सेक्शन 375 के पीछे की कड़वी कहानी जब डायरेक्टर को झेलनी पड़ी एक सुपरस्टार की मनमर्जी

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News India Live, Digital Desk : साल 2025 अब खत्म हो रहा है, लेकिन बॉलीवुड के गलियारों में कुछ पुराने जख्म फिर से ताज़ा हो गए हैं। 'सेक्शन 375' एक ऐसी फिल्म थी जिसे आज भी हिंदी सिनेमा की बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों में गिना जाता है। अक्षय खन्ना की दमदार एक्टिंग ने इसे ऊंचाई दी थी, लेकिन इस फिल्म की असल 'कहानी' इसके पीछे काम करने वाले मनीष गुप्ता के साथ जो हुआ, उसमें छिपी है।

मनीष गुप्ता, जिन्होंने 'सरकार' जैसी बेहतरीन फिल्म लिखी थी, ने एक इंटरव्यू में अपनी आपबीती सुनाई है जो फिल्म मेकिंग की काली सच्चाई को उजागर करती है।

शूटिंग 6 महीने के लिए रोक दी?

मनीष गुप्ता के अनुसार, फिल्म की शुरुआत सब कुछ सही होने के वादे के साथ हुई थी, लेकिन जल्द ही अक्षय खन्ना के व्यवहार ने काम मुश्किल कर दिया। मनीष का आरोप है कि अक्षय ने कॉन्ट्रैक्ट (Contract) का उल्लंघन किया और करीब 6 महीनों तक फिल्म की शूटिंग रुकवा दी। फिल्म बनाना एक लेखक और डायरेक्टर के लिए बच्चे को पालने जैसा होता है, और जब काम इस तरह अटक जाए, तो बजट से लेकर मानसिक शांति तक सब कुछ दांव पर लग जाता है।

'मेरा बच्चा, नाम किसी और का'

सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब मनीष ने बताया कि अक्षय खन्ना की कथित 'दखलंदाजी' इतनी बढ़ गई थी कि अंततः उन्हें उस फिल्म से ही बाहर कर दिया गया। मनीष ही वह शख्स थे जिन्होंने सालों तक रिसर्च कर 'सेक्शन 375' की स्क्रिप्ट लिखी थी। लेकिन जब फिल्म फ्लोर पर आई, तो निर्देशक के तौर पर अजय बहल को लाया गया और मनीष का क्रेडिट भी बहुत सीमित कर दिया गया।

ईगो क्लैश या बॉलीवुड की पुरानी बीमारी?

बॉलीवुड में यह अक्सर देखा गया है कि जब कोई स्थापित अभिनेता किसी फिल्म से जुड़ता है, तो वह केवल एक्टिंग तक सीमित नहीं रहता। कभी स्क्रिप्ट में बदलाव, तो कभी डायरेक्टर को बदलने की सलाह—ये बातें किसी फिल्म का ढांचा खराब कर देती हैं। मनीष गुप्ता का दावा है कि उनकी सिर्फ़ ये 'गलती' थी कि वे अक्षय खन्ना की हर बेतुकी मांग के आगे झुके नहीं, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

फिल्म तो हिट हुई, लेकिन कलाकार का क्या?

'सेक्शन 375' को क्रिटिक्स और दर्शकों की तरफ से खूब सराहना मिली, लेकिन इस सफलता के पीछे मनीष गुप्ता के उन 6 महीनों का मानसिक संताप छुपा है। एक क्रिएटिव इंसान के लिए यह सबसे बड़ा दुख होता है कि उसका काम सराहा तो जाए, लेकिन उसे वो हक न मिले जिसका वह हकदार था।