Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन पर 70 साल बाद चंद्र ग्रहण और दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों का महासंयोग! भद्रा से मिलेगी मुक्ति
भाई-बहन के अटूट प्रेम, सुरक्षा और स्नेह का महापर्व रक्षाबंधन इस वर्ष 2026 में ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक होने जा रहा है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस बार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि यानी 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाएगा। ज्योतिषविदों का कहना है कि इस दिन एक तरफ जहां आंशिक चंद्र ग्रहण की खगोलीय घटना घटने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ 70 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कई दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों का ऐसा महासंयोग बन रहा है जो इस दिन के आध्यात्मिक महत्व को कई गुना बढ़ा देता है। सबसे राहत की बात यह है कि इस साल बहनों को राखी बांधने के लिए भद्रा काल का लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि भद्रा का साया सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा।
70 साल बाद रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण और दुर्लभ ज्योतिषीय योगों का महासंयोग
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वर्ष 2026 का रक्षाबंधन कई मायनो में अद्वितीय है। 28 अगस्त को कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र के दुर्लभ योग में आंशिक चंद्र ग्रहण घटित होने जा रहा है। शतभिषा नक्षत्र और कुंभ राशि पर चंद्रमा और शनि के प्रभाव के साथ-साथ सूर्य और बुध के शुभ योग से इस दिन त्रिपुष्कर और सर्वार्थ सिद्धि जैसा वातावरण निर्मित हो रहा है। ज्योतिषविदों के मुताबिक, लगभग 70 साल बाद ऐसा अवसर आया है जब श्रावण पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण और भद्रा-मुक्त सुबह का एक साथ दुर्लभ संयोग बन रहा है। यह संयोग धार्मिक क्रियाकलापों, पूजा-पाठ और भाई के कल्याण की कामना के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है।
क्या भारत में लगेगा चंद्र ग्रहण का सूतक? जानिए ज्योतिषाचार्यों की सटीक राय
जैसे ही रक्षाबंधन के दिन चंद्र ग्रहण की खबर सामने आई, आम लोगों और श्रद्धालुओं के मन में सूतक काल को लेकर कई तरह की शंकाएं पैदा हो गईं। आमतौर पर चंद्र ग्रहण लगने से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाता है, जिसमें शुभ कार्य और पूजा-पाठ वर्जित माने जाते हैं। पंचांग के अनुसार, 28 अगस्त 2026 को चंद्र ग्रहण सुबह 06:53 बजे शुरू होकर दोपहर 12:32 बजे समाप्त होगा।
हालांकि, देश के शीर्ष ज्योतिषाचार्यों और धर्मशास्त्रियों ने स्पष्ट किया है कि भारत में इस चंद्र ग्रहण का कोई धार्मिक असर या सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसका मुख्य कारण यह है कि यह ग्रहण भारतीय समयानुसार दिन के समय घटित हो रहा है, जब चंद्रमा भारतीय क्षितिज से नीचे (अस्त) रहेगा। शास्त्रों का सर्वमान्य नियम है कि जो ग्रहण अपने देश के आकाश में नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता, उसका न तो सूतक काल माना जाता है और न ही धार्मिक कार्यों में कोई बाधा आती है। इसलिए बहनें बिना किसी भय या संकोच के पूरे दिन धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ रक्षाबंधन मना सकती हैं।
भद्रा के साये से पूरी तरह मुक्त रहेगा इस बार का रक्षाबंधन पर्व
रक्षाबंधन के दिन सबसे ज्यादा चिंता 'भद्रा काल' की होती है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में राखी बांधना सख्त वर्जित और अशुभ माना जाता है। लंकापति रावण को उसकी बहन सुपर्णखा ने भद्रा काल में ही राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण के वंश का विनाश हो गया था। यही वजह है कि भद्रा काल के दौरान रक्षासूत्र नहीं बांधा जाता।
