिए अब सेना मुख्यालय ने एक आपातकालीन आदेश जारी करते हुए अपने सभी सेवानिवृत्त यानी रिटायर्ड जवानों को तुरंत मोर्चे पर वापस लौटने का फरमान सुनाया है। बलूचिस्तान के भीतर सुलगती आजादी की आग और स्थानीय विद्रोहियों के लगातार हमलों ने पाकिस्तानी सैन्य तंत्र की चूलें हिला दी हैं, जिससे यह साफ हो गया है कि इस अशांत क्षेत्र को संभालना अब पाकिस्तान के बूते से बाहर होता जा रहा है।
बलूचिस्तान में गहराता सुरक्षा संकट और पाकिस्तानी सेना के भीतर मची भगदड़ का असली सच
बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के दमनकारी शासन और सैन्य अत्याचारों के खिलाफ मुखर रहा है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में वहां के हालात सेना के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं। बलूचिस्तान मुक्ति सेना और अन्य विद्रोही संगठनों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर जिस प्रकार से सुनियोजित और ताबड़तोड़ हमले शुरू किए हैं, उससे वहां तैनात सैनिकों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि पाकिस्तान सेना को अपने नियमित सैनिकों की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि हताहत होने वाले सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और नए रंगरूट इस खूनी संघर्ष में कूदने से कतरा रहे हैं। सैनिकों की इसी भारी कमी को पाटने के लिए पाकिस्तानी सेना प्रमुख और रक्षा मंत्रालय को मजबूरन सेवानिवृत्त हो चुके बुजुर्ग जवानों और अधिकारियों को फिर से युद्ध के मोर्चों तथा संवेदनशील चौकियों पर तैनात करने का तुगलकी फरमान जारी करना पड़ा है। एक पेशेवर और आधुनिक सेना के लिए यह स्थिति बेहद शर्मनाक और पतन की ओर इशारा करने वाली है, जहां उन्हें युद्ध लड़ने के लिए अपने पेंशनभोगियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
प्राकृतिक संसाधनों की लूट और बलूच जनता के गुस्से से हिल गया इस्लामाबाद का सिंहासन
बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति और वहां मौजूद अकूत प्राकृतिक खजाने, जिनमें गैस, सोना, तांबा और तेल के विशाल भंडार शामिल हैं, हमेशा से पाकिस्तानी सत्ता के लिए कमाई का मुख्य जरिया रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन संसाधनों का दोहन करके पाकिस्तान के अन्य विकसित हिस्सों को संवारा जाता रहा, जबकि बलूच जनता को केवल गरीबी, भुखमरी, जबरन गायब किए जाने और सैन्य जुल्म के अलावा कुछ नहीं मिला। इसी ऐतिहासिक अन्याय और शोषण के खिलाफ अब बलूचिस्तान का बच्चा-बच्चा सड़कों पर उतर आया है और हथियारों के जरिए अपनी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर रहा है। ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर भी बलूच विद्रोहियों के लगातार हमलों ने चीन की नींद उड़ा दी है। पाकिस्तानी सेना चाहे जितनी भी क्रूरता अपना ले, वह बलूच राष्ट्रवादियों के अदम्य साहस और अपने हक की लड़ाई को दबाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है, जिससे इस्लामाबाद के हुक्मरों के पैरों तले जमीन खिसक चुकी है।
वैश्विक समुदाय की चुप्पी और बलूचिस्तान के भविष्य पर मंडराते बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के बादल
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान के लोगों पर होने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों और सैन्य अत्याचारों की कहानियां अब दुनिया के सामने खुलकर आने लगी हैं। पाकिस्तान की दमनकारी नीतियां और वहां की चरमराती अर्थव्यवस्था अब इस बोझ को और अधिक उठाने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रही है। जिस प्रकार से पाकिस्तानी सेना को अपने रिटायर्ड जवानों को मोर्चे पर भेजने की मजबूरी आन पड़ी है, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि बलूचिस्तान अब पाकिस्तान के नियंत्रण से तेजी से बाहर निकल रहा है। क्षेत्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में बलूचिस्तान का पाकिस्तान से अलग होना लगभग तय है, जो दक्षिण एशिया के नक्शे को हमेशा के लिए बदल देगा। बलूच जनता का यह संघर्ष अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है जहां से पीछे हटने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, और यह घटनाक्रम पाकिस्तान के विघटन की शुरुआत का सबसे बड़ा अध्याय बन चुका है।