फार्मा सेक्टर पर ट्रंप का 'टैरिफ अटैक': पेटेंटेड दवाओं पर 100% टैक्स का एलान, भारतीय जेनेरिक कंपनियों को फिलहाल मिली बड़ी राहत!
वॉशिंगटन/नई दिल्ली: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार ने वैश्विक फार्मास्युटिकल बाजार में एक बड़ा धमाका कर दिया है। ट्रंप प्रशासन ने 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को और कड़ा करते हुए विदेशी पेटेंटेड दवाओं पर 100% तक भारी-भरकम टैरिफ लगाने का प्रस्ताव पेश किया है। इस फैसले ने दुनिया भर की बड़ी दवा कंपनियों की नींद उड़ा दी है, हालांकि भारत की जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए यह खबर एक 'ब्रीदिंग स्पेस' यानी थोड़ी राहत लेकर आई है। ट्रंप का यह कदम स्पष्ट रूप से दवा कंपनियों को अपना उत्पादन अमेरिका में शिफ्ट करने के लिए मजबूर करने की एक बड़ी रणनीतिक चाल मानी जा रही है।
पेटेंटेड दवाओं पर 'हंड्रेड परसेंट' की मार, डेडलाइन भी तय
ट्रंप प्रशासन के नए प्रस्ताव के अनुसार, अब अमेरिका में आयात होने वाली पेटेंटेड दवाओं पर सीधे 100% टैरिफ लगेगा। इसके कार्यान्वयन के लिए बड़ी कंपनियों को 120 दिन और छोटी कंपनियों को 180 दिन की समयसीमा दी गई है। हालांकि, अमेरिका ने अपने कुछ खास व्यापारिक साझेदारों को इसमें रियायत भी दी है। यूरोपीय संघ (EU), जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और लिकटेंस्टीन से आने वाले उत्पादों पर केवल 15% टैरिफ लगेगा, जबकि यूनाइटेड किंगडम (UK) से होने वाले आयात पर इससे भी कम शुल्क लगाया जाएगा।
'मोस्ट फेवर्ड नेशन' एग्रीमेंट और टैरिफ से बचने का रास्ता
जो कंपनियां इस भारी-भरकम टैक्स से बचना चाहती हैं, उनके सामने ट्रंप सरकार ने दो मुख्य शर्तें रखी हैं। पहली शर्त है "ऑनशोरिंग" यानी अमेरिका की धरती पर ही दवाओं का उत्पादन करना और दूसरी है "मोस्ट फेवर्ड नेशन" (MFN) प्राइसिंग एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करना। जो कंपनियां इन दोनों शर्तों को मानेंगी, उन्हें 20 जनवरी 2029 तक टैरिफ से पूरी तरह छूट मिल सकती है। MFN एग्रीमेंट के तहत कंपनियों को अमेरिका को वही सबसे कम कीमत देनी होगी, जो वे दुनिया में अपने किसी भी अन्य ग्राहक को देते हैं। वहीं, जो कंपनियां केवल अमेरिका में उत्पादन करने को तैयार होंगी, उन्हें शुरुआत में 20% टैरिफ देना होगा, जो चार साल के भीतर बढ़कर 100% तक पहुंच जाएगा।
जेनेरिक दवाओं को एक साल का 'सेफ पीरियड'
भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए सबसे सुकून वाली बात यह है कि जेनेरिक दवाओं, बायोसिमिलर और इनके कच्चे माल (API) को फिलहाल इस टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है। ट्रंप सरकार ने संकेत दिया है कि इन पर एक साल बाद समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा, दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) की दवाएं, पशु स्वास्थ्य उत्पाद और पहले से व्यापारिक समझौता कर चुके देशों से आने वाली सप्लाई को भी फिलहाल इस टैक्स से राहत दी गई है। हालांकि, सरकार ने सख्त निगरानी और बाहरी ऑडिट का प्रावधान रखा है, जिसके तहत भविष्य में रेट्रोस्पेक्टिव टैरिफ (पिछली तारीख से टैक्स) लगाने का अधिकार भी अपने पास रखा है।
भारतीय कंपनियों पर असर: सन फार्मा के लिए चुनौती और अवसर
ट्रंप के इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारत की दिग्गज कंपनी सन फार्मा पर पड़ सकता है। सन फार्मा देश की एकमात्र ऐसी बड़ी कंपनी है जिसकी आय का करीब 20% हिस्सा ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं से आता है। हालांकि, कंपनी के लिए एक सकारात्मक पहलू यह है कि उसकी अहम दवा 'Illumya' का उत्पादन यूरोप में होता है, जिससे उसे यूरोपीय देशों के लिए तय किए गए 15% के रियायती टैरिफ का लाभ मिल सकता है।
अमेरिका के लिए 'लाइफलाइन' है भारत की जेनेरिक दवाएं
आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका अपनी कुल जेनेरिक दवाओं की जरूरत का लगभग 40-50% हिस्सा भारत से ही पूरा करता है। वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल फार्मा निर्यात का 34-35% हिस्सा केवल अमेरिका को गया, जिसकी कीमत करीब 2.78 लाख करोड़ रुपये ($3000 करोड़) थी। इसमें से करीब 97.38 हजार करोड़ रुपये ($1050 करोड़) का निर्यात सिर्फ जेनेरिक दवाओं का था, जो कुल निर्यात का 95% से अधिक है। जेनेरिक निर्यात में पिछले साल 20.4% की भारी बढ़ोतरी देखी गई थी। एक साल बाद होने वाली समीक्षा भारतीय कंपनियों के लिए भविष्य की अनिश्चितता को जरूर बढ़ाती है, लेकिन फिलहाल के लिए भारत का जेनेरिक बाजार सुरक्षित नजर आ रहा है।