पंजाब का वो कड़वा सच? दलजीत दोसांझ की फिल्म Punjab 95 को मिला अब पूर्व जज का साथ

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News India Live, Digital Desk : जब भी सिनेमा कुछ ऐसा दिखाने की कोशिश करता है जो हकीकत के बहुत करीब हो, तो अक्सर विवाद खड़े हो जाते हैं। पिछले काफी समय से अभिनेता दलजीत दोसांझ की फिल्म 'पंजाब 95' (Punjab 95) सुर्ख़ियों में है, लेकिन फिल्मों की चकाचौंध के लिए नहीं, बल्कि सेंसर बोर्ड (CBFC) की कैंची की वजह से। अब इस पूरे विवाद में एक ऐसा चेहरा जुड़ गया है, जिसकी बातों ने सरकार और सेंसर बोर्ड दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

दरअसल, रिटायर्ड जस्टिस रंजीत सिंह ने अब इस मामले पर चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा है कि इस फिल्म को बिना किसी कट के रिलीज किया जाना चाहिए। उनकी इस मांग ने सोशल मीडिया से लेकर दिल्ली और पंजाब के गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।

मामला क्या है?
यह फिल्म मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा (Jaswant Singh Khalra) के जीवन पर आधारित है। जिन्होंने पंजाब के मुश्किल दौर में गुमनाम हत्याओं के सच को उजागर किया था। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को लेकर शुरू से ही कड़ा रुख अपनाया है। पहले तो फिल्म को 'अनलॉफुल एक्टिविटीज़' का लेबल मिला और फिर खबरें आईं कि इसमें 80 से ज्यादा 'कट' (Cuts) लगाने का सुझाव दिया गया है। अब सवाल यह है कि अगर फिल्म का रूह ही काट दी जाए, तो उसकी कहानी लोगों तक कैसे पहुँचेगी?

जस्टिस रंजीत सिंह की राय
जस्टिस रंजीत सिंह, जिन्होंने खुद पंजाब से जुड़ी कई अहम जांचें की हैं, उनका मानना है कि इतिहास जैसा था उसे वैसा ही दिखाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और ऐतिहासिक सच को दबाना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। उनकी नजर में, अगर सीबीएफसी फिल्म के अहम हिस्सों को हटा देती है, तो फिल्म की गंभीरता खत्म हो जाएगी और जसवंत सिंह खालरा जैसे व्यक्तित्व का बलिदान कमतर दिखेगा।

सिर्फ फिल्म नहीं, जज्बात का सवाल
देखा जाए तो 'पंजाब 95' केवल दलजीत दोसांझ की एक फिल्म भर नहीं है। पंजाब की जनता और इतिहास प्रेमियों के लिए यह उस सच्चाई को जानने का जरिया है जिसे लोग अक्सर पन्नों से मिटा देना चाहते हैं। दलजीत, जो हमेशा अपने अभिनय से रोंगटे खड़े कर देते हैं, उन्होंने इस फिल्म के लिए कड़ी मेहनत की है। अब प्रशंसकों का कहना है कि जब फिल्म का आधार ही सच पर टिका है, तो फिर इसमें काट-छाँट कैसी?

भविष्य क्या होगा?
जस्टिस रंजीत सिंह की अपील के बाद अब गेंद सेंसर बोर्ड के पाले में है। क्या वह किसी बड़ी हस्ती के हस्तक्षेप के बाद अपना मन बदलेगी? या फिर 'पंजाब 95' का असली अवतार हमें कभी देखने को नहीं मिलेगा?

हकीकत ये है कि फिल्में केवल मनोरंजन नहीं होतीं, वो समाज का आइना होती हैं। और जब कोई उस आइने को साफ़ करने की कोशिश करे, तो उसका साथ देना ही सबसे बड़ी इंसानियत है। दलजीत दोसांझ की ये फिल्म आज इसी दोराहे पर खड़ी है सच्चाई और पाबंदी के बीच।