माउंट आबू में मिला देश का दूसरा सबसे पुराना 'सफेदा' का पेड़, अंग्रेजों के जमाने के इस अनोखे पौधे का रहस्य
राजस्थान के एकमात्र ठंडे और खूबसूरत हिल स्टेशन माउंट आबू की हसीन वादियों से प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और रोमांचक खबर सामने आई है। अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक इमारतों और प्राचीन मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर माउंट आबू में एक ऐसा अद्भुत और दुर्लभ पेड़ खोज निकाला गया है, जो देश भर में अपने आप में अनोखा है। वन विभाग और स्थानीय पर्यावरण शोधकर्ताओं की एक टीम ने जब इस विशालकाय और प्राचीन पेड़ की उम्र और उसकी प्रजाति का वैज्ञानिक अध्ययन किया, तो यह हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि यह देश का दूसरा सबसे पुराना 'सफेदा' यानी यूकेलिप्टस का पेड़ है। इस ऐतिहासिक पेड़ को आज से करीब डेढ़ सदी पहले यानी ब्रिटिश हुकूमत के दौर में अंग्रेजों द्वारा यहां लगाया गया था। जैसे ही इस अनोखे और दुर्लभ पेड़ की खोज की खबर सार्वजनिक हुई, देश भर के वनस्पति वैज्ञानिकों, पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के बीच भारी उत्सुकता पैदा हो गई है और हर कोई इस ऐतिहासिक धरोहर को अपनी आंखों से देखने के लिए माउंट आबू की तरफ खिंचा चला आ रहा है।
#माउंट आबू की हसीन वादियों में अंग्रेजों के जमाने का अनमोल तोहफा
ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेजों को भारत के गर्म मैदानी इलाकों से राहत पाने के लिए माउंट आबू की जलवायु बेहद पसंद आई थी, और वे गर्मियों के दिनों में अपनी प्रशासनिक राजधानी को यहीं शिफ्ट कर लिया करते थे। उस दौर में अंग्रेजों ने न केवल यहां खूबसूरत बंगले, क्लब और सड़कें बनवाईं, बल्कि वे अपने साथ दुनिया भर से कई दुर्लभ पौधों और पेड़ों के बीज भी लेकर आए थे ताकि वे इस हिल स्टेशन के पर्यावरण को और अधिक हरा-भरा और अपने अनुकूल बना सकें। इसी कड़ी में ब्रिटिश अधिकारियों ने यहां सफेदा यानी यूकेलिप्टस के कुछ चुनिंदा पौधे रोपे थे, जिनमें से यह विशालकाय पेड़ आज भी अपनी पूरी शान के साथ जीवित और सुरक्षित है। स्थानीय बुजुर्गों और इतिहास के जानकारों का कहना है कि अंग्रेजों ने इस पेड़ को यहां की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाने के मकसद से लगाया था, लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि आने वाले समय में यह पौधा देश के सबसे पुराने और दुर्लभ जीवित सफेदा पेड़ों की सूची में शामिल हो जाएगा।
#वैज्ञानिक अध्ययन और पेड़ की उम्र का हैरान करने वाला खुलासा
जब स्थानीय पर्यावरणविदों और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पेड़ के विशाल तने, उसकी अनूठी छाल और ऊंचाई का बारीकी से निरीक्षण किया, तो उन्हें इसके सामान्य पेड़ होने पर शक हुआ। इसके बाद बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया और विभिन्न विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम ने इसकी उम्र का पता लगाने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया। अध्ययन में यह चौंकाने वाला परिणाम सामने आया कि इस पेड़ की उम्र लगभग डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक हो चुकी है। भारत में यूकेलिप्टस या सफेदा के पेड़ों का इतिहास बहुत पुराना नहीं माना जाता है, और इतनी लंबी उम्र के जीवित पेड़ देश में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। इस खोज के बाद इस पेड़ को देश का दूसरा सबसे पुराना सफेदा होने का आधिकारिक दर्जा मिलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जो माउंट आबू के वानस्पतिक इतिहास में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
#पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन के लिहाज से क्यों खास है यह खोज
इस दुर्लभ और प्राचीन पेड़ के मिलने से न केवल माउंट आबू के वन विभाग का मान बढ़ा है, बल्कि इसने देश-विदेश के पर्यटकों के लिए भी एक नया और रोमांचक आकर्षण पैदा कर दिया है। आमतौर पर पर्यटकों के लिए माउंट आबू का मतलब नक्की झील, सनसेट पॉइंट और दिलवाड़ा के जैन मंदिर ही रहे हैं, लेकिन अब इस ऐतिहासिक सफेदा के पेड़ के जुड़ जाने से यहां 'इको-टूरिज्म' को एक नई दिशा मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। राजस्थान सरकार और वन विभाग अब इस प्राचीन धरोहर के संरक्षण के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार कर रहे हैं ताकि इसे दीमक, बीमारियों और मानवीय दखलंदाजी से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके। पेड़ के आसपास के इलाके को विकसित कर इसे एक हेरिटेज नेचर साइट के रूप में तब्दील करने की तैयारी चल रही है, जहां आने वाले पर्यटक और छात्र इस अनोखे पेड़ के इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकें।
#देश की वानस्पतिक धरोहर और भविष्य की अनुसंधान योजनाएं
यह खोज इस बात का भी प्रमाण है कि माउंट आबू की जैव विविधता और जलवायु कितनी समृद्ध और अनूठी है, जो डेढ़ सौ साल पहले लगाए गए विदेशी मूल के पौधे को भी आज तक इतने शानदार तरीके से संजोए हुए है। देश के विभिन्न शोध संस्थानों के वैज्ञानिक अब इस बात का अध्ययन करने में जुटे हैं कि आखिर कैसे इस पेड़ ने प्रतिकूल जलवायु परिवर्तनों और बदलते मौसम के बीच इतने लंबे समय तक अपनी जीवनक्षमता को बनाए रखा। वनस्पति विज्ञान के छात्रों के लिए यह पेड़ अब एक जीवंत प्रयोगशाला बन चुका है, जहां वे यूकेलिप्टस प्रजाति के जीवन चक्र और उसकी दीर्घायु के रहस्यों को करीब से समझ सकते हैं। स्थानीय प्रशासन ने आम नागरिकों और पर्यटकों से अपील की है कि वे जब भी माउंट आबू आएं, इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने जरूर जाएं और इसके संरक्षण में प्रशासन का पूरा सहयोग करें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी देश की इस अमूल्य प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत की गवाह बन सकें।