बीमार S.D. Burman का वो गाना जिसे गुरु दत्त ने बताया बेकार, देव आनंद ने उसी से रच दिया इतिहास

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News India Live, Digital Desk : बॉलीवुड के गलियारों में दोस्ती की जितनी मिसालें दी जाती हैं, उतने ही किस्से अनबन और गलतफहमियों के भी मशहूर हैं। आज हम आपको हिंदी सिनेमा के तीन दिग्गजों—म्यूजिक के जादूगर एस.डी. बर्मन (SD Burman), महान फिल्मकार गुरु दत्त (Guru Dutt) और सदाबहार हीरो देव आनंद (Dev Anand) से जुड़ा एक ऐसा किस्सा सुनाने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आपको यकीन हो जाएगा कि 'हीरे की परख सिर्फ जौहरी को होती है'।

अक्सर हम फिल्मों में हिट गाने सुनते हैं और झूमते हैं, लेकिन कई बार उन गानों के पीछे एक गहरा दर्द और "नकारे जाने" की कहानी छिपी होती है।

अस्पताल, बीमारी और गुरु दत्त का फैसला
यह बात 60 के दशक की शुरुआत की है। एस.डी. बर्मन और गुरु दत्त की जोड़ी उस समय की सबसे सुपरहिट जोड़ी मानी जाती थी। दोनों 'प्यासा' और 'कागज के फूल' जैसी फिल्मों से इतिहास रच चुके थे। दोनों मिलकर एक नई फिल्म 'बहारें फिर भी आएंगी' पर काम कर रहे थे।

लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। काम के दौरान ही एस.डी. बर्मन को दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ गया। उनकी तबीयत काफी खराब हो गई। बर्मन दा अस्पताल में थे और रिकवरी कर रहे थे। इधर गुरु दत्त अपनी फिल्म को लेकर बहुत गंभीर थे। जब उन्होंने बर्मन दा की उस वक़्त बनाई हुई धुनें सुनीं, तो उन्हें लगा कि बीमारी की वजह से बर्मन दा का काम 'कमजोर' हो गया है। उन्हें लगा कि गानों में वो पुरानी वाली बात नहीं रही।

जल्दबाजी कहें या गलतफहमी, गुरु दत्त ने एक कड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी फिल्म से अपने पुराने साथी एस.डी. बर्मन को हटा दिया और उनकी जगह दूसरे संगीतकार (ओ.पी. नैय्यर) को साइन कर लिया।

बर्मन दा का टूटा दिल और देव आनंद की एंट्री
यह खबर जब बर्मन दा को मिली, तो उन्हें गहरा सदमा लगा। जिस दोस्त के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी का बेहतरीन संगीत दिया, उसने उनके बुरे वक्त में उन पर भरोसा नहीं किया? वो काफी निराश हो गए थे। लेकिन कहते हैं न, जब एक दरवाजा बंद होता है, तो दूसरा खुल जाता है।

उस वक्त देव आनंद अपनी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म 'ज्वेल थीफ' (Jewel Thief) बना रहे थे। जब उन्हें पता चला कि बर्मन दा के साथ ऐसा हुआ है, तो वो उनके पास पहुंचे। बर्मन दा ने वो 'ठुकराई हुई धुन' देव साहब को सुनाई।

देव आनंद ने धुन सुनी और मुस्कुराए। उन्होंने तुरंत कहा, "दादा, यह गाना तो मेरी फिल्म में ही आएगा!"

कौन सा था वो गाना?
जिस धुन को गुरु दत्त ने 'कमजोर' समझकर रिजेक्ट कर दिया था, वह कोई और नहीं बल्कि सदाबहार गाना "ये दिल ना होता बेचारा" (Yeh Dil Na Hota Bechara) था।

जब 1967 में 'ज्वेल थीफ' रिलीज हुई, तो यह गाना ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। किशोर कुमार की आवाज और स्क्रीन पर देव आनंद का वो बेफिक्र अंदाज आज भी लोगों के दिलों में बसता है। यह गाना आज क्लासिक माना जाता है। बर्मन दा ने साबित कर दिया कि शेर बूढ़ा जरूर हो सकता है, लेकिन शिकार करना नहीं भूलता।

यह किस्सा हमें यही सिखाता है कि कभी-कभी किसी का "नकारना" हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी "सफलता" बन जाता है। अफ़सोस, गुरु दत्त इस कामयाबी को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका वह रिजेक्शन देव आनंद के लिए एक यादगार तोहफा बन गया