The Miraculous Laxminarayan Temple of Bikaner : ग्रहण के समय भी खुले रहते हैं पट, जानें कृष्ण भगवान की अद्भुत कहानी
News India Live, Digital Desk: आपने अक्सर सुना होगा कि जब भी सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगता है, तो मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि ग्रहण के दौरान मंदिर अपवित्र हो जाते हैं या उनकी दिव्य शक्ति कम हो जाती है, इसलिए भक्तों को मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता. लेकिन हमारे भारत में कई ऐसे अनूठे मंदिर हैं, जो इन नियमों को नहीं मानते. इन्हीं में से एक है राजस्थान के बीकानेर शहर का प्रसिद्ध लक्ष्मिनारायण मंदिर (Laxminath Temple)! यह इकलौता ऐसा मंदिर है जिसके द्वार सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के समय भी खुले रहते हैं.
क्या आपने सोचा है कि आखिर इसके पीछे क्या वजह है? क्यों यह मंदिर इतने पुराने रिवाज़ को तोड़कर ग्रहण के दौरान भी अपने भक्तों के लिए खुला रहता है? तो आइए जानते हैं, इस चमत्कारी मंदिर के पीछे छिपी एक बहुत ही ख़ास पौराणिक कथा.
सूर्य-चंद्र ग्रहण में क्यों खुले रहते हैं लक्ष्मीनारायण मंदिर के द्वार?
इसके पीछे एक बहुत पुरानी और अनोखी कहानी जुड़ी है, जो भगवान कृष्ण के बचपन से संबंधित है. इस कहानी के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी बाल कृष्ण को मक्खन चोरी की आदत थी. वे गोपियों के घरों से मक्खन चुराते थे, जिससे यशोदा माँ अक्सर परेशान रहती थीं और बाल कृष्ण को चेतावनी देती रहती थीं.
एक बार, श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ मिलकर एक गोपी के घर मक्खन चुराने गए थे. जैसे ही वे मक्खन लेकर निकले, उस गोपी ने उन्हें देख लिया और पीछा करने लगी. बाल कृष्ण और उनके सखा दौड़ते हुए एक घर में घुस गए और गोपी से बचने के लिए अंदर से कुंडी लगा दी. जब गोपी उस घर के दरवाज़े पर पहुँची और उसने कुंडी खटखटाई, तो अंदर से यशोदा मैया की आवाज़ आई. मैया ने पूछा कि इतनी सुबह कौन है, तो गोपी ने शिकायत की कि कान्हा ने फिर से मक्खन चुरा लिया है.
यह सुनते ही मैया घर के दरवाज़े तक गईं, और अंदर देखा तो कृष्ण वहां खड़े मिले. माँ ने तब कृष्ण से पूछा कि क्या तुमने मक्खन चुराया? तो बाल कृष्ण ने बहुत मासूमियत से जवाब दिया कि उन्होंने कोई चोरी नहीं की है. लेकिन जब माँ ने उनसे दरवाज़े बंद करने के बारे में पूछा, तो कृष्ण ने कहा कि बाहर इतनी भयानक राक्षसी काली घटा छाई हुई थी, जो उन्हें पकड़ने आ रही थी, इसलिए उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया था. कृष्ण ने यह भी कहा कि "मैया, अगर यह राक्षसी हमें पकड़ लेती तो हम कहाँ जाते, इसलिए मैंने और मेरे सखाओं ने घर बंद कर लिया."
कहा जाता है कि उस समय अमावस्या का दिन था और आकाश में सूर्य ग्रहण लगा हुआ था. ग्रहण को ही बाल कृष्ण ने एक राक्षसी घटा के रूप में बताया था, जिससे वह और उनके मित्र डर गए थे. तभी से, इस मंदिर में ऐसी मान्यता चली आ रही है कि जब बाल कृष्ण खुद ग्रहण से डरकर घर में छुप जाते हैं, तो भक्त भला क्यों घर बंद करें? इसलिए इस मंदिर के दरवाज़े सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के दौरान कभी बंद नहीं होते और भगवान के दर्शन हर हाल में खुले रहते हैं.
मंदिर का महत्त्व और विशेषताएँ:
बीकानेर का लक्ष्मीनारायण मंदिर ना सिर्फ़ इस अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ भगवान विष्णु (नारायण) अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं. यह मंदिर अपने आप में एक पवित्र धाम है और राजस्थान की संस्कृति व आध्यात्मिकता का प्रतीक है. दूर-दूर से भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं और विशेषकर ग्रहण के समय यहाँ भीड़ बढ़ जाती है, ताकि वे भगवान की ऐसी अनूठी महिमा का अनुभव कर सकें.
यह कहानी हमें सिर्फ़ एक अनोखी परंपरा के बारे में नहीं बताती, बल्कि यह भगवान के बाल रूप की मासूमियत और एक गहरी धार्मिक भावना को भी दर्शाती है, जहाँ आस्था और लोक कथाएँ एक साथ जीवित रहती हैं.