Story of Shukracharya : जब एक गुरु ने अपने ही शिष्य के लिए दे दी प्राणों की आहुति ,पढ़िए गुरु-शिष्य परंपरा की सबसे अद्भुत कथा
News India Live, Digital Desk: गुरु और शिष्य का रिश्ता दुनिया के सबसे पवित्र रिश्तों में से एक माना जाता है। गुरु अपने शिष्य को सिर्फ ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि उसे जीवन जीने की कला भी सिखाता है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी कहानी सुनी है जहां एक गुरु ने अपने शिष्य के प्राण बचाने के लिए खुद के प्राणों की आहुति दे दी हो? यह कहानी है दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनके शिष्य कच की, जो गुरु-शिष्य परंपरा की एक मिसाल है।
कहानी की शुरुआत: देव-असुर संग्राम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच सदियों से युद्ध चला आ रहा था। इस युद्ध में असुरों का पलड़ा इसलिए भारी था क्योंकि उनके गुरु शुक्राचार्य के पास एक ऐसी चमत्कारी विद्या थी, जो देवताओं के पास नहीं थी - मृत संजीवनी विद्या। यह वो विद्या थी जिससे मरे हुए व्यक्ति को भी फिर से जीवित किया जा सकता था।
युद्ध में जब भी कोई असुर मारा जाता, गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से उसे तुरंत जिंदा कर देते, जबकि मारे गए देवता हमेशा के लिए मृत्यु को प्राप्त हो जाते। इस वजह से देवता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे।
देवताओं की गुप्त योजना
इस संकट से उबरने के लिए देवताओं ने एक योजना बनाई। उन्होंने देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच को एक गुप्त मिशन पर शुक्राचार्य के आश्रम में भेजने का फैसला किया। कच का मिशन था, शुक्राचार्य का शिष्य बनकर उनकी सेवा करना, उनका दिल जीतना और किसी भी तरह उनसे संजीवनी विद्या का रहस्य जानना।
कच शुक्राचार्य के आश्रम पहुंचे और उनके शिष्य बन गए। अपनी सेवा, विनम्रता और लगन से उन्होंने जल्द ही गुरु शुक्राचार्य का दिल जीत लिया। इसी दौरान, शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी, कच के गुणों पर मोहित हो गई और मन ही मन उनसे प्रेम करने लगी।
असुरों का षड्यंत्र और कच की बार-बार मृत्यु
जल्द ही असुरों को पता चल गया कि कच कोई साधारण शिष्य नहीं, बल्कि देवताओं का भेजा हुआ एक जासूस है जो उनकी सबसे बड़ी ताकत यानी संजीवनी विद्या को चुराने आया है। उन्होंने कच को रास्ते से हटाने का फैसला किया।
असुरों ने कच को कई बार मारने की कोशिश की। एक बार उन्होंने कच को मारकर उसके शरीर के टुकड़े कर भेड़ियों को खिला दिए। जब देवयानी ने अपने पिता से कच को वापस लाने की विनती की, तो शुक्राचार्य ने अपनी विद्या से उसे फिर से जीवित कर दिया। दूसरी बार असुरों ने कच को मारकर उसके शरीर को जला दिया और राख को समुद्र में मिला दिया। लेकिन देवयानी के आंसुओं के आगे विवश होकर शुक्राचार्य ने उसे फिर से जिंदा कर दिया।
जब गुरु ने पिया शिष्य की राख मिला मदिरा
दो बार असफल होने के बाद, असुरों ने एक ऐसी खौफनाक योजना बनाई जिससे शुक्राचार्य भी अपने शिष्य को न बचा सकें। उन्होंने कच को फिर से मारा, उसके शरीर को जलाकर राख बना दिया और उस राख को मदिरा (शराब) में मिलाकर धोखे से गुरु शुक्राचार्य को ही पिला दिया।
जब कच आश्रम नहीं लौटा तो देवयानी फिर से अपने पिता के पास पहुंची। शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने देवयानी से कहा, "पुत्री, इस बार मैं तुम्हारे कच को वापस नहीं ला सकता, क्योंकि वह मेरे उदर (पेट) में है। अगर मैंने उसे जीवित किया तो मेरा शरीर फट जाएगा और मेरी मृत्यु निश्चित है।"
गुरु का अंतिम बलिदान और शिष्य की गुरु-दक्षिणा
यह सुनकर देवयानी बिलख-बिलख कर रोने लगी। वह अपने पिता और अपने प्रेम, दोनों में से किसी को भी खोना नहीं चाहती थी। एक तरफ पुत्री का प्रेम था और दूसरी तरफ शिष्य के प्राण। इस धर्मसंकट में गुरु शुक्राचार्य ने वह निर्णय लिया जिसने इतिहास रच दिया।
उन्होंने अपने पेट में मौजूद कच से कहा, "वत्स कच, तुम्हारी गुरुभक्ति सफल हुई। मैं तुम्हें यहीं अपने उदर में संजीवनी विद्या का ज्ञान देता हूं। मैं अपनी विद्या से तुम्हें जीवित करूंगा, जिससे मेरी मृत्यु हो जाएगी। लेकिन मेरे मरने के बाद तुम संजीवनी विद्या का प्रयोग करके मुझे फिर से जीवित कर देना। यही तुम्हारी गुरु-दक्षिणा होगी।"
शुक्राचार्य ने मंत्र का प्रयोग किया। उनका पेट चीरकर कच बाहर आए, जिससे गुरु की मृत्यु हो गई। लेकिन वचन के अनुसार, कच ने तुरंत संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और अपने गुरु शुक्राचार्य को फिर से जीवित कर दिया।
इस प्रकार, एक गुरु ने शिष्य के लिए अपने प्राण दे दिए और शिष्य ने गुरु-दक्षिणा के रूप में अपने गुरु को ही जीवनदान दे दिया। इस घटना के बाद गुरु शुक्राचार्य इतने आहत हुए कि उन्होंने उसी दिन यह विधान बनाया कि आज के बाद कोई भी ब्राह्मण मदिरा का सेवन नहीं करेगा, क्योंकि मदिरा विवेक को नष्ट कर देती है।