मुग़ल हरम के अनसुने राज: जहाँआरा से लेकर ज़ेबुन्निसा तक के गुप्त इश्क और उनके दर्दनाक अंजाम
मुगल हरम का नाम आते ही मन में आलीशान महलों, खूबसूरत बागों और कड़े पहरे की तस्वीरें उभरने लगती हैं। लेकिन इन शाही दीवारों के पीछे एक ऐसी दुनिया भी थी, जो कड़े अनुशासन, बंदिशों और खामोश आंसुओं से भरी हुई थी। मुगलों के हरम में सख्त पाबंदियां थीं और आमतौर पर इन पर किन्नरों का पहरा रहता था। इसके बावजूद, भीतर की कहानियां बाहर आ ही जाती थीं। शहजादियों के प्रेम-प्रसंग, खुसर-पुसुर और लुका-छिपी के किस्से एक कान से दूसरे कान तक सफर तय करते हुए दूर तक फैल जाते थे। दरबारी इतिहासकारों से तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती थी कि वे इन बातों को अपनी किताबों में दर्ज करेंगे, लेकिन उस दौर में दरबार के करीब पहुंचे यूरोपीय यात्रियों और इतिहासकारों ने इन दबे-छिपे रहस्यों को अपनी कलम से दर्ज किया। पकड़े जाने पर इन प्रेमियों को अक्सर अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
तख़्त के दावेदारों से बचने के लिए शहजादियां रखी गईं कुंवारी
बाबर और हुमायूं के समय कुछ मुगल शहजादियों की शादियां दरबार के ऊंचे ओहदेदारों के साथ हुई थीं। लेकिन अकबर के समय से यह सिलसिला लगभग थम गया। इस रोक के पीछे विशुद्ध रूप से राजनीतिक कारण थे। सोच यह थी कि अगर शाही परिवार की बेटियां बाहर ब्याही गईं, तो दूसरे कुल के लोग उत्तराधिकार के नए दावेदार बनकर तख्त पर अपनी दावेदारी ठोक सकते हैं और इससे साम्राज्य में समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
इन शहजादियों को खूब धन-दौलत, नियमित आमदनी के लिए जागीरें और ऊंचे खिताब दिए गए। उनकी बाहरी दुनिया चमक-दमक से रोशन जरूर थी, लेकिन निजी जिंदगी अंधेरों से भरी और बेड़ियों से जकड़ी हुई थी। हरम की महिलाओं का दायरा बेहद सीमित था—वे कभी-कभार बाग, दरगाह या किसी करीबी रिश्तेदार के घर तक ही जा सकती थीं। जब अपनों की तरफ से ऐसी पाबंदियां थोपी जाती हैं, तो खतरों के बीच भी प्यार-मोहब्बत के अंकुर फूट ही जाते हैं।
जहाँआरा से मोहब्बत की सजा मौत
मुगल इतिहास की शहजादियों में शाहजहां की बेटी जहाँआरा बेगम का मुकाम सबसे ऊंचा था। मुमताज़ महल की मौत के बाद वही 'पादशाह बेगम' बनीं और पूरे हरम की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। औरंगज़ेब द्वारा शाहजहां को बंदी बनाए जाने और फिर उनकी मौत तक जहाँआरा ने पूरी निष्ठा से पिता की खिदमत की। बाद में औरंगज़ेब ने भी उन्हें दरबार में ऊंचा दर्जा दिया, लेकिन शादी उनकी किस्मत में नहीं थी।
बेहद जहीन जहाँआरा पढ़ने-लिखने की बड़ी शौकीन थीं। माना जाता है कि एक अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली ईरानी अमीर नज़र ख़ां से उनका प्रेम-प्रसंग चल रहा था। जब इसकी भनक शाहजहां को लगी, तो वह बेहद कुपित हुआ। नतीजतन, नज़र ख़ां को विष देकर मरवा दिया गया। फ्रांसीसी यात्री फ़्रांस्वा बर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनुच्ची दोनों ने ही इसका अपनी यात्रा वृत्तांतों में उल्लेख किया है।
रोशनआरा बेगम का इश्क और औरंगजेब का कड़ा रुख
तख़्त के लिए हुई खूनी जंग में जहाँआरा बड़े भाई दारा शिकोह के साथ थीं, तो उनकी बहन रोशनआरा छोटे भाई औरंगज़ेब के समर्थन में खड़ी थीं। बादशाह बनने के बाद औरंगज़ेब ने रोशनआरा को 'मल्लिका-ए-जहाँ' का खिताब दिया। लेकिन औरंगज़ेब का सब्र तब जवाब दे गया, जब हरम में रोशनआरा के इश्क में गिरफ्तार मर्दों के आने-जाने की भनक उसे लगी। औरंगज़ेब ने खुद सच्चाई का पता लगाने की ठानी।
शाही फौज ने हरम को इस तरह घेरा कि कोई बाहर न जा सके। औरंगज़ेब अंदर पहुंचा और उसने रोशनआरा को उसके ईरानी आशिक के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया। उस ईरानी को तुरंत मौत की सजा दी गई। असल में, रोशनआरा का यह इश्क वालिद शाहजहां के वक्त से चल रहा था और वह आशिक उनके नाना आसफखां का दूर का रिश्तेदार था। शाहजहां ने तब रियायत बरतते हुए उसे काबुल भेज दिया था, लेकिन औरंगज़ेब के दौर में मजबूत होने पर रोशनआरा ने उसे वापस बुला लिया था।
यही नहीं, जासूसी के दौरान औरंगज़ेब की बेटी ज़ेबुन्निसा ने जब फूफी रोशनआरा के कई अन्य आशिकों के राज खोले, तो हनफ़ी कानून के तहत सबूत मिलने पर पांच लोगों को मौत की सजा दी गई। इस भारी फजीहत और बदनामी से आहत होकर रोशनआरा ने जहर पीकर अपनी जान देने की भी कोशिश की थी।
ज़ेबुन्निसा का शायराना इश्क और कैदखाना
औरंगज़ेब की बेहद खास बेटी ज़ेबुन्निसा फारसी की उम्दा शायरा थीं और 'मख़्फ़ी' उपनाम से शायरी लिखती थीं। चर्चा थी कि उनका इश्क लाहौर के सूबेदार अक़ील ख़ां रज़ी से हो गया था। दोनों के बीच शायरी के जरिए दिलों का आदान-प्रदान होता था। हालांकि औरंगज़ेब को जब इस प्रेम-प्रसंग की भनक लगी, तो उसने अपनी ही बेटी को लंबे समय तक कड़ी कैद में रखा।
गुलबदन बेगम, सलीमा सुल्तान बेगम और ज़ीनत-उन-निसा जैसी कई अन्य शाही महिलाओं के जीवन से जुड़े ऐसे प्रेम-प्रसंग भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। जब भी इन गुप्त प्रेम कहानियों का पर्दाफाश हुआ, प्रेमियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। किसी को जहर दिया गया, किसी का गला घोंटा गया तो किसी को हाथियों से कुचलवा दिया गया। इस खौफनाक और सख्त पहरे वाले दौर में वे ही लोग खुशकिस्मत माने जाते थे, जिन्हें मौत की बजाय सिर्फ सल्तनत से मीलों दूर कहीं निष्कासित कर दिया जाता था।