वर्ष 2026 में देश भर के श्रद्धालुओं के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी यह है कि 28 अगस्त को भद्रा का साया सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो चुका होगा। 27 अगस्त की सुबह 09:08 बजे शुरू होने वाली पूर्णिमा तिथि और भद्रा 28 अगस्त के सूर्योदय से पूर्व ही निकल जाएगी। ऐसे में 28 अगस्त की सुबह जब बहनें पूजा की थाली सजाएंगी, तब पूरा वातावरण शुभ ऊर्जा से भरा होगा और उन्हें भद्रा बीतने का घंटों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
रक्षाबंधन 2026 पर राखी बांधने के 3 सबसे श्रेष्ठ और शुभ मुहूर्त
पंचांगीय गणना के अनुसार 28 अगस्त को दिन भर में राखी बांधने के लिए तीन विशेष और अत्यंत शुभ समय उपलब्ध रहेंगे:
पहला मुहूर्त: प्रातःकाल का अमृत समय (प्रातः 05:57 बजे से 09:48 बजे तक)
रक्षाबंधन पर राखी बांधने का सबसे उत्तम और पहला मुहूर्त सुबह 05:57 बजे से शुरू होकर सुबह 09:48 बजे तक रहेगा। यह कुल 3 घंटे 51 मिनट की अवधि है। चूंकि इस समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी और भद्रा का साया भी नहीं रहेगा, इसलिए यह समय राखी बांधने, तिलक करने और भाई की आरती उतारने के लिए शास्त्रों में सबसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
दूसरा मुहूर्त: अपराह्ण काल का महामुहूर्त (दोपहर 01:30 बजे से 04:00 बजे तक)
यदि कोई परिवार किसी कारणवश सुबह के मुहूर्त में राखी नहीं बांध पाता है, तो दोपहर का 'अपराह्ण काल' सबसे उत्तम विकल्प है। धर्मशास्त्रों (निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु) के अनुसार, रक्षाबंधन का पर्व मनाने के लिए पूरे दिन में 'अपराह्ण काल' (दोपहर का तीसरा पहर) को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। 28 अगस्त को दोपहर 01:30 बजे से शाम 04:00 बजे तक का समय बेहद शुभ रहेगा।
तीसरा मुहूर्त: सायंकाल का शुभ समय (सायं 04:15 बजे से 06:15 बजे तक)
जो लोग काम-काज या यात्रा में व्यस्त होने के कारण सुबह और दोपहर में राखी नहीं बांध पाते, वे शाम के समय इस तीसरे शुभ मुहूर्त का उपयोग कर सकते हैं। शाम 04:15 बजे से लेकर शाम 06:15 बजे (प्रदोष काल शुरू होने से पहले) तक का समय राखी बांधने के लिए अनुकूल रहेगा। ध्यान रहे कि शाम 06:30 बजे से 08:00 बजे के बीच रहने वाले प्रदोष काल में रक्षासूत्र बांधने से बचना चाहिए।
रक्षाबंधन पर राखी बांधते समय रखें इन 5 विशेष शास्त्रीय नियमों का ध्यान
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दिशा का रखें विशेष ध्यान: राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए, जबकि बहन का मुख पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है।
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सिर ढककर बिठाएं: रक्षासूत्र बांधते समय भाई और बहन दोनों का सिर किसी कपड़े या रुमाल से ढका होना चाहिए। नंगे सिर राखी बंधवाना शुभ नहीं माना जाता।
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अक्षत और रोली का तिलक: राखी बांधने से पहले भाई के माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाएं और उस पर बिना टूटे हुए चावल (अक्षत) लगाएं।
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दाहिनी कलाई पर बांधें रक्षासूत्र: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाई की दाहिनी (सीधी) कलाई पर ही रक्षासूत्र बांधना चाहिए, क्योंकि दाहिनी कलाई में शरीर की मुख्य नसों का प्रवाह होता है।
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आरती उतारें और मुंह मीठा कराएं: राखी बांधने के पश्चात दीपक से भाई की आरती उतारें और उनका मुंह मीठा कराकर उनके दीर्घायु, सुख और समृद्धि की ईश्वर से प्रार्थना करें।
यह दुर्लभ रक्षाबंधन 2026 सभी परिवारों के जीवन में सुख, शांति और भाइयों व बहनों के बीच प्यार की नई डोर को और मजबूत करने वाला सिद्ध होगा।