Sankashti Chaturthi Feb 2026 : फरवरी में कब है संकष्टी चतुर्थी? नोट करें सही तारीख, चंद्रोदय का समय और द्विजप्रिय गणेश पूजा विधि
News India Live, Digital Desk: हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'संकष्टी चतुर्थी' मनाई जाती है। माघ मास की समाप्ति के बाद फाल्गुन मास की शुरुआत में आने वाली चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के 32 रूपों में से उनके 'द्विजप्रिय' स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस स्वरूप की आराधना से शिक्षा, धन और लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि और मुहूर्त (Tithi & Muhurat)
साल 2026 के फरवरी महीने में चतुर्थी तिथि को लेकर जो भ्रम है, उसे दूर करते हुए पंचांग की गणना इस प्रकार है:
चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 4 फरवरी 2026, बुधवार को रात 08:35 बजे से।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 5 फरवरी 2026, गुरुवार को शाम 06:12 बजे तक।
व्रत की तारीख: 5 फरवरी 2026 (गुरुवार) को उदयातिथि के अनुसार व्रत रखा जाएगा। विशेष नोट: संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही संपन्न होता है, इसलिए चंद्रोदय का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चंद्रोदय का समय (Moonrise Timing)
5 फरवरी 2026 को देश के प्रमुख शहरों में चंद्रोदय का संभावित समय:
दिल्ली: रात 08:58 बजे
मुंबई: रात 09:24 बजे
लखनऊ: रात 08:44 बजे
जयपुर: रात 09:05 बजे
पूजा विधि और महत्व (Puja Vidhi)
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के चार सिर और चार भुजाओं वाले स्वरूप का ध्यान किया जाता है।
प्रातः काल: स्नान के बाद पीले या लाल वस्त्र पहनें और गणेश जी के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
पूजा सामग्री: भगवान को दूर्वा, शमी के पत्ते, अक्षत और सिंदूर अर्पित करें।
भोग: गणेश जी को उनके प्रिय मोदक या गुड़-तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
द्विजप्रिय मंत्र: पूजा के दौरान "ॐ द्विजप्रियाय नमः" मंत्र का जाप करें।
शाम की पूजा: रात्रि में चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल, चंदन और रोली से अर्घ्य दें।
धार्मिक मान्यता: क्यों कहते हैं 'द्विजप्रिय'?
शास्त्रों के अनुसार, 'द्विज' का अर्थ होता है जिसका दो बार जन्म हुआ हो (जैसे ब्राह्मण या ज्ञान प्राप्त व्यक्ति)। भगवान गणेश का यह स्वरूप शास्त्रों के ज्ञाता और ज्ञानियों को प्रिय है। जो जातक इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता दूर होती है और उन्हें समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।