BREAKING:
March 13 2026 09:26 am

वो मलबे के नीचे से रोती रही, पर उसे छूने की इजाज़त किसी मर्द को नहीं थी...

Post

जब कुदरत कहर बरपाती है, तो वह धर्म या लिंग देखकर जान नहीं लेती। लेकिन जब इंसानियत पर कट्टरता हावी हो जाए, तो भूकंप से भी ज़्यादा खतरनाक तबाही होती है। अफगानिस्तान में हाल ही में आए विनाशकारी भूकंप के बाद एक ऐसी सच्चाई सामने आई है, जिसे सुनकर किसी भी इंसान की रूह कांप जाएगी।

मलबे के ढेर में दबी हज़ारों जिंदगियों के बीच, कई औरतें सिर्फ इसलिए जिंदा दफन हो गईं, क्योंकि तालिबान के क्रूर नियमों ने किसी भी गैर-मर्द को उन्हें छूने या बचाने की इजाज़त नहीं दी।

जब ज़िंदगी से बड़ा हो गया 'पर्दा' का नियम

भूकंप के बाद जब चारों तरफ चीख-पुकार मची थी, तो पुरुष बचावकर्मी (Male Rescuers) मलबे के नीचे दबे लोगों को बाहर निकाल रहे थे। कई जगहों से दबी हुई औरतों की मदद के लिए चीखें और रोने की आवाजें आ रही थीं। लेकिन तालिबान के लड़ाकों ने उन बचावकर्ताओं को यह कहकर रोक दिया कि वे किसी भी 'अजनबी' महिला को हाथ नहीं लगा सकते।

सोचिए उस बेबसी का आलम... एक तरफ मलबे में दबी एक औरत साँसों के लिए लड़ रही है, और दूसरी तरफ, चंद फुट की दूरी पर खड़े पुरुष उसे सिर्फ इसलिए नहीं बचा पा रहे क्योंकि एक कट्टर कानून उनके आड़े आ रहा है। वे मदद के लिए चीखती रहीं, और पुरुष बचावकर्मी सिर्फ़ बेबसी से सुनते रहे, जब तक कि उनकी आवाजें हमेशा के लिए शांत नहीं हो गईं।

ज़िंदा तो दूर, मुर्दों को छूना भी था गुनाह

इंसानियत इस कदर मर चुकी थी कि ज़िंदा तो दूर, मरने के बाद भी उनके शवों को छूने की इजाज़त किसी गैर-मर्द को नहीं थी। महिलाओं के शव कई दिनों तक मलबे में ही पड़े रहे, क्योंकि उन्हें बाहर निकालने के लिए कोई महिला बचावकर्मी मौजूद नहीं थी।

तालिबान के इस अमानवीय और बेतुके कानून के अनुसार, कोई भी महिला किसी ऐसे पुरुष के सामने नहीं आ सकती या उसे नहीं छू सकती, जो उसका करीबी रिश्तेदार (महरम) न हो। इस एक नियम ने भूकंप से कहीं ज़्यादा जानें ले लीं।

यह घटना सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह एक विचारधारा द्वारा की गई सामूहिक हत्या है। यह हमें दिखाती है कि जब कट्टरता हावी होती है, तो ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं रह जाती। अफगानिस्तान की ये औरतें भूकंप से नहीं मरीं, वे तालिबान की उस सोच से मारी गईं, जिसके लिए एक औरत की ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती उसका 'पर्दा' है, भले ही वह कफन का ही क्यों न हो।