गरुड़ पुराण का सबसे बड़ा रहस्य नरक के द्वार पर बहती है डरावनी वैतरणी नदी, जानें किन आत्माओं को मिलती है प्रताड़ना
News India Live, Digital Desk: हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद के सफर का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें सबसे भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण 'वैतरणी नदी' का है। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद यमलोक के रास्ते में पड़ने वाली यह नदी पापियों के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। मान्यता है कि जीवित रहते हुए किए गए कर्म ही यह तय करते हैं कि आत्मा इस नदी को आसानी से पार करेगी या इसके खौफनाक मंजर में फंसेगी।
वैतरणी नदी: मांस, रक्त और खौफनाक जीवों का बसेरा
पुराणों के अनुसार, वैतरणी नदी कोई सामान्य जलधारा नहीं है। यह नदी सौ योजन चौड़ी है और इसमें पानी की जगह रक्त, पीप, मांस और कीचड़ भरा होता है। इसके तट अत्यंत दुर्गंधयुक्त होते हैं। नदी के भीतर भयानक मगरमच्छ, नुकीली चोंच वाले पक्षी और जहरीले सांप होते हैं, जो पापी आत्माओं को नोचते हैं। कहा जाता है कि जैसे ही कोई पापी आत्मा इसके पास पहुंचती है, नदी का पानी खौलने लगता है, जिससे आत्मा की तड़प कई गुना बढ़ जाती है।
कौन सी आत्माएं आसानी से पार कर लेती हैं यह नदी?
गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने गरुड़ जी को बताया है कि हर आत्मा को वैतरणी का सामना नहीं करना पड़ता। जिन लोगों ने अपने जीवन में धर्म, दान और परोपकार किया होता है, उनके लिए वैतरणी नदी शांत हो जाती है। विशेष रूप से वे लोग जिन्होंने:
गौ सेवा की हो और गौ-दान किया हो।
गरीबों को अन्न और जल का दान दिया हो।
सत्य के मार्ग का अनुसरण किया हो।
अपने माता-पिता और गुरुओं का सम्मान किया हो। ऐसी पुण्य आत्माओं के लिए यमदूत एक दिव्य नाव लेकर आते हैं, जिससे वे बिना कष्ट के नदी पार कर जाते हैं।
वैतरणी के कष्टों से बचने के उपाय
शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने अनजाने में पाप किए हैं, तो वह जीवित रहते हुए कुछ विशेष कार्यों से वैतरणी के भय से मुक्ति पा सकता है। वैशाख मास या महत्वपूर्ण तिथियों पर काले तिल का दान, जूते-चप्पल का दान और प्यासों को पानी पिलाना अत्यंत लाभकारी माना गया है। गरुड़ पुराण का सार यही है कि व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के उपरांत केवल 'कर्म' ही साथ जाते हैं और वही तय करते हैं कि परलोक का सफर कष्टकारी होगा या सुखद।