सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स के लिए बदल रहे हैं नियम,अब अनिवार्य हो सकता है KYC और उम्र का सत्यापन
News India Live, Digital Desk: इंटरनेट की दुनिया को सुरक्षित बनाने के लिए भारत सरकार एक बड़े कूटनीतिक और तकनीकी बदलाव की तैयारी में है। जल्द ही आपको अपने पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक), डेटिंग ऐप्स (जैसे टिंडर, बम्बल) और ऑनलाइन गेमिंग ऐप्स का इस्तेमाल करने के लिए अपनी असली पहचान और उम्र का प्रमाण देना पड़ सकता है। 'डिजिटल इंडिया एक्ट 2026' और 'DPDP एक्ट 2023' के सख्त प्रावधानों के तहत सरकार एक ऐसी नियमावली तैयार कर रही है, जिसमें यूजर्स के लिए KYC (Know Your Customer) और एज वेरिफिकेशन (Age Verification) को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों और फर्जी प्रोफाइल के जाल को खत्म करना है।
क्यों पड़ी इन कड़े नियमों की जरूरत?
संसदीय पैनल और आईटी मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट्स में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि बिना किसी पहचान सत्यापन के सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स पर फर्जी अकाउंट्स की बाढ़ आ गई है। इन 'फेक प्रोफाइल्स' का इस्तेमाल ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर स्टॉकिंग, और अभद्र सामग्री फैलाने के लिए किया जा रहा है। विशेष रूप से डेटिंग ऐप्स पर पहचान छिपाकर लड़कियों को निशाना बनाने वाली घटनाओं ने सरकार को सख्त कदम उठाने पर मजबूर किया है। अब कंपनियां केवल 'सेल्फ डिक्लेरेशन' (सिर्फ जन्मतिथि भरने) पर निर्भर नहीं रह सकेंगी, बल्कि उन्हें ठोस प्रमाण की मांग करनी होगी।
2026 का 'ग्रेडेड अप्रोच': उम्र के हिसाब से लगेंगे प्रतिबंध
प्रस्तावित नए नियमों के तहत सरकार एक 'ग्रेडेड अप्रोच' (चरणबद्ध तरीका) अपना सकती है, जिसमें अलग-अलग आयु वर्ग के लिए अलग-अलग नियम होंगे:
8 से 12 वर्ष: सबसे सख्त प्रतिबंध और अनिवार्य माता-पिता की निगरानी।
12 से 16 वर्ष: नियंत्रित एक्सेस और कंटेंट फिल्टरिंग।
16 से 18 वर्ष: अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध लेकिन कड़ी निगरानी।
18+ (वयस्क): पूर्ण एक्सेस, लेकिन केवल प्रमाणित KYC के बाद।
आधार और डिजीलॉकर बन सकते हैं सत्यापन का आधार
आईटी मंत्रालय (MeitY) द्वारा विचार किए जा रहे प्रस्तावों में आधार-आधारित टोकन सिस्टम या डिजीलॉकर (DigiLocker) के माध्यम से उम्र सत्यापन की बात कही गई है। इसके अलावा, 'फेसियल एज एस्टिमेशन' (AI के जरिए चेहरे से उम्र का पता लगाना) जैसी आधुनिक तकनीकों पर भी चर्चा चल रही है। कंपनियों को निर्देश दिया जा सकता है कि वे 13 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा उनके माता-पिता की प्रमाणित सहमति के बिना प्रोसेस न करें। यदि कोई ऐप इन नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उस पर भारी जुर्माना और प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।
गेमिंग और डेटिंग ऐप्स पर 'हाई-रिस्क' फ्लैग
ऑनलाइन गेमिंग ऐप्स, जिनमें रियल मनी (असली पैसा) शामिल है, उनके लिए KYC पहले से ही जरूरी है, लेकिन अब साधारण गेमिंग ऐप्स के लिए भी 'एज-गेटिंग' (उम्र के आधार पर पहुंच रोकना) अनिवार्य हो सकता है। डेटिंग ऐप्स के लिए 'समय-समय पर री-वेरिफिकेशन' का नियम लाया जा सकता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अकाउंट का उपयोग वही व्यक्ति कर रहा है जिसकी पहचान प्रमाणित की गई है। बार-बार रिपोर्ट किए जाने वाले प्रोफाइल पर 'हाई-रिस्क फ्लैग' लगाया जाएगा, जिससे अन्य यूजर्स को पहले ही सतर्क किया जा सके।
निजता (Privacy) बनाम सुरक्षा की चुनौती
हालांकि, इन नियमों को लेकर विशेषज्ञों के बीच बहस भी छिड़ गई है। आलोचकों का मानना है कि हर ऐप पर सरकारी आईडी (ID) मांगने से यूजर्स की प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है और डेटा लीक होने का डर बढ़ सकता है। इसके जवाब में सरकार 'प्राइवेसी-प्रिजर्विंग प्रूफ' (Privacy-Preserving Proof) तकनीक पर काम कर रही है, जिसमें यूजर को अपनी पूरी पहचान उजागर किए बिना केवल "मैं 18+ हूँ" का प्रमाणित प्रमाण देना होगा। आने वाले मानसून सत्र में इन नियमों को लेकर बड़ी घोषणा होने की उम्मीद है।