बलूचिस्तान ने पाकिस्तान से नाता तोड़ा, खुद को घोषित किया आजाद, चीन के 65 अरब डॉलर के CPEC प्रोजेक्ट को लगा तगड़ा झटका!
दक्षिण एशिया के सबसे अशांत और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र बलूचिस्तान से आ रही स्वतंत्रता की घोषणा के दावों ने अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति और राजनयिक गलियारों में एक अभूतपूर्व भूचाल ला दिया है। यद्यपि अभी तक वैश्विक मंच पर किसी भी संप्रभु देश ने बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, परंतु इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने चीन और पाकिस्तान की संयुक्त रीढ़ माने जाने वाले 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे' (CPEC) के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। करीब ६५ अरब डॉलर (लगभग ५.४ लाख करोड़ रुपये) की भारी-भरकम लागत से बन रहा सीपेक प्रोजेक्ट चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) का सबसे महत्वपूर्ण मुकुट माना जाता है, जो अब बलूचिस्तान की बगावत के चलते पूरी तरह खटाई में पड़ता नजर आ रहा है।
ग्वादर बंदरगाह पर संप्रभुता का कानूनी पेंच: अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत फंस सकता है चीन का अरबों का निवेश
इस पूरे भू-राजनीतिक विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील ग्वादर बंदरगाह (Gwadar Port) है, जो सीधे अरब सागर के मुहाने पर स्थित है। वर्तमान व्यवस्था के तहत इस गहरे पानी के बंदरगाह का संपूर्ण संचालन बीजिंग की सरकारी कंपनी 'चाइना ओवरसीज पोर्ट्स होल्डिंग कंपनी' द्वारा पाकिस्तान सरकार के साथ हुए एक द्विपक्षीय समझौते के तहत किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक संधि के तहत चीन को केवल व्यावसायिक संचालन और टोल वसूलने का अधिकार प्राप्त है, जबकि बंदरगाह की वास्तविक संप्रभुता (Sovereignty) कानूनी रूप से इस्लामाबाद के पास सुरक्षित है। अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि बलूचिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित होता है, तो ग्वादर बंदरगाह स्वतः ही बलूचिस्तान की संप्रभु सीमा का हिस्सा बन जाएगा, जिससे पूर्व में पाकिस्तान के साथ किए गए चीन के सभी समझौते तकनीकी रूप से अवैध या शून्य घोषित हो सकते हैं।
ड्रैगन पर चौतरफा मार: चीनी इंजीनियरों की सुरक्षा, नए वीजा नियम और बीमा लागत में बेतहाशा वृद्धि की आशंका
अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, यदि बलूचिस्तान में कोई नई संप्रभु सरकार का गठन होता है, तो उसे यह पूर्ण विधिक अधिकार होगा कि वह चीन के साथ पुराने सीपेक समझौतों को जारी रखे, उनमें अपनी शर्तों पर संशोधन करे, अथवा उन्हें पूरी तरह से निरस्त कर दे। ऐसी विकट स्थिति में चीनी निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालतों (International Arbitration) का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है, जो एक बेहद लंबी और अनिश्चित प्रक्रिया है। इसके अतिरिक्त, ३,००० किलोमीटर लंबे इस आर्थिक गलियारे में काम कर रहे हजारों चीनी इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों के वीजा नियम, स्थानीय श्रम कानून और सबसे महत्वपूर्ण उनकी सुरक्षा (Security Core) की पूरी जिम्मेदारी नए सिरे से तय करनी होगी। बलूच लिबरेशन आर्मी जैसी अलगाववादी ताकतों की सक्रियता बढ़ने से परियोजनाओं की बीमा लागत (Insurance Cost) और बुनियादी ढांचा सुरक्षा खर्च कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे चीनी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ना तय है।
इस्लामाबाद की लूट के खिलाफ बलूच विद्रोह: स्थानीय संसाधनों के दोहन और रोजगार से वंचित रखने का गंभीर आरोप
पाकिस्तान के लिए ग्वादर बंदरगाह और बलूचिस्तान का विशाल भूभाग उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक और आर्थिक थाती माना जाता है, लेकिन धरातल पर बलूचिस्तान के स्थानीय नागरिक लंबे समय से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। 'ज्वाइंट बलूच राइट्स कमिटी' और अन्य क्षेत्रीय संगठनों का स्पष्ट आरोप है कि बलूचिस्तान के सोने, तांबे और प्राकृतिक गैस जैसे असीमित प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करके इसका पूरा वित्तीय लाभ केवल इस्लामाबाद के हुक्मरानों और विदेशी चीनी निवेशकों की जेबों में जा रहा है। बलूच अवाम आज भी बुनियादी सुविधाओं जैसे साफ पीने के पानी, स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के अवसरों से पूरी तरह महरूम है, जिसने अंततः इस क्षेत्र के लोगों को पाकिस्तान से पूरी तरह नाता तोड़कर अपनी आजादी की हुंकार भरने के लिए विवश कर दिया है।