महाशक्ति अमेरिका की मदद की गुहार, छोटे से देश ने दिखाया ठेंगा मदद के बदले रख दी ऐसी अजीब शर्त

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News India Live, Digital Desk: ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिका खुद को कूटनीतिक मोर्चे पर अकेला महसूस कर रहा है। ताजा खबरों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र के एक छोटे लेकिन सामरिक रूप से महत्वपूर्ण देश ने अमेरिका को उसकी मदद की अपील पर न केवल ताना मारा है, बल्कि सहायता के बदले एक ऐसी शर्त रख दी है जिसने वॉशिंगटन को सोच में डाल दिया है। यह घटना दर्शाती है कि अब छोटे देश भी महाशक्तियों के दबाव में आने के बजाय अपनी शर्तों पर राजनीति कर रहे हैं।

"हमारा इस्तेमाल बंद करो": छोटे देश का अमेरिका पर सीधा हमला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब अमेरिकी दूतों ने इस अनाम (लेकिन रणनीतिक) देश से अपनी मिसाइल डिफेंस सिस्टम और सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति मांगी, तो जवाब काफी तीखा था। उस देश के नेतृत्व ने कहा, "अमेरिका केवल संकट के समय हमें याद करता है, जबकि बाकी समय हमारी चिंताओं को नजरअंदाज किया जाता है।" इस बयान को अंतरराष्ट्रीय हलकों में अमेरिका की गिरती साख के रूप में देखा जा रहा है।

मदद के बदले 'सुरक्षा गारंटी' की शर्त

इस छोटे देश ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका को अपने अड्डों का इस्तेमाल तभी करने देगा, जब अमेरिका लिखित में यह गारंटी दे कि ईरान के किसी भी जवाबी हमले की स्थिति में वह उस देश की पूरी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाएगा। साथ ही, आर्थिक मदद और अत्याधुनिक सैन्य तकनीक के हस्तांतरण की भी मांग की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शर्त अमेरिका के लिए 'निगलें तो जहर, उगलें तो घाव' जैसी स्थिति बन गई है।

ईरान का खौफ या कूटनीतिक अवसर?

ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि जो भी देश अमेरिका को अपने अड्डों का उपयोग करने देगा, वह ईरान की मिसाइलों का सीधा निशाना बनेगा। इसी डर और 'टैंकर वॉर' के प्रभाव के कारण कई देश अब अमेरिका के साथ खड़े होने से कतरा रहे हैं। वे इस स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिका से अपनी पुरानी मांगें मनवाने की कोशिश कर रहे हैं।

मध्य पूर्व में बदल रहे हैं समीकरण

यह ताना केवल एक देश का नहीं, बल्कि उन कई छोटे राष्ट्रों की आवाज है जो अब महाशक्तियों की लड़ाई में बलि का बकरा नहीं बनना चाहते। अमेरिका के लिए अब चुनौती केवल ईरान को हराना नहीं, बल्कि अपने उन पुराने दोस्तों का भरोसा जीतना भी है जो अब उसकी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं।