Strategic Autonomy : भारत को समझदारी से संभालो, अमेरिकी एक्सपर्ट ने ही अपनी सरकार को क्यों दी ये नसीहत?
News India Live, Digital Desk: एक तरफ अमेरिका भारत को अपना ख़ास रणनीतिक साझेदार बताता है, दूसरी तरफ उसी पर व्यापार और रूस से संबंधों को लेकर दबाव भी बनाता है. भारत-अमेरिका रिश्तों पर गहरी नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह दबाव की रणनीति "बहुत ज़्यादा समझदारी वाली नहीं है" और इससे दोनों देशों के संबंधों को कोई फायदा नहीं होता
"सिर्फ भारत को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?"
वॉशिंगटन के जाने-माने थिंक टैंक 'सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज' (CSIS) के विशेषज्ञ रिचर्ड रोसो का कहना है कि जिस तरह से ट्रंप प्रशासन हाल के हफ्तों में सिर्फ भारत को ही निशाना बना रहा है, वह बहुत अजीब है.व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ सलाहकार ने हाल ही में कहा था कि "भारत को हमारे साथ रहने की ज़रूरत है, रूस के साथ नहीं." रोसो के मुताबिक, इस तरह के बयान और सिर्फ भारत को अलग-थलग करने की कोशिशें रिश्तों के लिए अच्छी नहीं हैं.
दबाव की रणनीति के पीछे की कहानी
अमेरिका की इस नाराज़गी और दबाव के पीछे कुछ बड़ी वजहें हैं:
- रूस से भारत की दोस्ती: अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से अपनी दोस्ती, खासकर रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग कम करे.भारत का रूस से तेल खरीदना अमेरिका को पसंद नहीं आ रहा.
- व्यापारिक मुद्दे: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि भारत व्यापार में गलत नीतियां अपनाता है और अमेरिकी सामानों पर भारी टैक्स लगाता है. इसी को लेकर उन्होंने भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) भी लगा दिया.
- चीन का एंगल: अमेरिका चाहता है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत पूरी तरह उसके साथ खड़ा हो
तो फिर यह रणनीति गलत क्यों है?
विशेषज्ञों का मानना है कि दबाव डालने से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है. अमेरिका यह समझने में गलती कर रहा है कि भारत एक बड़ा और स्वतंत्र देश है, जो अपनी विदेश नीति किसी के दबाव में तय नहीं करता. प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर जॉन मियर्सहाइमर ने तो ट्रंप प्रशासन की भारत नीति को "बहुत बड़ी गलती" तक कह दिया हैउनका मानना है कि इस तरह के दबाव से भारत अमेरिका से दूर होकर रूस और चीन के और करीब जा सकता है, जो अमेरिका के अपने ही रणनीतिक हितों के खिलाफ होगा.
भारत का रुख क्या है?
भारत ने हमेशा से अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) की नीति पर ज़ोर दिया है. इसका मतलब है कि भारत किसी एक देश के पाले में खड़े होने की बजाय अपने हितों के हिसाब से सभी देशों के साथ संबंध रखता है. भारत यह साफ़ कर चुका है कि वह रूस के साथ अपने पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को किसी के कहने पर नहीं तोड़ेगा. वहीं, व्यापार के मुद्दों पर भारत बातचीत के ज़रिए हल निकालने के पक्ष में है, न कि किसी धमकी के आगे झुकने के.
कुल मिलाकर, एक्सपर्ट्स का यही मानना है कि अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत जैसे बड़े और मज़बूत लोकतंत्र पर दबाव की रणनीति काम नहीं करेगी. दोनों देशों के रिश्ते आपसी सम्मान और साझा हितों पर ही आगे बढ़ सकते हैं, किसी एक की शर्तों पर नहीं.