सोनाम वांगचुक की पत्नी क्यों बदलना चाहती हैं अपनी याचिका? सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछ लिया बड़ा सवाल
News India Live, Digital Desk : पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनाम वांगचुक, जिन्होंने लद्दाख के संवैधानिक दर्जे और पर्यावरण संरक्षण के लिए हाल ही में अपना जलवायु उपवास खत्म किया है, अब एक बार फिर खबरों में हैं. इस बार मुद्दा उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो से जुड़ा है, जिन्होंने अपने पति की मांगों के समर्थन में दायर की गई एक याचिका में बदलाव करने की इच्छा जताई है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी गहरी दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा है कि आखिर याचिका में संशोधन की जरूरत अब क्यों आन पड़ी है? यह मामला 'लद्दाख के संवैधानिक अधिकार' और 'पर्यावरण सुरक्षा' की लड़ाई में एक नया मोड़ ला सकता है.
याचिका बदलने की ज़रूरत क्यों? सुप्रीम कोर्ट का सवाल!
सोनाम वांगचुक के अनशन के दौरान उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और क्षेत्र के 'पर्यावरण संरक्षण' की मांग की गई थी. साथ ही, इसमें उनके पति के 'अधिकारों की रक्षा' की बात भी कही गई थी. अब, वांगचुक ने अपना अनशन तो समाप्त कर लिया है, लेकिन गीतांजलि आंगमो ने अपनी याचिका में कुछ संशोधन करने का अनुरोध किया है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, "वह पहले से ही स्वस्थ हैं, उनके मौलिक अधिकारों को बरकरार रखा गया है और केंद्र सरकार के साथ उनकी बातचीत भी जारी है. ऐसे में याचिका को बदलने का औचित्य क्या है?" अदालत जानना चाहती है कि अनशन समाप्त होने और बातचीत जारी रहने के बाद, इस स्तर पर याचिका में किन नए तत्वों को शामिल करने की जरूरत महसूस हो रही है. इस पर गीतांजलि के वकील ने दलील दी कि वांगचुक का उपवास स्वास्थ्य संबंधी कारणों से निलंबित किया गया है और वे अपनी मांगें वापस नहीं लेंगे.
छठी अनुसूची और लद्दाख की लड़ाई (Sonam Wangchuk's demands):
सोनाम वांगचुक और लद्दाख के लोगों की मुख्य मांगें, इस क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जा देना, एक राज्य विधानसभा प्रदान करना, और स्थानीय संसाधनों (विशेषकर ग्लेशियरों और प्रकृति) की रक्षा के लिए 'कड़े पर्यावरण कानून' लागू करना है. वांगचुक ने अपने उपवास के माध्यम से इस मुद्दे पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया था. 'छठी अनुसूची का महत्व' लद्दाख के लिए स्थानीय आबादी को अपने संसाधनों और पहचान पर अधिक नियंत्रण देता है.
यह मामला सिर्फ 'सोनाम वांगचुक की याचिका' तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 'लद्दाख की संवैधानिक स्थिति' और 'वहां के लोगों के भविष्य' से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट की नजर इस मामले पर लगातार बनी हुई है और अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सभी प्रक्रियाओं का विधिवत पालन हो और याचिका का मूल उद्देश्य प्रभावी रूप से पूरा हो सके. आने वाले समय में देखना होगा कि गीतांजलि आंगमो की संशोधित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख होता है और यह 'लद्दाख के भविष्य' की लड़ाई को किस दिशा में ले जाता है.