क्या पीरियड्स के दौरान रखा जा सकता है व्रत? जानिए मासिक धर्म में पूजा और उपवास से जुड़े जरूरी नियम और सही विधि

क्या पीरियड्स के दौरान रखा जा सकता है व्रत? जानिए मासिक धर्म में पूजा और उपवास से जुड़े जरूरी नियम और सही विधि

सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में व्रत, त्योहारों और अनुष्ठानों का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। देश भर में जब भी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी (Janmashtami) का पावन पर्व आता है, तो हर घर में उत्साह, उमंग और भक्ति का माहौल बन जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाओं से लेकर युवतियां और घरों की माताएं बाल गोपाल को प्रसन्न करने के लिए विधि-विधान से उपवास रखती हैं और मध्य रात्रि तक जागकर उनकी पूजा-अर्चना करती हैं। लेकिन, कई बार महिलाओं और युवतियों के सामने एक ऐसी स्थिति आ जाती है जिसे लेकर उनके मन में तमाम तरह की दुविधाएं और असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। सवाल यह उठता है कि यदि किसी महिला या युवती को जन्माष्टमी के दिन मासिक धर्म (Periods) यानी महावारी आ जाए, तो क्या ऐसी स्थिति में उन्हें व्रत रखना चाहिए या नहीं? क्या पीरियड्स के दौरान भगवान की पूजा करना वर्जित माना गया है? इन तमाम धार्मिक और व्यावहारिक सवालों के जवाब को लेकर ज्योतिषचार्यों और धर्म के जानकारों ने स्पष्ट नियम बताए हैं। मासिक धर्म के दौरान व्रत और पूजा-पाठ से जुड़े इन महत्वपूर्ण नियमों और सावधानियों को आइए विस्तार से और गहराई के साथ समझते हैं।

क्या पीरियड्स के दौरान रखा जा सकता है जन्माष्टमी का व्रत? जानें क्या कहते हैं ज्योतिष और धर्म के नियम

हिंदू धर्म शास्त्रों और सनातन परंपराओं के अनुसार मासिक धर्म (Periods) को शारीरिक शुद्धि और प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। इस दौरान महिलाओं को कुछ दिनों के लिए धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर या पूजा घर में प्रवेश करने से वर्जित रखा जाता है। लेकिन जहां तक बात व्रत (Fast) रखने की है, तो धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उपवास का संबंध मुख्य रूप से शरीर की आंतरिक शुद्धि, मन के संयम, संकल्प और ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा से होता है। इसलिए, यदि किसी महिला को जन्माष्टमी के दिन पीरियड्स आ गए हैं, तो वे पूरी श्रद्धा के साथ व्रत (उपवास) रख सकती हैं। व्रत रखने में किसी भी प्रकार की कोई मनाही या रोक-टोक नहीं होती है। उपवास के दौरान भोजन और जल के नियमों का पालन करते हुए महिलाएं मन ही मन भगवान श्री कृष्ण का ध्यान कर सकती हैं। व्रत रखने से शारीरिक अशुद्धता का कोई लेना-देना नहीं होता, क्योंकि व्रत मुख्य रूप से मानसिक और आत्मिक समर्पण का प्रतीक माना गया है।

मासिक धर्म के दौरान पूजा-पाठ और बाल गोपाल की सेवा करने के कड़े नियम और सावधानियां

व्रਤ रखने के नियम जहां आसान हैं, वहीं पूजा-पाठ और मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश को लेकर कुछ सख्त नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हर सनातनधर्मी का कर्तव्य माना जाता है। यदि आप पीरियड्स के दिनों में जन्माष्टमी का उपवास रख रही हैं, तो आपको इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप पूजा घर के अंदर प्रवेश न करें और न ही भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति, झूले, शंख, घंटी या पूजा की थाली को अपने हाथों से स्पर्श करें। मूर्ति स्पर्श करना इस दौरान वर्जित माना जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर जन्माष्टमी की पूजा कैसे संपन्न होगी? इसका सबसे अच्छा समाधान यह है कि आप अपने घर के किसी अन्य सदस्य (जैसे पति, माता, बहन या बच्चे) से कहें कि वे आपके नाम से संकल्प लेकर बाल गोपाल का अभिषेक और विधिवत श्रृंगार करें। आप खुद दूर बैठकर या मंदिर के बाहर से ही भगवान के दर्शन कर सकती हैं, भजन-कीर्तन में शामिल हो सकती हैं और मन ही मन 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' या 'हरे कृष्ण महामंत्र' का जाप कर सकती हैं। भगवान भक्तों की भावना और सच्चे प्रेम को देखते हैं, बाहरी कर्मकांड से अधिक उनका मन का भाव महत्वपूर्ण होता है।

मानसिक पूजा और व्रत के दौरान खानपान के नियमों का पालन करने का महत्व

जब महिलाएं पीरियड्स के दौरान शारीरिक रूप से पूजा की सामग्रियों को स्पर्श नहीं कर पाती हैं, तो उनके लिए शास्त्रों में 'मानसिक पूजा' (Mental Worship) का बहुत बड़ा विधान बताया गया है। आप आंखें बंद करके मानसिक रूप से भगवान श्री कृष्ण का आह्वान कर सकती हैं, उन्हें भोग लगा सकती हैं और उनकी आरती गा सकती हैं। इसके अलावा व्रत के दौरान खानपान के नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। यदि स्वास्थ्य इसकी अनुमति देता है, तो आप फलाहार या निर्जला व्रत रख सकती हैं। इस पावन दिन पर नकारात्मक विचारों को अपने मन से दूर रखना चाहिए और पूरा समय कान्हा की भक्ति में बिताना चाहिए। ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और घर में सुख-शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धर्म का मुख्य उद्देश्य किसी को हतोत्साहित करना नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और प्रेम के साथ आगे बढ़ना है, और इसी भावना के साथ हर महिला इस पवित्र व्रत को बिना किसी संकोच के पूरा कर सकती है।