काशी के इस पावन शक्तिपीठ में गिरे थे मां सती के कर्णकुंडल

काशी के इस पावन शक्तिपीठ में गिरे थे मां सती के कर्णकुंडल

सनातन धर्म और आध्यात्मिक नगरी के रूप में पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखने वाली बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में वैसे तो हर गली और हर कोने में कोई न कोई पावन मंदिर या तीर्थ स्थल मौजूद है, लेकिन जब बात आदिशक्ति मां जगदंबा के शक्तिपीठों की आती है, तो काशी के मीरघाट स्थित मां विशालाक्षी मंदिर का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। माँ विशालाक्षी को माता पार्वती का ही एक अत्यंत दिव्य और भव्य रूप माना जाता है, जिनकी विशाल और करुणा से भरी आंखें भक्तों के सभी दुखों को पलभर में दूर कर देती हैं। पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहाँ दक्ष प्रजापति के यज्ञ के बाद भगवान शिव द्वारा माता सती के शरीर को लेकर किए गए तांडव के दौरान माता के कर्णकुंडल यानी आभूषण गिरे थे। यही कारण है कि इस स्थान को 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जागृत शक्तिपीठ माना जाता है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ-साथ मां विशालाक्षी के दर्शन किए बिना अपनी काशी यात्रा अधूरी मानते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि मां विशालाक्षी के इस अद्भुत मंदिर का पौराणिक इतिहास क्या है और इसके पीछे कौन सी प्राचीन कथा जुड़ी हुई है।

पौराणिक कथा और शक्तिपीठों के उद्गम से जुड़ा मां विशालाक्षी का यह अलौकिक इतिहास

हिंदू धर्म के पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया गया था, तब माता सती बिना बुलाए ही अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई थीं। वहां पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने के दुख और क्रोध में आकर माता सती ने यज्ञ कुंड की पवित्र अग्नि में अपनी आहुति दे दी थी। इस प्रलयकारी घटना की जानकारी जब भगवान शिव को मिली, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने माता सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठाकर तांडव करना शुरू कर दिया था। ब्रह्मांड को इस विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को काट दिया था, जो अंग पृथ्वी पर जिस-जिस स्थान पर गिरे, वे सभी स्थान शक्तिपीठ बन गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी क्रम में वाराणसी के मीरघाट पर माता सती के कान के आभूषण और कर्णकुंडल गिरे थे, जिसके बाद इस स्थान का नाम विशालाक्षी शक्तिपीठ पड़ा। यहां 'विशाल' का अर्थ विशाल आंखों वाली और 'अक्षी' का अर्थ आंख होता है, जो मां के इस रूप की दिव्यता को पूरी तरह से चरितार्थ करता है।

मंदिर की भव्य वास्तुकला, गंगा तट के करीब स्थिति और भक्तों की गहरी आस्थ

गंगा नदी के पवित्र पावन तट और प्रसिद्ध मीरघाट के समीप स्थित मां विशालाक्षी का यह मंदिर वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण पेश करता है। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही एक अलग ही प्रकार की आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का अहसास होने लगता है। गर्भगृह में मां विशालाक्षी की दो मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में आदि विशालाक्षी और मुख्य विशालाक्षी के रूप में पूजा जाता है। मां का यह स्वरूप बहुत ही सौम्य, आकर्षक और भक्तों पर कृपा बरसाने वाला माना जाता है। खासकर नवरात्रि के पावन पर्व, मंगलवार और शुक्रवार के विशेष दिनों में इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है और दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं। ऐसी अटूट मान्यता है कि जो सुहागन महिलाएं सच्चे मन से मां विशालाक्षी की पूजा-अर्चना करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है। इसके अलावा, जीवन में आ रही तमाम बाधाओं और संकटों से मुक्ति पाने के लिए भी भक्त यहां आकर माता के चरणों में अपनी अर्जी लगाते हैं और माता सबकी झोली खुशियों से भर देती हैं।

काशी आने वाले हर श्रद्धालु के लिए दर्शनीय और मोक्षदायिनी शक्तिपीठ का महत्व

काशी केवल मुक्ति और मोक्ष की नगरी ही नहीं, बल्कि यह शक्ति की भी साधना स्थली है जहां काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के साथ माता अन्नपूर्णा और मां विशालाक्षी विराजमान होकर इस पूरे क्षेत्र का कल्याण करती हैं। आधुनिकता की इस दौड़ के बीच भी इस प्राचीन मंदिर की दीवारों और यहां होने वाली पारंपरिक आरती में आज भी वही पुरानी और पवित्र संस्कृति जीवित है। यदि आप भी कभी उत्तर प्रदेश के वाराणसी दौरे पर आते हैं और दशाश्वमेध घाट या मीरघाट के आसपास के ऐतिहासिक इलाकों का भ्रमण करते हैं, तो मां विशालाक्षी के इस दिव्य शक्तिपीठ के दर्शन करना बिल्कुल न भूलें। मंदिर परिसर में मिलने वाला प्रसाद, माता का श्रृंगार और वहां की सकारात्मक ऊर्जा आपके मन और मस्तिष्क को पूरी तरह से तरोताजा कर देगी। मां विशालाक्षी का यह शक्तिपीठ इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमारी सनातन संस्कृति और आस्था के धागे सदियों बाद भी कितने मजबूत और अटूट हैं।