उत्तर भारत का अनोखा अजूबा: क्या सच में पांडवों ने रातों-रात पहाड़ों को काटकर बनाया था यह रहस्यमयी मंदिर?
हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत और वादियों से घिरी कांगड़ा घाटी में एक ऐसा ऐतिहासिक चमत्कार छिपा है, जिसे देखकर आधुनिक इंजीनियर भी दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं. हम बात कर रहे हैं 'मसरूर रॉक कट मंदिर' की, जिसे उत्तर भारत का 'एलोरा' भी कहा जाता है. आम तौर पर दुनिया भर के मंदिर ईंट, सीमेंट और पत्थरों को आपस में जोड़कर ऊंचे खड़े किए जाते हैं, लेकिन मसरूर मंदिर के निर्माण की कहानी बिल्कुल जुदा और हैरान करने वाली है.
यह उत्तर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें कहीं भी कोई जोड़ नहीं है. एक बहुत विशाल बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) की पूरी पहाड़ी को ऊपर से नीचे की तरफ तराशते हुए इस भव्य मंदिर का आकार दिया गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दस्तावेजों और मशहूर इतिहासकार एच. शटलवर्थ के शोध में भी इस प्राचीन कलाकृति को भारतीय वास्तुकला का सबसे बेजोड़ और दुर्लभ नमूना माना गया है.
इतिहास और लोककथाओं का अनोखा संगम: राजा जशपाल या पांडवों का अज्ञातवास?
इस मंदिर के इतिहास को लेकर दो बेहद दिलचस्प कहानियां प्रचलित हैं. जहां एक तरफ इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इस अद्भुत परिसर का निर्माण 8वीं शताब्दी में राजा जशपाल के शासनकाल के दौरान हुआ था, वहीं दूसरी तरफ कांगड़ा के स्थानीय समाज में सदियों से एक अलग ही मान्यता चली आ रही है. स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब पांडव अपना अज्ञातवास काट रहे थे, तब उन्होंने इस बेहद दुर्गम और शांत जगह पर इस मंदिर का निर्माण शुरू किया था.
कहा जाता है कि समय की कमी के कारण पांडव इस पूरे मंदिर परिसर का निर्माण कार्य पूरा नहीं कर सके. आज भी यदि आप मसरूर मंदिर के दर्शन करने जाएंगे, तो आपको कई हिस्सों में अधूरी नक्काशी और अधूरा काम साफ तौर पर देखने को मिल जाएगा, जो इस ऐतिहासिक स्थल के रहस्य को और ज्यादा गहरा कर देता है.
15 मंदिरों का जादुई समूह और अजंता-एलोरा जैसी बेजोड़ नक्काशी
अगर बात इस मंदिर की बनावट और वास्तुकला की करें, तो पूरा परिसर किसी प्राचीन नगरी जैसा प्रतीत होता है. इस रॉक-कट परिसर में छोटे-बड़े कुल 15 मंदिरों का एक समूह है, जिसके केंद्र में मुख्य और सबसे बड़ा मंदिर स्थित है. इस मुख्य गर्भगृह के भीतर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता की अत्यंत सुंदर और प्राचीन मूर्तियां विराजमान हैं.
इतिहास के पन्नों को खंगालने पर पता चलता है कि मसरूर मंदिर के खंभों और दीवारों पर की गई महीन नक्काशी काफी हद तक महाराष्ट्र की विश्वप्रसिद्ध अजंता और एलोरा की गुफाओं से मेल खाती है. पहाड़ों और जंगलों के बीच सदियों तक छिपे रहने के बावजूद, देश-विदेश से आने वाले इतिहासकार और कला प्रेमी इसे भारत की सबसे अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों में से एक मानते हैं.
मसरूर झील का जादू: पानी में तैरता पत्थरों का इतिहास
मसरूर रॉक कट मंदिर की खूबसूरती को जो चीज सबसे ज्यादा जादुई और जीवंत बनाती है, वह है इसके ठीक सामने स्थित एक विशाल और ऐतिहासिक तालाब, जिसे स्थानीय लोग मसरूर झील के नाम से पुकारते हैं. दिन के समय जब आसमान साफ होता है और सूरज की तेज किरणें इन प्राचीन नक्काशीदार पत्थरों पर पड़ती हैं, तो इस पूरे विशालकाय मंदिर की एक अद्भुत परछाई सामने वाले शांत पानी में तैरती हुई दिखाई देती है.
झील के पवित्र और निश्चल पानी के भीतर मंदिर के ऊंचे शिखरों के इस उल्टे प्रतिबिंब को देखना सैलानियों के लिए किसी दैवीय और जादुई अहसास से कम नहीं होता. देश-दुनिया से आने वाले पर्यटक यहां घंटों बैठकर इस अलौकिक और सुकून देने वाले नजारे को अपनी यादों में समेटते हैं.
1905 का भयंकर कांगड़ा भूकंप भी नहीं हिला पाया जिसकी नींव
साल 1905 में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में एक विनाशकारी और भीषण भूकंप आया था, जिसने पूरे इलाके में भारी तबाही मचाई थी. इस प्राकृतिक आपदा ने मसरूर की इस ऐतिहासिक धरोहर को भी थोड़ा-बहुत नुकसान पहुंचाया था, जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं. लेकिन चमत्कार की बात यह रही कि मंदिर का मुख्य गर्भगृह और इसका केंद्रीय हिस्सा इस भीषण झटके के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित बच गया.
आज सदियों बाद भी यह जादुई रॉक-कट मंदिर अपनी पूरी मजबूती और भव्यता के साथ सीना ताने शान से खड़ा है. यदि आप भी देवभूमि हिमाचल प्रदेश की यात्रा का मन बना रहे हैं, तो कांगड़ा के इस प्राचीन और रहस्यमयी अजूबे को अपनी लिस्ट में शामिल करना बिल्कुल न भूलें. पत्थरों को काटकर लिखा गया यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों के पास विज्ञान, सोच और कला का कितना अद्भुत भंडार था.