23 या 24 सितंबर, कब रखा जाएगा भाद्रपद माह का अंतिम प्रदोष व्रत
सनातन धर्म में पंचांग और व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व माना गया है, जिनमें प्रदोष व्रत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी कहा गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने की त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत रखा जाता है। भाद्रपद मास का यह अंतिम प्रदोष व्रत इस बार किस दिन रखा जाएगा, इसको लेकर श्रद्धालुओं के मन में काफी असमंजस और दुविधा की स्थिति बनी हुई है कि व्रत 23 सितंबर को रखा जाए या 24 सितंबर को। इस तिथि के संशय को दूर करने के लिए देश के प्रमुख ज्योतिषीय और धार्मिक केंद्र उज्जैन के प्रसिद्ध आचार्यों ने स्पष्ट गणना के आधार पर सही तिथि, व्रत के नियम और पूजा-पाठ के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी साझा की है। यदि आप भी भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रदोष व्रत के सही समय और पूजन विधान को जानना आपके लिए बेहद आवश्यक है।
भगवान शिव की आराधना का यह पावन व्रत न केवल भक्तों के सभी संकटों को दूर करता है, बल्कि उन्हें मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य और अमोघ पुण्य की प्राप्ति भी कराता है। प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के ठीक पहले और बाद का समय भगवान शिव की उपासना के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। भाद्रपद माह के समापन की ओर बढ़ते हुए यह अंतिम प्रदोष व्रत इसलिए भी खास हो जाता है क्योंकि इस दिन व्रत रखने से चातुर्मास के दौरान मिलने वाली विशेष शिव कृपा का पूरा लाभ मिलता है। आइए जानते हैं कि उज्जैन के विद्वान आचार्यों के अनुसार इस बार प्रदोष व्रत की वास्तविक और शास्त्र-संमत तिथि कौन सी है और किस दिन व्रत रखना सबसे अधिक फलदायी रहेगा।
उज्जैन के आचार्य ने दूर किया संशय: जानिए क्या है 23 या 24 सितंबर में से सही तिथि
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथियों के घट-बढ़ होने के कारण अक्सर व्रत की तारीखों को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। उज्जैन के जाने-माने ज्योतिष आचार्य और पंचांगकर्ताओं ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया है कि उदया तिथि और प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी के नियमों का पालन करना सबसे जरूरी होता है। आचार्य के अनुसार, यदि त्रयोदशी तिथि का विस्तार प्रदोष काल (संध्या के समय) तक रहता है, तो उसी दिन का व्रत सबसे उत्तम माना जाता है। पंचांग की सटीक गणना के मुताबिक, इस वर्ष भाद्रपद माह का अंतिम प्रदोष व्रत किस तारीख को सूर्य की स्थिति और चंद्रमा के गोचर के आधार पर मान्य होगा, इसकी पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है ताकि भक्तों को पूजा में किसी भी प्रकार की दुविधा का सामना न करना पड़े।
विद्वानों का कहना है कि शास्त्रों में प्रदोष व्रत के लिए प्रदोष काल को मुख्य आधार माना गया है। यदि किसी दिन द्वादशी समाप्त होकर त्रयोदशी तिथि शाम के समय यानी सूर्यास्त के आसपास शुरू होती है या पूरे प्रदोष काल में व्याप्त रहती है, तो वह दिन व्रत के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। इसलिए, जिन लोगों को 23 सितंबर को लेकर संशय था, उन्हें पंचांग के सही नियमों के अनुसार ही अपना उपवास रखना चाहिए ताकि उनकी पूजा का पूर्ण प्रतिफल मिल सके। आचार्य ने यह भी सलाह दी है कि व्रत का संकल्प हमेशा सही तिथि और पंडितों द्वारा बताए गए मुहूर्त के अनुसार ही लेना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की धार्मिक त्रुटि से बचा जा सके।
प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त और पूजा का सबसे उत्तम समय
किसी भी व्रत और अनुष्ठान की सफलता उसके सही मुहूर्त पर निर्भर करती है। प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा प्रदोष काल में ही की जाती है, जो सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले शुरू होती है और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहती है। इस विशेष कालखंड में भगवान शिव अपने पूरे परिवार यानी माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदी जी के साथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होते हैं। इस दौरान की गई पूजा से साधक की सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद के इस अंतिम प्रदोष व्रत के दिन संध्याकाल का मुहूर्त अत्यंत ही ऊर्जावान और पावन रहेगा, जिसमें भगवान शिव का अभिषेक करना विशेष रूप से कल्याणकारी माना गया है।
पूजा के समय व्रतियों को शाम के वक्त स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करने चाहिए और प्रदोष काल शुरू होने से पहले ही अपने घर के मंदिर या किसी शिवालय में पूजा की पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए। प्रदोष काल में भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, और बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, चंदन, धूप-दीप व नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। इस दिन 'ॐ नमः शिवाय' महामंत्र का निरंतर जाप करना और प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करना अत्यंत शुभ फल देता है। पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करनी चाहिए।
प्रदोष व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य जरूरी नियम और सावधानियां
प्रदोष व्रत अन्य व्रतों की तुलना में थोड़ा अलग और विशेष नियमों वाला माना जाता है। इस व्रत को रखने वाले श्रद्धालुओं को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और दिनभर मन में भगवान शिव का स्मरण रखना चाहिए। इस दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता है, और जो लोग पूरी तरह निर्जला व्रत रखने में सक्षम नहीं हैं, वे फलाहार या केवल दूध और जल ग्रहण करके उपवास रख सकते हैं। व्रत के दिन किसी भी प्रकार के असत्य, क्रोध, वाद-विवाद या नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि भगवान शिव निर्मल मन और सच्चे भाव से की गई भक्ति से ही सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं।
इसके अलावा, प्रदोष व्रत के दिन बाल और नाखून काटने जैसी क्रियाओं से बचना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद एक बार पुनः स्नान या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनकर ही प्रदोष काल की पूजा में बैठना चाहिए। पूजा संपन्न होने के बाद ही अन्न या फलाहार ग्रहण करना चाहिए। जो लोग विधि-विधान से इन सभी नियमों का पालन करते हैं, उन्हें महादेव की असीम कृपा प्राप्त होती है और उनके जीवन के सभी कष्ट व बाधाएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं।
भगवान शिव की कृपा और प्रदोष व्रत का अलौकिक आध्यात्मिक महत्व
सनातन परंपरा में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की प्राप्ति और उनके आशीर्वाद का सबसे सरल मार्ग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो मनुष्य प्रदोष व्रत के नियमों का पालन करते हुए सच्चे मन से शिव-पार्वती की आराधना करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और उसके जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं। भाद्रपद माह का यह अंतिम प्रदोष व्रत चातुर्मास के बीच आने के कारण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं और सृष्टि का संचालन और संरक्षण भगवान शिव के हाथों में विशेष रूप से माना जाता है। इस दौरान शिव आराधना करने से साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।