घमंड और विनाश की वो अनसुनी गाथा ,जब भगवान परशुराम को सहस्रबाहु की हज़ार भुजाएँ काटनी पड़ीं
News India Live, Digital Desk: अक्सर जब भी हम 'अर्जुन' नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में गांडीव धारी अर्जुन और भगवान कृष्ण की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आपको पता है कि इतिहास में एक और 'अर्जुन' हुआ था जो पाण्डव अर्जुन से भी कहीं ज्यादा शक्तिशाली माना जाता था? इसे दुनिया 'कार्त्तवीर्य अर्जुन' या 'सहस्रबाहु' के नाम से जानती है।
आज की कहानी इसी महान योद्धा के उत्थान, उसकी अद्भुत शक्ति और फिर एक छोटी सी भूल की वजह से हुए उसके विनाश के बारे में है। चलिए, समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाते हैं।
हज़ार भुजाओं का रहस्य
सहस्रबाहु हैहय वंश का एक बहुत प्रतापी राजा था। उसने भगवान दत्तात्रेय की घोर तपस्या की और उनसे एक अजीब वरदान माँगा—उसे एक हजार भुजाएँ (हाथ) और अजेय होने की शक्ति मिल गई। अब आप सोच कर देखिए, जिस इंसान के पास हजार हाथ हों, उसका बल कितना होगा! इसी वजह से उसका नाम 'सहस्रबाहु' पड़ा।
जब रावण को होना पड़ा शर्मिंदा!
रावण के बारे में हम सब जानते हैं कि वह कितना अहंकारी था और उसे हराना नामुमकिन जैसा था। लेकिन सहस्रबाहु ने उसे भी धूल चटा दी थी। एक पौराणिक कथा के मुताबिक, जब रावण ने सहस्रबाहु को युद्ध के लिए ललकारा, तो सहस्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा नदी के पानी को रोक दिया और पूरी की पूरी सेना को जलमग्न कर दिया। यही नहीं, उसने रावण को पकड़कर एक छोटे जानवर की तरह जेल में डाल दिया था। बाद में रावण के दादा पुलस्त्य ऋषि की सिफारिश पर उसे छोड़ गया।
एक गाय और परशुराम का क्रोध
कहते हैं कि 'विनाश काले विपरीत बुद्धि'। सहस्रबाहु को अपनी शक्ति पर इतना घमंड हो गया कि उसने ब्राह्मणों और ऋषियों का अपमान करना शुरू कर दिया। एक बार वह अपनी विशाल सेना के साथ जमदग्नि ऋषि (भगवान परशुराम के पिता) के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने कामधेनु गाय की मदद से पूरी सेना का शाही सत्कार किया।
यह देख सहस्रबाहु के मन में लालच आ गया। उसे लगा कि यह दिव्य गाय तो एक राजा के महल में होनी चाहिए, न कि किसी कुटिया में। उसने बलपूर्वक वह गाय चुरा ली। जब परशुराम को यह बात पता चली, तो उनके क्रोध की सीमा न रही।
अंत की कहानी: फरसा बनाम हज़ार हाथ
परशुराम अपना फरसा (कुल्हाड़ी) उठाकर सहस्रबाहु के महल जा पहुँचे। वहां एक भीषण युद्ध हुआ। सहस्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से हमला किया, लेकिन परशुराम के दिव्य फरसे के सामने उसकी एक न चली। एक-एक करके परशुराम ने उसकी हजार भुजाएं काट दीं और अंत में उसका वध कर दिया।
सीख जो यह कहानी देती है
कार्त्तवीर्य अर्जुन या सहस्रबाहु कोई बुरा व्यक्ति नहीं था, वह एक न्यायप्रिय राजा था। लेकिन जब सत्ता और शक्ति उसके सिर चढ़कर बोलने लगी, तो उसने धर्म का रास्ता छोड़ दिया। उसकी यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अगर आप अपने पद और ताकत का दुरुपयोग करते हैं, तो विनाश निश्चित है।