ईरान में मची भारी कलह ट्रंप से सुलह करें या जंग? शांति वार्ता के बीच कट्टरपंथियों और सरकार में छिड़ा गृहयुद्ध जैसा माहौल
News India Live, Digital Desk: अमेरिका के साथ इस्लामाबाद में चल रही ऐतिहासिक शांति वार्ता के बीच ईरान के भीतर एक बड़ा ज्वालामुखी फट पड़ा है। खबरों के मुताबिक, तेहरान की सत्ता के गलियारों में इस वक्त भारी खींचतान मची हुई है। एक तरफ राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अरागची की 'नरमपंथी' टीम है जो प्रतिबंधों से बचने के लिए डोनाल्ड ट्रंप से हाथ मिलाना चाहती है, तो दूसरी तरफ शक्तिशाली 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) के कट्टरपंथी नेता हैं जो इस वार्ता को 'घुटने टेकना' बता रहे हैं। ईरान के भीतर मची इस कलह ने शांति की उम्मीदों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं।
IRGC का सख्त रुख: 'हम झुकेंगे नहीं, बल्कि लड़ेंगे'
इस्लामाबाद में बातचीत की मेज सजी है, लेकिन तेहरान में IRGC के शीर्ष कमांडरों ने सख्त तेवर अपना लिए हैं। कट्टरपंथियों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति के आगे झुकना ईरान की संप्रभुता का अपमान है। सूत्रों के मुताबिक, IRGC ने चेतावनी दी है कि यदि वार्ता के दौरान ईरान के मिसाइल कार्यक्रम या परमाणु शक्ति पर कोई भी समझौता हुआ, तो वे इसे मानने से इनकार कर सकते हैं। यह आंतरिक विद्रोह उस वक्त हो रहा है जब अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपने घातक विमानों और युद्धपोतों की तैनाती बढ़ा दी है।
ट्रंप की डेडलाइन ने बढ़ाई धड़कनें, क्या टूटेगा ईरान?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चिर-परिचित शैली में ईरान को अल्टीमेटम दे रखा है। ट्रंप की टीम (जेडी वेंस और जारेड कुशनर) ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस्लामाबाद वार्ता विफल रहती है, तो ईरान को ऐसे 'आर्थिक और सैन्य परिणाम' भुगतने होंगे जो उसने पहले कभी नहीं देखे। इसी डर ने ईरान की सरकार को वार्ता की टेबल पर आने को मजबूर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान इस वक्त दो पाटों के बीच फंसा है—एक तरफ ट्रंप की कड़ाई है और दूसरी तरफ अपने ही घर में कट्टरपंथियों का विद्रोह।
रसोई गैस और तेल संकट से बेहाल जनता का दबाव
ईरान के भीतर मचे इस घमासान का एक बड़ा कारण वहां की चरमराती अर्थव्यवस्था भी है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से ईरान की जनता दाने-दाने को मोहताज है और वहां ऊर्जा संकट गहराया हुआ है। पेजेशकियन सरकार जानती है कि यदि अब समझौता नहीं हुआ, तो देश में जनविद्रोह भड़क सकता है। हालांकि, सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामेनेई का मौन समर्थन फिलहाल वार्ताकारों के साथ है, लेकिन कट्टरपंथियों का दबाव किसी भी वक्त खेल बिगाड़ सकता है। दुनिया की नजरें अब इस्लामाबाद के उस बंद कमरे पर हैं जहाँ दोनों देशों का भविष्य तय हो रहा है।