देव, ऋषि और पितृ तर्पण के नियम, क्या महिलाएं और पुरुष अलग तरीके से देते हैं तिलांजलि

देव, ऋषि और पितृ तर्पण के नियम, क्या महिलाएं और पुरुष अलग तरीके से देते हैं तिलांजलि

सनातन धर्म और वैदिक परंपरा में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों, ऋषियों और देवताओं के प्रति अपनी अगाध कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन कालखंड माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले इस पखवाड़े के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी क्षुधा-तृप्ति के लिए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करते हैं। धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि केवल भोजन अर्पित करने से ही नहीं, बल्कि कुश, अक्षत, जौ और काले तिल मिले पवित्र जल की अंजलि देने से पितृ तृप्त होते हैं। इस पावन जलदान की प्रक्रिया को ही 'तर्पण' कहा जाता है। तर्पण के माध्यम से व्यक्ति अपने संपूर्ण अस्तित्व और जीवन के लिए ब्रह्मांड की सभी सकारात्मक शक्तियों का आभार प्रकट करता है।

धार्मिक मान्यताओं और स्मृति ग्रंथों के अनुसार तर्पण को केवल परिवार के दिवंगत परिजनों तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसके अंतर्गत सृष्टि के समस्त ज्ञात-अज्ञात चेतन तत्वों को शामिल किया गया है। शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार मुख्य रूप से पांच प्रकार के तर्पण का स्पष्ट निर्देश दिया गया है, जिन्हें क्रमवार संपन्न किया जाता है। आइए समझते हैं कि वे पांच श्रेणियां कौन सी हैं और प्रत्येक का क्या विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है।

देव, ऋषि और दिव्य मानव तर्पण: सृष्टि की दिव्य शक्तियों के प्रति कृतज्ञता

तर्पण की शुरुआत हमेशा देव तर्पण से होती है। देव तर्पण के अंतर्गत ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र, अग्नि, वरुण आदि पंचतत्वों और समस्त वैदिक देवताओं की तृप्ति के लिए जल अर्पित किया जाता है। इसमें पूर्व दिशा की ओर मुख करके जनेऊ को सव्य (बाएं कंधे पर) रखते हुए, उंगलियों के अग्रभाग यानी देवतीर्थ से शुद्ध जल, सफेद चंदन और अक्षत मिश्रित जलधारा समर्पित की जाती है। यह विधान हमें स्मरण कराता है कि हमारा अस्तित्व देवताओं की कृपा और प्रकृति के संतुलन पर टिका है।

इसके उपरांत ऋषि तर्पण का विधान आता है, जो मानव सभ्यता को ज्ञान, दर्शन और संस्कार प्रदान करने वाले महान ऋषियों को समर्पित होता है। महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, गौतम और जमदग्नि जैसे सप्तर्षियों का ध्यान करते हुए उत्तर दिशा की ओर मुख करके जल दिया जाता है। इसे ऋषितीर्थ यानी कनिष्ठिका उंगली के मूल भाग से अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात दिव्य मानव तर्पण किया जाता है, जिसमें सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे सिद्ध महापुरुषों तथा यमराज के दूतों और दिव्य आत्माओं को जल देकर उनके प्रति नमन किया जाता है। यह तर्पण मनुष्य को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाता है।

दिव्य पितृ और कुल पितृ तर्पण: पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति का महामंत्र

चौथा प्रकार दिव्य पितृ तर्पण कहलाता है। दिव्य पितरों में वे पूर्वज शामिल होते हैं जो अपने जीवनकाल में किए गए श्रेष्ठ कर्मों और योग साधना के बल पर उच्च लोकों में स्थान पा चुके हैं, जैसे अग्निष्वात्त, बर्हिषद और सोमपा पितृगण। इन्हें दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल और कुश के माध्यम से तृप्त किया जाता है। इनके आशीर्वाद से साधक के घर-परिवार में आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि बनी रहती है।

