लद्दाख की वो 5 अनसुनी जन्नत जहां नहीं पहुंचती सैलानियों की भारी भीड़, गर्मियों में सुकून तलाशने वालों के लिए हैं बेस्ट
जुलाई और अगस्त का महीना आते ही देशभर के घुमक्कड़ पहाड़ों की ओर रुख करने लगते हैं। खासकर एडवेंचर और प्रकृति प्रेमियों के लिए लद्दाख (Ladakh Tourism) हमेशा से ही सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन रहा है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे मैदानी राज्यों में उमस और भीषण गर्मी से बचने के लिए लोग बड़ी संख्या में लेह-लद्दाख पहुंच रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पैंगोंग सो, खारदुंग ला और नुब्रा वैली जैसी मशहूर जगहों पर इन दिनों सैलानियों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जिससे वहां का असली सुकून कहीं खो गया है? अगर आप इस सीजन शोर-शराबे से दूर असली शांति, प्राचीन तिब्बती संस्कृति और चमचमाते तारों से भरे आसमान का दीदार करना चाहते हैं, तो लद्दाख की इन 5 ऑफबीट जगहों की यात्रा जरूर प्लान करें।
तुरतुक गांव: भारत का आखिरी और बेहद खूबसूरत सीमांत गांव
नुब्रा वैली की सुदूर गहराइयों में श्योक नदी के किनारे बसा तुरतुक (Turtuk Village) भारत के सबसे अनोखे ऑफबीट डेस्टिनेशंस में से एक है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले यह खूबसूरत इलाका पाकिस्तान के कब्जे में था, जिसे बाद में भारतीय सेना ने वापस ले लिया। इस गांव की संस्कृति लद्दाख के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है। यहां रहने वाले बाल्टी समुदाय के लोग बेहद मिलनसार हैं और उनकी भाषा, खान-पान और पहनावे में बाल्टी संस्कृति की अनूठी झलक मिलती है। यहां के खुबानी (Apricot) के बगीचे, पथरीली संकरी गलियां और पीओके की सीमा के नज़दीक होने का अहसास आपको एक बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाता है।
चुशुल गांव: पैंगोंग झील के बेहद करीब बसा एक शांत इतिहास
पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर पर बसा चुशुल (Chushul Village) एक ऐसी जगह है जो न केवल अपनी असीम प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती है, बल्कि इसका गहरा ऐतिहासिक और सामरिक महत्व भी है। साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला की ऐतिहासिक लड़ाई इसी क्षेत्र के पास लड़ी गई थी। पर्यटकों की भारी भीड़ से कोसों दूर यह शांत गांव उन लोगों के लिए बेहतरीन जगह है जो लद्दाख की पथरीली पहाड़ियों और नीले आसमान के बीच एक गहरा एकांत चाहते हैं। यहां का युद्ध स्मारक भी देशप्रेम की भावना को जगाने के लिए बेहद खास है।
सुमेूर गांव: नुब्रा वैली का एक अनछुआ और शांत कोना
अकसर नुब्रा वैली जाने वाले पर्यटक केवल हुंडर (Hunder) के रेत के टीलों और दो कूबड़ वाले ऊंटों को देखकर लौट आते हैं, लेकिन श्योक नदी के पार बसा सुमूर गांव (Sumur Village) इस पूरी घाटी का सबसे शांत और हरा-भरा कोना है। यह गांव अपने विशाल और ऐतिहासिक समस्तानलिंग बौद्ध मठ (Samstanling Monastery) के लिए प्रसिद्ध है, जहां की शांति और अध्यात्म मन को भीतर तक शांत कर देता है। शांत वातावरण में प्रकृति के करीब समय बिताने और लोकल लद्दाखी होमस्टे का अनुभव लेने के लिए सुमूर एक बेहतरीन विकल्प है।
हानले गांव: डार्क स्काई रिजर्व और तारों की जादुई दुनिया
अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं या रात में खुले आसमान में टिमटिमाते लाखों तारों और मिल्की वे (आकाशगंगा) को अपनी नग्न आंखों से देखना चाहते हैं, तो हानले (Hanle) आपके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। चांगथांग क्षेत्र के सुदूर इलाके में स्थित हानले को भारत का पहला 'डार्क स्काई रिजर्व' (Dark Sky Reserve) घोषित किया गया है। यहां का बेहद साफ और प्रदूषण मुक्त आसमान खगोलीय गतिविधियों को देखने के लिए सबसे उत्तम है। यहां स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला (Indian Astronomical Observatory) दुनिया की सबसे ऊंची वेधशालाओं में से एक है, जो पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है।
रंगदुम गांव: सुरु घाटी का अद्भुत और रहस्यमयी पड़ाव
कारगिल से पदुम (जंस्कार वैली) के रास्ते में स्थित रंगदुम (Rangdum) एक बेहद खूबसूरत और अलग-थलग बसा पहाड़ी गांव है। एक तरफ सुरु घाटी के हरे-भरे मैदान और दूसरी तरफ जंस्कार की बंजर और विशाल बर्फीली पहाड़ियां इस जगह को बेहद रोमांचक और विस्मयकारी बनाती हैं। यहां लगभग 18वीं शताब्दी का एक पुराना रंगदुम बौद्ध मठ भी स्थित है, जो एक छोटी पहाड़ी के ऊपर गर्व से खड़ा है। यह जगह उन साहसी यात्रियों के लिए बिल्कुल सही है जो अपनी रोड ट्रिप में कुछ हटकर और पूरी तरह से एडवेंचर्स देखना चाहते हैं।