तारा कोल ब्लॉक नीलामी पर छत्तीसगढ़ में सियासी संग्राम: दीपक बैज के बड़े खुलासे से गरमाई राजनीति
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में खनिजों, संसाधनों और औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर होने वाली राजनीति हमेशा से सूबे के सियासी तापमान को बढ़ाने का काम करती रही है। इसी कड़ी में अब 'तारा कोल ब्लॉक' की नीलामी को लेकर एक ऐसा बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। राज्य में कोल ब्लॉकों के आवंटन और उनकी नीलामी की प्रक्रिया हमेशा से संवेदनशील मुद्दों में शुमार रही है, क्योंकि इसका सीधा संबंध पर्यावरण, स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों और राज्य के आर्थिक हितों से जुड़ा होता है। हाल ही में तारा कोल ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक पटल पर हलचल तेज कर दी है। उनके इस बयान के बाद से यह मुद्दा राज्य की मुख्य बहसों में सबसे ऊपर आ गया है और इस बात पर कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
छत्तीसगढ़ देश के उन प्रमुख राज्यों में शुमार है जहां प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक खनिजों और कोयले काार भंडार मौजूद है। यही वजह है कि देश के बड़े उद्योगपति और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां यहां के कोल ब्लॉकों पर अपनी नजरें गड़ाए रहती हैं। तारा कोल ब्लॉक भी इसी कड़ी का एक बेहद चर्चित और महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जिसके आवंटन और नीलामी को लेकर पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर खींचतान देखने को मिलती रही है। जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, तब इस प्रकार के कोयला खदानों और औद्योगिक परियोजनाओं के मामलों में स्थानीय जनता के हितों को सर्वोपरि रखने की बात कही जाती थी। तारा कोल ब्लॉक को लेकर भी पूर्व की सरकारों के कार्यकाल में कई तरह के कड़े फैसले लिए गए थे ताकि पर्यावरण और स्थानीय हितों का संतुलन बना रहे। लेकिन जैसे ही सत्ता के समीकरण बदले और केंद्र तथा राज्य के प्रशासनिक निर्णयों में बदलाव आया, वैसे ही इन खदानों की नीलामी की प्रक्रिया ने एक बार फिर से रफ्तार पकड़ ली, जिससे विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का एक और बड़ा मौका मिल गया है।
इस पूरे विवाद को हवा देने का काम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के उस तीखे बयान ने किया, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर केंद्र सरकार और वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दीपक बैज ने मीडिया के सामने खुलकर यह बात रखी कि तारा कोल ब्लॉक की इस पूरी नीलामी प्रक्रिया के पीछे केंद्र सरकार की वह अनुमति है जो ताबड़तोड़ तरीके से दी गई है। उनका यह तर्क था कि छत्तीसगढ़ के संसाधनों को सुनियोजित तरीके से बाहर के पूंजीपतियों के हाथों में सौंपने की जो नीति अपनाई जा रही है, वह राज्य के हितों के पूरी तरह खिलाफ है। बैज ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से जल, जंगल और जमीन की रक्षा के पक्ष में खड़ी रही है और छत्तीसगढ़ की अमूल्य संपदा को इस तरह से औने-पौने दामों पर या मनमाने तरीके से नीलाम किए जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। उनके इस आक्रामक रुख ने एक तरफ जहां पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम किया है, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेताओं को भी इस पर सफाई देने के लिए मजबूर कर दिया है।
दीपक बैज ने अपने इस बयान में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल का विशेष रूप से उल्लेख किया और यह याद दिलाया कि जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, तब तारा कोल ब्लॉक की इस विवादास्पद नीलामी और आवंटन पर कड़ा रुख अपनाते हुए बाकायदा रोक लगा दी गई थी। उनका कहना था कि भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के पर्यावरण, वनों की कटाई और स्थानीय आदिवासियों के विस्थापन के खतरे को भांपते हुए इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने से रोक दिया था ताकि आम जनता के अधिकारों पर कोई आंच न आ सके। कांग्रेस नेताओं का यह तर्क है कि पिछली सरकार ने जनहित को ध्यान में रखते हुए जो साहसिक फैसले लिए थे, उन्हें अब वर्तमान व्यवस्था के तहत कमजोर किया जा रहा है और केंद्रीय एजेंसियों की अनुमति से उन तमाम रोकों को दरकिनार करके नीलामी की प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी गई है। इस तुलनात्मक राजनीति के जरिए कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि वे छत्तीसगढ़ की जनता के असली हितैषी हैं, जबकि विरोधी दल केवल कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रहे हैं।
तारा कोल ब्लॉक की नीलामी को लेकर छिड़ा यह विवाद असल में उस चिरपरिचित बहस का एक और रूप है जो हमेशा से 'औद्योगिक विकास' और 'पर्यावरण संरक्षण' के बीच होती आई है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार और समर्थक दलों का यह मानना है कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला खदानों का संचालन और उनकी समय पर नीलामी होना बेहद जरूरी है, जिससे राजस्व में बढ़ोतरी होती है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और स्थानीय पर्यावरणविदों का यह तर्क है कि इस तरह की अंधाधुंध नीलामी से न केवल जंगलों का सफाया होता है, बल्कि वहां रहने वाले आदिवासियों और स्थानीय ग्रामीणों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह मुद्दा और भी अधिक संवेदनशील हो जाता है क्योंकि यहां की राजनीति काफी हद तक आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन से जुड़ी हुई है। दीपक बैज के इस बयान और तारा कोल ब्लॉक के इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से इस बात को रेखांकित कर दिया है कि आने वाले दिनों में संसाधनों के दोहन और क्षेत्रीय विकास के मुद्दों पर छत्तीसगढ़ की सियासत का पारा और अधिक गर्म रहने वाला है।