पांचवां और सबसे प्रमुख अंग है पितृ तर्पण, जो सीधे तौर पर हमारे अपने कुल, वंश और परिवार के तीन पीढ़ियों के ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के लिए किया जाता है। इसमें पिता, पितामह (दादा), प्रपितामह (परदादा) तथा माता, पितामही (दादी) और प्रपितामही (परदादी) के साथ-साथ नाना-नानी और अन्य संबंधियों को जल की अंजलि दी जाती है। इस तर्पण में दक्षिण दिशा की ओर मुख किया जाता है और हाथ में कुश की पवित्री धारण करके, अंगूठे और तर्जनी के बीच स्थित पितृतीर्थ से जलधारा प्रवाहित की जाती है। काले तिल और कुश के स्पर्श से दिया गया यह जल पितरों को असीम तृप्ति प्रदान करता है और जन्म-जन्मांतर के पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है।

क्या महिला और पुरुष अलग-अलग तरीके से देते हैं तिलांजलि? जानें गरुड़ पुराण के नियम

श्राद्ध और तर्पण कर्म को लेकर अक्सर यह जिज्ञासा रहती है कि क्या महिलाएं भी पितरों को तिलांजलि दे सकती हैं और पुरुष व महिला की तर्पण विधि में क्या मूलभूत अंतर होता है। हिंदू धर्मग्रंथों और गरुड़ पुराण के धर्मकाण्ड में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि पुत्र की अनुपस्थिति में पत्नी, पुत्री या पुत्रवधू को पितृ कर्म, पिंडदान और तर्पण करने का पूर्ण शास्त्रीय अधिकार प्राप्त है। यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य न हो या वह किसी कारणवश असमर्थ हो, तो महिलाएं पूरी निष्ठा के साथ अपने पूर्वजों को जल अर्पित कर सकती हैं।

विधि के संदर्भ में सबसे बड़ा अंतर यज्ञोपवीत यानी जनेऊ के नियमों का होता है। पुरुष जब पितरों का तर्पण करते हैं, तो वे अपने जनेऊ को बाएं कंधे से हटाकर दाहिने कंधे पर कर लेते हैं, जिसे वैदिक भाषा में 'अपसव्य' स्थिति कहा जाता है। इसके साथ ही वे दक्षिण दिशा की ओर मुख करके घुटने मोड़कर बैठते हैं और पितृतीर्थ से तिलांजलि देते हैं। चूंकि महिलाओं के लिए जनेऊ धारण करने का नियम नहीं होता, इसलिए उन पर अपसव्य का नियम लागू नहीं होता। महिलाएं शुद्ध और सात्विक वस्त्र धारण करके, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दोनों हाथों में कुश और काला तिल लेकर सीधे भाव से पितरों को जल की अंजलि समर्पित कर सकती हैं। दोनों ही स्थितियों में भाव और श्रद्धा की प्रधानता होती है, क्योंकि शास्त्रों का वचन है कि पितृ केवल जल और श्रद्धा के भूखे होते हैं।

तर्पण के समय इन नियमों का रखें खास ध्यान, तभी मिलेगा पूरा फल

तर्पण कर्म करते समय कुछ अत्यंत आवश्यक सावधानियों और नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। तर्पण हमेशा सूर्योदय के बाद और दोपहर 12 बजे से पहले के समय, विशेषकर कुतुप और रौहिण मुहूर्त में ही संपन्न करना चाहिए। संध्याकाल या रात्रि में तर्पण करना शास्त्रों में पूर्णतः वर्जित बताया गया है। इसके अलावा तर्पण करते समय तांबे, पीतल, कांसे या चांदी के पात्र का ही प्रयोग करना चाहिए; लोहे, स्टील या प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग कभी नहीं करना चाहिए।

जल में गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, जौ, सफेद चंदन, अक्षत और विशेष रूप से काले तिल का सम्मिश्रण अवश्य होना चाहिए। अनामिका उंगली में कुश की अंगूठी (पवित्री) पहनना तर्पण की सबसे अनिवार्य शर्त है, क्योंकि कुश को भगवान विष्णु के रोम से उत्पन्न और अत्यंत पवित्र माना गया है। जब पूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता और नियमों के साथ यह पंच-तर्पण संपन्न होता है, तो पितृ तृप्त होकर अपने वंशजों को दीर्घायु, आरोग्य, संतान सुख और कुल वृद्धि का मंगलकारी आशीर्वाद प्रदान करते हैं।