बन रहा दुर्लभ सर्वार्थ सिद्धि योग, पितरों को यमलोक के कष्टों से दिलाएगा मोक्ष; नोट करें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

बन रहा दुर्लभ सर्वार्थ सिद्धि योग, पितरों को यमलोक के कष्टों से दिलाएगा मोक्ष; नोट करें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय

सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ और पापनाशक माना गया है। वर्ष भर में आने वाली कुल चौबीस एकादशियों में से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को 'इंदिरा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी का महत्व इसलिए कई गुना अधिक बढ़ जाता है क्योंकि यह पितृ पक्ष के पावन पखवाड़े के मध्य पड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पूर्वज या पितर अपने पूर्व जन्मों के किन्हीं पाप कर्मों के कारण यमलोक में दंड भुगत रहे हों या उन्हें अधोगति प्राप्त हुई हो, तो उनके निमित्त विधि-विधान से इंदिरा एकादशी का व्रत और पूजन करने से उन्हें तुरंत समस्त कष्टों से मुक्ति मिलकर बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

भगवान श्रीहरि विष्णु और माता महालक्ष्मी की आराधना को समर्पित यह पावन पर्व न केवल साधक के जीवन से दरिद्रता, भय और दोषों का नाश करता है, बल्कि कुल के सात पीढ़ियों के पितरों का भी उद्धार करता है। पद्म पुराण और महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हुए कहा था कि इंदिरा एकादशी का व्रत रखने वाले मनुष्य को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। साल 2026 में आश्विन मास की यह एकादशी एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ खगोलीय संयोग के साथ आ रही है, जिसने इसके प्रभाव को और अधिक फलदायी बना दिया है।

6 अक्टूबर 2026 को इंदिरा एकादशी: उदया तिथि, सर्वार्थ सिद्धि योग और शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणनाओं के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 06 अक्टूबर 2026 को देर रात 02 बजकर 07 मिनट पर होगा। वहीं इस पावन तिथि का समापन 07 अक्टूबर 2026 को देर रात 12 बजकर 34 मिनट पर होगा। चूंकि सनातन धर्म में सूर्योदयव्यापिनी उदया तिथि को ही सर्वोपरि मान्यता प्राप्त है, इसलिए इंदिरा एकादशी का मुख्य व्रत 06 अक्टूबर 2026, मंगलवार के दिन ही पूरी श्रद्धा के साथ रखा जाएगा।

इस वर्ष इस तिथि को और अधिक विशेष बना रहा है 'सर्वार्थ सिद्धि योग'। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सर्वार्थ सिद्धि योग एक ऐसा दुर्लभ और शुभ योग होता है जिसमें किए गए सभी धार्मिक अनुष्ठान, पूजन और संकल्प बिना किसी बाधा के सिद्ध होते हैं। 06 अक्टूबर को यह दिव्य योग सुबह 06 बजकर 25 मिनट से प्रारंभ होकर रात 10 बजकर 17 मिनट तक निरंतर प्रभावी रहेगा। ऐसे में इस समयावधि के भीतर की गई भगवान विष्णु की उपासना और पितरों के नाम से किया गया तर्पण साधक की हर मनोकामना को पूर्ण करने वाला सिद्ध होगा।

दिन के अन्य महत्वपूर्ण मुहूर्तों की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 04 बजकर 47 मिनट से 05 बजकर 36 मिनट तक रहेगा, जो ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम है। दोपहर का विजय मुहूर्त 02 बजकर 17 मिनट से 03 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। वहीं सायंकालीन गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 13 मिनट से 06 बजकर 38 मिनट तक और निशिता मुहूर्त (मध्यरात्रि पूजन) रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।

इंदिरा एकादशी 2026 व्रत पारण का समय और दान का विशेष विधान

शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण नियत समय पर और शास्त्रीय नियमों के अनुसार द्वादशी तिथि में किया जाए। इंदिरा एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी बुधवार, 07 अक्टूबर 2026 को संपन्न किया जाएगा। पारण का सबसे उत्तम और शास्त्र सम्मत समय सुबह 06 बजकर 17 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। व्रतियों को इसी समयावधि के भीतर हरिवासर समाप्त होने के बाद अपना व्रत खोलना चाहिए।

पारण के नियमों के अनुसार व्रत खोलने से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु की आरती करें। इसके उपरांत किसी ब्राह्मण, साधु-संत अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अपने सामर्थ्य अनुसार सीधा (कच्चा अन्न जैसे आटा, दाल, चावल, घी), पीले वस्त्र, मौसमी फल और दक्षिणा का दान अवश्य करें। धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी व्रत के उपरांत किया गया दान अक्षय हो जाता है। गौमाता को हरा चारा या गुड़-रोटी खिलाने के पश्चात ही तुलसी दल और चरणामृत ग्रहण करके स्वयं का व्रत खोलना चाहिए।

पितरों की मुक्ति के लिए पूजा विधि और तर्पण की शास्त्रीय प्रक्रिया

इंदिरा एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों में स्नान करने या घर के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करने का विधान है। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का दृढ़ संकल्प लें। घर के ईशान कोण में एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान लक्ष्मीनारायण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें और उन्हें पीले पुष्प, पीला चंदन, तुलसी दल, ऋतुफल और पीले मिष्ठान्न का भोग लगाएं। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।

पितृ पक्ष होने के कारण इस दिन पितरों के निमित्त विशेष तर्पण किया जाता है। दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तांबे या पीतल के पात्र में जल, कच्चा दूध, जौ, अक्षत और काले तिल मिलाकर कुश की पवित्री पहनकर पितरों को जलांजलि दें। इसके बाद श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करें और उसके पुण्य का संकल्प अपने पितरों को समर्पित करें। ऐसा करने से पितृ दोष शांत होता है और पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को दीर्घायु, आरोग्य, धन-धान्य और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा: राजा इंद्रसेन और उनके पिता के उद्धार का प्रसंग

पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में महिष्मती नगरी में धर्मपरायण राजा इंद्रसेन शासन करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके राजदरबार में पधारे और उन्होंने राजा को बताया कि वे यमलोक गए थे, जहां उन्होंने राजा इंद्रसेन के पिता को देखा। उनके पिता पूर्व जन्म में एकादशी व्रत भंग होने के कारण यमलोक के भीषण कष्ट भोग रहे थे। पिता ने नारद जी के माध्यम से अपने पुत्र इंद्रसेन तक यह संदेश भेजा था कि यदि उनका पुत्र आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत रखे और उसका पुण्य उन्हें दान कर दे, तो उन्हें यमलोक के बंधनों से मुक्ति मिल जाएगी।

देवर्षि नारद के बताए अनुसार राजा इंद्रसेन ने अपनी प्रजा, मंत्रियों और परिवार सहित आश्विन मास की इंदिरा एकादशी का कठोर उपवास रखा, विधिपूर्वक भगवान शालिग्राम का पूजन किया और ब्राह्मणों को दान देकर व्रत का संपूर्ण पुण्य अपने स्वर्गीय पिता को समर्पित कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से आकाश से पुष्प वर्षा हुई और राजा के पिता गरुड़ पर सवार होकर सीधे बैकुंठ धाम चले गए। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि इंदिरा एकादशी का व्रत पूर्वजों को मोक्ष दिलाने वाला सबसे अचूक और शक्तिशाली माध्यम है।