दफनाने और जलाने के बजाय शवों को आसमान के हवाले करते हैं पारसी: क्या है रहस्यमयी 'टावर ऑफ साइलेंस' की सदियों पुरानी परंपरा

दफनाने और जलाने के बजाय शवों को आसमान के हवाले करते हैं पारसी: क्या है रहस्यमयी 'टावर ऑफ साइलेंस' की सदियों पुरानी परंपरा

दुनिया भर में इंसानी शवों के अंतिम संस्कार को लेकर अनगिनत परंपराएं और रीति-रिवाज मौजूद हैं, जहां धर्म और संस्कृति के आधार पर मृतकों को अग्नि को समर्पित किया जाता है या फिर जमीन के भीतर दफनाया जाता है। लेकिन इन सब के बीच दुनिया का एक ऐसा भी प्राचीन और विशिष्ट समुदाय है जिसकी अंतिम संस्कार की पद्धति इन सभी प्रचलित तौर-तरीकों से कोसों दूर और बेहद हैरान करने वाली है। हम बात कर रहे हैं पारसी समुदाय यानी जोरिएस्ट्रियन (Zoroastrian) धर्म के मानने वालों की, जो अपने मृत प्रियजनों के शरीर को न तो कभी आग में जलाते हैं और न ही कभी जमीन के अंदर दफनाते हैं। इस समुदाय में सदियों से एक अत्यंत गोपनीय और अनोखी परंपरा चली आ रही है, जिसे 'टावर ऑफ साइलेंस' या 'डख्‍मा' (Dakhma) के नाम से जाना जाता है। इस प्रथा के पीछे उनका एक गहरा दार्शनिक और धार्मिक विश्वास छिपा है, जिसके तहत शरीर को पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित कर दिया जाता है। आधुनिकता के इस दौर में जहां दुनिया तेजी से बदल रही है, वहीं पारसी समुदाय की यह रहस्यमयी परंपरा आज भी लोगों के बीच भारी जिज्ञासा और विस्मय का विषय बनी हुई है, जिसके बारे में हर कोई विस्तार से जानना चाहता है।

क्या है पारसी धर्म का 'टावर ऑफ साइलेंस' और इसके पीछे का दार्शनिक आधार?

पारसी समुदाय के धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, पृथ्वी, जल और अग्नि ये तीनों तत्व अत्यधिक पवित्र माने गए हैं और इन्हें किसी भी प्रकार के अशुद्धिकरण से बचाना प्रत्येक अनुयायी का परम कर्तव्य है। उनका यह पक्का विश्वास होता है कि जब किसी इंसान की मृत्यु हो जाती है, तो उसका शरीर अशुद्ध हो जाता है और उस मृत शरीर में सड़न पैदा होने लगती है। यदि इस अशुद्ध शरीर को जमीन में दफनाया जाए, तो वह पवित्र धरती को मैला कर देगा, और यदि इसे आग में जलाया जाए, तो पवित्र अग्नि अशुद्ध हो जाएगी। इसी धार्मिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के चलते उन्होंने शवों के निस्तारण का एक ऐसा अनूठा मार्ग निकाला जो प्रकृति के चक्र के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। 'टावर ऑफ साइलेंस' गोल आकार की एक ऊंची, खुली छत वाली संगमरमर या पत्थर की बनी हुई मीनार होती है, जिसे शहर के शोरगुल और आबादी से कोसों दूर किसी शांत पहाड़ी या एकांत स्थान पर बनवाया जाता है, ताकि वहां आम लोगों की पहुंच बिल्कुल न हो सके।

