लखनऊ का दिल: यह सिर्फ चिड़ियाघर नहीं, 71 एकड़ में फैला एक हरा-भरा खजाना है
लखनऊ शहर की भागदौड़ और शोर-शराबे के बीच एक ऐसी हरी-भरी दुनिया बसती है, जो सुकून और रोमांच का एक बेहतरीन ठिकाना है. यह है लखनऊ का चिड़ियाघर, जिसे अब नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान के नाम से जाना जाता है. 71 एकड़ के विशाल इलाके में फैला यह चिड़ियाघर सिर्फ जानवरों का घर नहीं, बल्कि लखनऊ के इतिहास का एक अहम हिस्सा भी है.
जब एक राजकुमार के लिए बना यह चिड़ियाघर
इसकी कहानी 1921 में शुरू होती है. उस समय वेल्स के राजकुमार भारत दौरे पर आए थे और उन्हीं की यात्रा को यादगार बनाने के लिए लखनऊ में इस चिड़ियाघर की नींव रखी गई थी. यही वजह है कि इसका पुराना नाम 'द प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन्स' था. बाद में, इसका नाम बदलकर अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के नाम पर रख दिया गया, ताकि यह जगह लखनऊ की अपनी तहजीब और विरासत से जुड़ सके.
मिलिए जंगल के राजाओं और रंग-बिरंगे परिंदों से
जैसे ही आप अंदर कदम रखते हैं, एक अलग ही दुनिया आपका स्वागत करती है. यहां आप जंगल के राजा, रॉयल बंगाल टाइगर की दहाड़ सुन सकते हैं और सफ़ेद बाघ (व्हाइट टाइगर) की शाही चाल देख सकते हैं. इनके अलावा, यहां शेर, भेड़िया, और कई दूसरे जानवर अपने कुदरती माहौल में मस्ती करते हुए नज़र आते हैं.
यहां परिंदों की दुनिया भी उतनी ही रंगीन है. सुनहरे और चांदी जैसे खूबसूरत तीतर (Golden and Silver Pheasant) से लेकर विशालकाय हॉर्नबिल तक, यहां पक्षियों का एक ऐसा संग्रह है जो आपको हैरान कर देगा.
यह चिड़ियाघर वन्य जीव प्रेमियों के लिए तो जन्नत है ही, साथ ही यह परिवार और दोस्तों के साथ एक बेहतरीन दिन गुजारने की जगह भी है. तो अगली बार जब आप लखनऊ में हों, तो इस हरे-भरे खजाने को देखने के लिए थोड़ा वक्त ज़रूर निकालिएगा. यकीनन, यहां जानवरों की दुनिया में खोकर आप अपनी सारी थकान भूल जाएंगे.