US-Iran : इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा, अब दूसरे राउंड की तैयारी,क्या टल पाएगा महायुद्ध?
News India Live, Digital Desk: दुनिया की नजरें एक बार फिर दक्षिण एशिया की ओर मुड़ गई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब एक नाजुक मोड़ पर है। हाल ही में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच हुई ऐतिहासिक 'शांति वार्ता' का पहला दौर बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हो गया है। हालांकि, कूटनीतिक गलियारों से खबर आ रही है कि दोनों पक्ष जल्द ही दूसरे दौर (Second Round) की बातचीत के लिए मेज पर लौट सकते हैं। वैश्विक शांति और तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए इस संवाद को बेहद अहम माना जा रहा है।
इस्लामाबाद वार्ता: 21 घंटे का मैराथन मंथन और 'रेड लाइन्स' का टकराव
इस्लामाबाद में अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच करीब 21 घंटे तक मैराथन चर्चा हुई। अमेरिकी पक्ष ने स्पष्ट किया कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ा अंकुश चाहते हैं, जबकि ईरान ने अपनी संप्रभुता और जब्त किए गए करीब 27 अरब डॉलर के फंड को जारी करने की शर्त रखी है। ट्रंप प्रशासन की ओर से 'नो डील' की बात कही गई, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर फंसा पेच
इस पूरी बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' को लेकर है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अमेरिका चाहता है कि ईरान इस रास्ते को बिना किसी 'ट्रांजिट शुल्क' के सभी के लिए खोल दे, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा और राजस्व का जरिया मानता है। इसी खींचतान के कारण पहले दौर में कोई अंतिम सहमति नहीं बन पाई।
दूसरे दौर की तैयारी: क्या वेन्यू बदलेगा या फिर होगा इस्लामाबाद?
मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान, कतर और तुर्की जैसे मध्यस्थ देश अब दूसरे दौर की वार्ता को 22 अप्रैल से पहले आयोजित करने की कोशिश कर रहे हैं। चर्चा है कि अगली बैठक फिर से इस्लामाबाद में हो सकती है या किसी अन्य न्यूट्रल स्थान जैसे मस्कट (ओमान) या दोहा (कतर) पर विचार किया जा सकता है। क्षेत्रीय शांति के लिए यह जरूरी है क्योंकि दोनों देशों के बीच घोषित दो हफ्ते का 'सीजफायर' जल्द ही खत्म होने वाला है।
दुनिया पर क्या होगा असर? शांति या संघर्ष?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दूसरे दौर की बातचीत सफल नहीं होती है, तो पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल और गहरे हो सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही संकेत दिया है कि वे समझौते के लिए किसी भी दबाव में नहीं हैं। वहीं, ईरानी नेतृत्व भी अपने परमाणु अधिकारों को लेकर अडिग है। ऐसे में आगामी कुछ दिन वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए 'करो या मरो' की स्थिति वाले साबित हो सकते हैं।