मृत शरीर को मीनार की छत पर रखने की पूरी गुप्त और पारंपरिक प्रक्रिया

जब पारसी समुदाय में किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके अंतिम संस्कार के लिए एक विशेष और बेहद सख्त धार्मिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है, जिसमें केवल कुछ चुनिंदा प्रशिक्षित लोगों को ही शामिल होने की अनुमति होती है जिन्हें 'नसकुसार' (Nasasalar) कहा जाता है। सबसे पहले मृतक के शरीर को विशेष प्रार्थनाओं और मंत्रोच्चार के साथ शुद्ध किया जाता है और उसे सफेद रंग के सूती कपड़ों में लपेटा जाता है। इसके बाद उस शव को एक पारंपरिक अर्थी पर रखकर अत्यंत गोपनीय तरीके से 'टावर ऑफ साइलेंस' के परिसर तक ले जाया जाता है। इस मीनार के भीतर प्रवेश करने की अनुमति सिर्फ उन विशेष लोगों को ही होती है जो शवों को संभालने का कार्य करते हैं, और परिवार के अन्य सदस्य या रिश्तेदार केवल एक निश्चित दूरी से ही अपनी प्रार्थना करते हैं। मीनार के भीतर पहुंचने के बाद शव को उसकी बनावट के अनुसार उस खुली छत पर बने विशेष खांचों में रख दिया जाता है, जहां से वह सीधे आसमान के नीचे और प्रकृति के खुले वातावरण के संपर्क में आ जाता है।

गिद्धों की भूमिका और आधुनिक समय में इस परंपरा के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियां

पारसी परंपरा के इस पूरे अनुष्ठान में पक्षियों, विशेषकर गिद्धों की भूमिका सबसे केंद्रीय और महत्वपूर्ण मानी जाती थी, क्योंकि टावर ऑफ साइलेंस की छत पर रखे जाने वाले शवों को प्राकृतिक रूप से साफ करने का काम यही पक्षी किया करते थे। कुछ ही घंटों या दिनों के भीतर गिद्ध उस मृत शरीर के मांस को पूरी तरह से साफ कर देते थे और केवल सूखी हड्डियां शेष रह जाती थीं, जिन्हें बाद में धूप में सूखने के बाद मीनार के बीच बने कुएं में गिरा दिया जाता था, जो प्रकृति में विलीन हो जाती थीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में पर्यावरण में आए भारी बदलाव और मुख्य रूप से देश भर में गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट के कारण पारसी समुदाय के सामने इस प्राचीन परंपरा को निभाने में एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है। गिद्धों के लगभग विलुप्त होने की वजह से शवों का प्राकृतिक रूप से विघटन होना बहुत कठिन हो गया है, जिसके चलते मुंबई और अन्य प्रमुख पारसी बहुल क्षेत्रों में अब इस व्यवस्था के विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है, हालांकि इसके मूल धार्मिक स्वरूप को बचाने के लिए अभी भी प्रयास जारी हैं।

समय के साथ बदलती दुनिया और इस प्राचीन संस्कृति का अटूट अस्तित्व

पारसी समुदाय संख्या के लिहाज से भले ही दुनिया में एक बहुत छोटा अल्पसंख्यक वर्ग हो, लेकिन उनके सांस्कृतिक मूल्य, परोपकार और इतिहास पूरी दुनिया में अत्यंत सम्मानित रहे हैं। 'टावर ऑफ साइलेंस' जैसी उनकी यह अनोखी परंपरा भले ही आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में पहली बार सुनने वाले को थोड़ी अजीब या रहस्यमयी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे प्रकृति के प्रति उनका अगाध प्रेम और संसाधनों के सम्मान की भावना छिपी है। यह प्रथा हमें यह सिखाती है कि कैसे प्राचीन संस्कृतियों ने अपने धर्म और पर्यावरण के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया था जो आज के समय में भी विचार का विषय है। आधुनिकता के इस दौर में जहां हर परंपरा पर सवाल उठाए जाते हैं, वहीं पारसी समुदाय आज भी अपनी इस अनूठी विरासत को अपनी आस्था का प्रतीक मानकर सहेजे हुए है, जो मानव इतिहास के विविधतापूर्ण सांस्कृतिक ताने-बाने का एक बेहद अनमोल और अनसुना हिस्सा बना हुआ है।