यूपी के CEO ने चुनाव आयोग पर लगे आरोपों को बताया फर्जी
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग (Election Commission of India - ECI) की निष्पक्षता, पारदर्शिता और कार्यप्रणाली देश के चुनावी ढांचे का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है। लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक मंचों पर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को संदिग्ध बनाने के लिए तमाम तरह के दावे किए जाने लगे हैं। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश की चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बेहद सनसनीखेज दावा तेजी से वायरल हुआ, जिसमें यह कहा गया कि निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश में लगभग 85 हजार फॉर्म्स को ऑटोमैटिक तरीके से डिलीट (Auto Delete) कर दिया है। इस वायरल दावे के तूल पकड़ने और विपक्ष तथा जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होने के बाद, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO UP) ने इस पर कड़ा संज्ञान लिया है। चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह से फर्जी, भ्रामक और मनगढ़ंत करार दिया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले लोगों को करारा जवाब मिला है।
क्या था पूरा वायरल दावा और क्यों मचा सियासी गलियारों में हड़कंप?
सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर पिछले कुछ दिनों से यह खबर आग की तरह फैल रही थी कि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के पुनरीक्षण या विशेष अभियानों के दौरान नागरिकों द्वारा भरे गए 85,000 से अधिक आवेदन फॉर्म्स को बिना किसी उचित कारण या पूर्व सूचना के सिस्टम द्वारा स्वतः (Auto Delete) हटा दिया गया है। इस प्रकार की खबरों के सामने आते ही विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। आरोप लगाया गया कि यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और मतदान सूची में नाम जुड़वाने के अधिकार पर सीधा हमला है। इस तरह के दावों से आम मतदाताओं के मन में यह आशंका घर करने लगी थी कि कहीं उनके आवेदन सचमुच गायब तो नहीं हो गए हैं, जिससे राजनीतिक पारा अचानक चढ़ गया और राज्य निर्वाचन कार्यालय को इस पर तुरंत स्पष्टीकरण देना पड़ा।
यूपी के सीईओ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिए सभी आरोपों के करारे जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने आधिकारिक तौर पर खंडन जारी किया और पूरी स्थिति का स्पष्टीकरण दिया। निर्वाचन अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा कि 85 हजार फॉर्म्स के ऑटो डिलीट होने की यह पूरी कहानी सरासर झूठ और आधारहीन है। चुनाव आयोग द्वारा उपयोग किया जाने वाला वोटर सर्विस पोर्टल (Voter Service Portal) और इलेक्टोरल डेटा मैनेजमेंट सिस्टम पूरी तरह से सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीकी रूप से उन्नत है। किसी भी वैध आवेदक के फॉर्म को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया, सत्यापन या तकनीकी मानकों के न तो हटाया जा सकता है और न ही सिस्टम द्वारा खुद-ब-खुद डिलीट किया जा सकता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों ने अपने फॉर्म सही दस्तावेजों के साथ भरे हैं, उनके आवेदन पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन पर नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है।
फेक न्यूज और भ्रामक दुष्प्रचार फैलाने वालों के खिलाफ सख्त चेतावनी
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर बिना किसी तथ्यात्मक जांच के सनसनीखेज खबरें फैलाना एक आम प्रवृत्ति बन गई है। चुनाव आयोग ने इस घटना को बहुत गंभीरता से लेते हुए चेतावनी दी है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि को धूमिल करने और मतदाताओं के बीच अनावश्यक अविश्वास पैदा करने के लिए इस तरह के मनगढ़ंत आरोप लगाए जा रहे हैं। निर्वाचन आयोग ने नागरिकों और मीडिया से भी अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की भ्रामक या असत्यापित सूचना पर तुरंत भरोसा न करें। चुनाव से जुड़े किसी भी प्रकार के आधिकारिक आंकड़े और अपडेट्स केवल आयोग की अधिकृत वेबसाइट या आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स से ही प्राप्त किए जाने चाहिए। इस प्रकार के दुष्प्रचार करने वाले तत्वों पर साइबर सेल और आईटी विंग द्वारा कड़ी नजर रखी जा रही है ताकि भविष्य में इस तरह की अफवाहों पर लगाम लगाई जा सके।
चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मतदाता सूची की सुरक्षा का पूरा भरोसा
उत्तर प्रदेश निर्वाचन कार्यालय ने एक बार फिर दोहराया है कि राज्य में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मतदाता सूची (Voter List) में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से कानून के दायरे में रहकर की जाती है, जिसमें हर कदम पर पारदर्शिता बरती जाती है। यदि किसी नागरिक को अपने आवेदन की स्थिति (Application Status) जानmने में कोई असुविधा हो रही है, तो वे आधिकारिक पोर्टल या हेल्पलाइन नंबर के जरिए सीधे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। निर्वाचन आयोग के इस स्पष्ट और कड़े रुख के बाद 85 हजार फॉर्म्स के डिलीट होने से जुड़ा यह मनगढ़ंत विवाद अब पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है, जिससे यह साबित होता है कि संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ फैलाए जाने वाले भ्रम ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते।